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महंगाई का दूसरा असर भी देश के ग्राहक झेल रहे हैं




महंगाई का अप्रत्यक्ष प्रभाव भी अंततः देश की जनता को ही झेलना पड़ रहा है। कोरोना लॉकडाउन के समय से पटरी से उतर चुकी देश की अर्थव्यवस्था जब पटरी पर आती नजर आ रही है तो पिछले दो वर्षों के घाटा को जल्द से जल्द पूरा करने का बोझ भी देश की जनता पर ही डाला जा रहा है।




दरअसल यह सारी गड़बड़ी ईंधन की कीमतों में बढ़ोत्तरी की वजह से हैं, जिसके बारे में हर किसी को पता है कि इससे केंद्र सरकार अतिरिक्त कमाई कर रही है, जिसका फिलहाल यह हिसाब नहीं है कि यह पैसा आखिर खर्च कहां हो रहा है।

रोजमर्रा का सामान (एफएमसीजी) बनाने वाली कंपनियों ने जिंस महंगाई के असर को कम करने के लिए पिछली तिमाही में कीमतें बढ़ाई हैं और आगे कीमतें और बढ़ाने या उत्पादों का वजन कम करने की घोषणा की है।

लेकिन इससे भी कंपनियों को चालू तिमाही में परिचालन लाभ मार्जिन के स्तर पर पर्याप्त मदद नहीं मिलेगी। मसलन अगर एक सौ रुपये में सौ ग्राम का कोई सामान मिलता था तो दाम नहीं बढ़ाते हुए फास्ट मूविंग कंज्युमर गुड्स की कंपनियों ने उसका वजह सौ ग्राम से घटाकर 75 ग्राम कर दिया है।

सामान्य समझ में सामान की कीमत तो पुरानी है लेकिन इस बात पर लोगों का ध्यान कम जाता है कि दरअसल काम स्थिर रखने के बाद भी उसके वजन में कमी कर दी गयी है।

यह भी अंततः जनता की जेब पर पड़ने वाला अतिरिक्त बोझ ही है। उपभोक्ता कंपनियों और विश्लेषकों का मानना है कि जनवरी-मार्च तिमाही में कुछ राहत मिल सकती है। लेकिन अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में मार्जिन पर दबाव बना रह सकता है क्योंकि जिंस लागत लगातार ऊंची बनी हुई है।

महंगाई का असर बढ़ेगा क्योंकि कंपनियों का खर्च बढ़ेगा

हिंदुस्तान यूनिलीवर (एचयूएल) और मैरिको जैसी कंपनियों ने आगाह किया है कि निकट अवधि में मार्जिन पर दबाव बना रह सकता है क्योंकि अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में प्रचार-प्रसार खर्च में बढ़ोतरी के आसार हैं।

कंपनियां विज्ञापन खर्च बढ़ा रही हैं क्योंकि देश भर में आवागमन बढ़ने और कोविड के मामले नियंत्रित रहने से अर्थव्यवस्था खुल रही है।

देश की सबसे बड़ी एफएमसीजी कंपनी एचयूएल के सीएफओ ऋतेश तिवारी ने वित्तीय नतीजों के बाद निवेशकों को बताया, हमारा अनुमान है कि आपूर्ति श्रृंखला के इस अवरोध के नतीजतन सामग्री की लागत पर कुछ समय असर रहेगा।

उन्होंने कहा कि कंपनी का अनुमान है कि निकट अवधि में मार्जिन पर दबाव रहेगा। रिन साबुन और डिटर्जेंट पाउडर बनाने वाली इस कंपनी ने कपड़ा धुलाई एवं घरेलू देखभाल पोर्टफोलियो में कीमतों में नपी-तुली बढ़ोतरी की है ताकि जुलाई-सितंबर तिमाही के दौरान कच्चे माल की ऊंची लागत की आंशिक भरपाई की जा सके।




तिवारी ने निवेशकों को बताया कि एचयूएल उन श्रेणियों में लगातार कीमतें बढ़ा रही है, जिनमें कच्चा माल महंगा हो रहा है। मैरिको के एमडी और सीईओ सौगत गुप्ता ने कंपनी के वित्तीय नतीजों के बाद निवेशकों को बताया, सकल मार्जिन तीसरी और चौथी तिमाही में बढ़ेगा।

हालांकि परिचालन मार्जिन में ज्यादातर सुधार केवल चौथी तिमाही में होने के आसार हैं। उन्होंने कहा कि तिमाही में विज्ञापन एवं प्रचार-प्रसार खर्च बढ़ने के आसार हैं।

लागत बचाने के विभिन्न उपायों को लागू करने से कुछ राहत मिलने के आसार हैं, लेकिन ये अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में परिचालन लाभ मार्जिन पर दबाव को पूरी तरह हटाने के लिए काफी नहीं होंगे।

सारी गड़बड़ी दरअसल ईंधन के दाम से जुड़ी है

दौलत कैपिटल मार्केट के अनुसंधान उपाध्यक्ष सचिन बोबडे ने कहा, पाम ऑयल और कच्चे तेल के दाम छह साल के सर्वोच्च स्तर पर हैं, इसलिए इस क्षेत्र के लिए कच्चे माल की लागत पर दबाव रहने के आसार हैं।

उन्होंने कहा कि जिंसों की ऊंची लागत को कीमत बढ़ोतरी के रूप में ग्राहकों पर डालना किफायती श्रेणी में सीमित रहेगा क्योंकि इससे ऊंची कीमत से मात्रात्मक वृद्धि सुस्त पड़ेगी।

बोबडे ने कहा कि अर्थव्यवस्था दोबारा खुलने से विज्ञापन एवं प्रचार-प्रसार का खर्च सामान्य स्तर पर आ जाएगा, जिससे मार्जिन पर दबाव और बढ़ेगा। अन्य कंपनियों में दिग्गज बिस्कुट विनिर्माता ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज ने जुलाई-सितंबर तिमाही में 4 फीसदी कीमतें बढ़ाई हैं।

इसने वित्त वर्ष की शेष अवधि के दौरान अपने पूरे पोर्टफोलियो में कीमतें 6 फीसदी और बढ़ाने की योजना बनाई है। लेकिन कंपनी ने निवेशकों को आगाह किया है कि कीमतों में बढ़ोतरी की मात्रात्मक वृद्धि में नरमी के रूप में कीमत चुकानी पड़ती है।

ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज के एमडी वरुण बेरी ने कहा है कि न केवल हमारे लिए बल्कि पूरे उद्योग के निम्न मात्रात्मक वृद्धि का दौर आने के आसार हैं।

बेरी ने कहा, यह अच्छा नहीं होगा। लेकिन बाजार में जिस तरह की महंगाई है, उसमें अन्य कोई विकल्प नहीं है। इन बयानों से ही इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि महंगाई का असर कोई भी व्यापारी अपने माथे पर नहीं लेना चाहता।

यानी उसे अपने हिस्से का पूरा मुनाफा चाहिए। लिहाजा यह बोझ फिर से जनता पर डाला जा रहा है, जो पहले से ही बोझ के तले दबी हुई है।



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