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नवसामंत वर्ग से हताश हो रहे हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी !




नवसामंत वर्ग संभवतः मेरी परिभाषा है। देश के प्रशासनिक संवर्ग के अधिकारियों को मैं

इसी नाम से पुकारता हूं। दरअसल जो व्यवस्था इस देश में चल रही है, उसमें भ्रष्ट लोगों

पर कार्रवाई के भारी भरकम कानून होने के बाद भी व्यवहार में जो कुछ होता है, उससे इस

नवसामंत वर्ग के प्रभाव का अनुभव होता है। इस वर्ग को तमाम गड़बड़ियों के बाद भी कुछ

नहीं किया जा सकता। सीधे सीधे टक्कर लेने पर उतारु अधिकारियों पर भले ही कार्रवाई

हो जाए लेकिन इस वर्ग की आपसी एकता इतनी मजबूत है कि सरकार का मुखिया भी

अगर चाह ले तो आसानी से किसी का बाल तक बांका नहीं कर पाता है। आप अखिल

भारतीय संवर्ग के किसी अधिकारी से बात कीजिए तो आपको यह अनुभव हो जाएगा कि

उन्हें इसी बात का प्रशिक्षण दिया गया है कि वे ही श्रेष्ठ हैं और देश पर राज करने के लिए

ही उन्हें इस नौकरी में चुना गया है। इस अखिल भारतीय सेवा के सभी संवर्गों में यह

मनोदशा देखी जा सकती है। वैसे इसमें जनता से जुड़ाव रखने की चाह रखने वाले चंद

अपवाद भी होते हैं, जिन्हें हमेशा यह याद रहता है कि दरअसल उन्हें यह नौकरी गरीबों की

सेवा के लिए दी गयी है। खैर इस नवसामंत वर्ग से शायद अब जाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र

मोदी का मोहभंग हो रहा है। वरना इतने दिनों तक उनका काम काज तो यह अधिकारी ही

आगे बढ़ाते आये हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अफसरशाहों पर बेहद कड़ी टिप्पणी की है।

उनकी हताशा समझी जा सकती है। आखिरकार केंद्र और राज्यों दोनों जगहों पर सरकारों

का संचालन पिछले 70 वर्षों से ये एमेच्योर अधिकारी ही करते रहे हैं। यह कुछ वैसा ही है

मानो केबिन क्रू ही विमान को उड़ा रहे हैं।

नवसामंत बनने की प्रक्रिया नौकरी में आने से प्रारंभ होती है

अपने परिचितों में सामान्य युवक से आईएएस अथवा आईपीएस बनते अनेक लोगों को

देखा है। अनेक आईएएस या आईपीएस अधिकारियों को प्रशिक्षु अफसर से मुख्य सचिव

अथवा पुलिस महानिदेशक के पद तक पहुंचने को देखने का भी अवसर प्राप्त हुआ है।

लेकिन देश की जरूरत को देखते हुए वे लोग बहुत ज्यादा परिष्कृत हो चुके हैं और अब

पानी पर लाठियां भांजने में ही लगे हैं। समस्या हमेशा से यही रही है। सबको पता है कि

भारत के लिए यह सेवा काफी अहम है लेकिन अपने मौजूदा अवतार में नहीं। इस रूप में

वह अपना मकसद खो चुकी है। यही वजह है कि समूची अफसरशाही और खासकर

आईएएस में व्यापक सुधारों की सख्त जरूरत है। इस बारे में प्रशांत किशोर ने एक टीवी

चैनल के इंटरव्यू में बड़ी खास बात कही थी कि सामान्य कॉलेज का स्नातक पास

आईएएस बन जाने के बाद कृषि अथवा पशुपालन का विशेषज्ञ कैसे हो सकता है। इस

दिशा में वर्षों काम करने वाले वैज्ञानिकों के माथे पर बैठा भारतीय प्रशासनिक अधिकारी

ही श्रेष्ठ है, यह सोच भारत के विकास का रास्ता रोकती है। वर्तमान की बात करें तो

किसान आंदोलन से भारतीय जनता पार्टी को अभी परेशानी हो रही है, उसका एक प्रमुख

कारण यह भी है। अब तो, सरकार में बैठे अधिकारी सबसे अधिक काबिल हैं, इस सोच को

बदले बिना देश को प्रगति के पथ पर वर्तमान आधारभूत संरचना के सहारे आगे नहीं

बढ़ाया जा सकता है।

अब देश में इस शासन व्यवस्था को और जिम्मेदार बनाने की जरूरत है

कई अनुभवी प्रशासनिक अधिकारियों ने भी समय समय पर इस सेवा संवर्ग में सुधार के

सुझाव भी दिये हैं लेकिन नवसामंत वर्गों का बहुमत इन सुधारों को स्वीकार नहीं करना

चाहता क्योंकि उन्हें इस बात का एहसास है कि सुधार होने के साथ साथ उनकी

जिम्मेदारियां और परिष्कृत होंगी और अभी हर मामले से बच निकलने के जो रास्ते हैं, वे

भी सीमित हो जाएंग। इसलिए वे इस वर्तमान स्थिति को बदलने देना नहीं चाहते हैं। यह

ठीक वैसी ही स्थिति है जैसे एक बार विधायक अथवा सांसद बनने वाला आजीवन पेंशन

पाने का अपना अधिकार खोना नहीं चाहता। प्रशासनिक और पुलिस सेवा के साथ साथ

विभिन्न विभागों के विशेषज्ञों को आगे बढ़ाते हुए उनकी राय को अधिक ताकतवर बनाया

जाना चाहिए क्योंकि यह सच है कि एक व्यक्ति सिर्फ आईएएस बन जाने भर से सर्वज्ञाता

नहीं बन जाता है। साथ ही अखिल भारतीय सेवा में आने के बाद सत्ता के शीर्ष तक

कालबद्ध प्रोन्नति के सहारे पहुंचने के तरीकों को भी अब रोकना होगा वरना हर किस्म का

भ्रष्टाचार करने के बाद भी शीर्ष पद पर पहुंचने के बाद भी अनेक किस्म की गड़बड़ियों में

शामिल अधिकारियों ने हमलोगों ने इसी झारखंड में पूरे सम्मान के साथ सेवानिवृत्त होते

देखा है। इस पर रोक लगाने की जरूरत है। हर पांच या सात वर्ष में हर अफसर के

कार्यकाल की समीक्षा के बाद ही प्रोन्नति का नियम हो सकता है कि भ्रष्टाचार और

राजनीतिक हस्तक्षेप को कम करने में मददगार साबित हो।



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