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कोरोना का कोई डर नहीं राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री ने सभी को दीं शुभकामनाएं

  • असम और पूर्वोत्तर में बोहाग या रोंगाली बिहू का त्योहार धूम धाम से मनाया गया

    भूपेन गोस्वामी

गुवाहाटी : कोरोना  का दुनिया भर में हड़कंप मचा हुआ है। पूर्वोत्तर में कोरोना  का

संक्रमित लोगों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। फिर भी असम और पूर्वोत्तर के लोगों

ने आज से रोंगाली बिहू का त्योहार मना रहे हैं।चुनावों के कोरोना का साथ असम आगामी

रोंगाली बिहू या बोहाग बिहू उत्सव के मोड में आ गया है । बिहू असम का सबसे शानदार

और प्रसिद्ध त्योहार है । बोहाग बिहु यानि असमिया कैलेंडर महीने की शुरुआत 14 अप्रैल

को होती है. पहले दिन को पूरे राज्य में गोरु बिहू (मवेशी बिहू) के रूप में मनाया जाता है,

जबकि दूसरे दिन को मनु बिहू (मानव बिहू) के रूप में जाना जाता है।

बिहू का पहला दिन प्रकृति के साथ मानव के संबंध को इंगित करने वाले मवेशियों को समर्पित है 

अर्थात् बैशाख केवल एक ऋतु ही नहीं, न ही यह एक मास है, बल्कि यह असमिया जाति

की आयुरेख और जनगण का साहस है। भारत की विभिन्न संस्कृतियों में विभिन्न त्योहार

मनाए जाते हैं। यहां जितने राज्य है उतने ही त्योहार है। इन्हीं प्रमुख त्योहारों में से एक है

असम में मनया जाने वाली बिहू का त्योहार। बिहू का त्योहार असम में एक साल में तीन

बार मनाया जाता है। बिहू के तीन प्रकार हैं: रोंगाली बिहू, कोंगाली बिहू और भोगली बिहू।

प्रत्येक त्यौहार ऐतिहासिक रूप से धान की फसलों के एक अलग कृषि ‘बि’ मतलब ‘पुछ्ना’

और ‘हु’ मतलब ‘देना’ और वहीं से बिहू नाम उत्पन्न हुआ। सभी तीनों बिहूओं में से रोंगाली

बिहू सबसे महत्वपूर्ण है। यह बोहाग के असमिया महीने में पड़ता है, इसलिए इसे बोहाग

बिहू भी कहा जाता है। भारत में यह बैसाख महीने के विशुवर संक्रांति या स्थानीय रूप से

बोहाग (भास्कर पंचांग) के सात दिन बाद मनाया जात है। यह आमतौर पर 13 अप्रैल को

पड़ता है यह त्योहार तीन दिन तक मनाया जाता है।

बोहाग बिहू का त्योहार फसल की कटाई को दर्शता है।

पंजाब में इसी फसल की कटाई के अवसर पर बैसाखी का त्योहार मनाया जाता

है। बोहाग बिदु असमी नव वर्ष की शुरुआत का प्रतीक है। इस दिन सुबह से ही चरवाहे

लौकी, बैंगन, हल्दी, दीघलती, माखियति आदि सामग्री बनाने में जुट जाते हैं। शाम को

सभी गायों को गोशाला में लाकर बाँध देते हैं। विश्वास किया जाता है कि उरूरा के दिन

गायों को खुला नहीं रखा जाता है। गाय के चरवाहे एक डलिया में लौकी, बैंगन आदि

सजाते हैं। प्रत्येक गाय के लिए एक नयी रस्सी तैयार की जाती है। इस पर्व को अप्रैल मास

में तीन दिन—13, 14 और 15 अप्रैल तक मनाया जाता है। इन तीनों दिनों को विभिन्न

नामों से जाना जाता है। गोरूबिहू, मनुहोरबिह एवं गम्बोरीबिहू। असम में रोंगाली बिहू

बहुत सारे परंपराओं से ली जाती हैं जैसे की- बर्मी-चीन, ऑस्ट्रो – एशियाटिक, हिंद-आर्यन-

और बड़े ही उत्साह के साथ मनाया जाता हैं। बोहाग बिहू का त्योहार त्योहार अप्रैल के

मध्य में शुरू होता हैं। लोग इस उत्सव को हंसी और खुशी के साथ मनाते हैं। इस वर्ष

रोंगाली बिहू का त्योहार 14 अप्रैल बुधवार से शुरु हुआ है।

कोरोना का दुनिया भर में संख्या लगातार बढ़ती जा रही है

रोंगाली बिहू का पहला दिन गोरू या गाय बिहू कहलाता। जैसा कि इसके नाम से ही प्रतित

है यह दिन गायों और अन्य खेती करने वाले जानवरों को समर्पित होता है। इस दिन लोग

सुबह उठकर अपनी-अपनी गायों को नदी में ले जाकर नहलाते हैं। गायों को नहलाने के

लिए रात में ही भिगो कर रखी गई कलई दाल और कच्ची हल्दी का इस्तेमाल किया जाता

है। हल्दी का लेप गायों को लगाया जाता है। उसके बाद वहीं पर उन्हें लौकी, बैंगन आदि

खिलाया जाता है। गाय को खाना खिलाते समय असमिया लोग पांरपरिक गीत गाते हैं।

इस दिन लोग दिन में चावल नहीं खाते, केवल दही चिवड़ा ही खाते हैं। पहले बैसाख में

आदमी का बिहू शुरू होता है। उस दिन भी सभी लोग कच्ची हल्दी से नहाकर नए कपड़े

पहन कर पूजा-पाठ करके दही चिवड़ा एवं नाना तरह के पेठा-लडडू इत्यादि खाते हैं। इसी

दिन से असमिया लोगों का नया साल आरंभ माना जाता है। इसी दौरान सात दिन के अंदर

101 तरह के हरी पत्तियों वाला साग खाने की भी रीति है।

गोरु बिहू के दूसरे दिन यानि 15 अप्रैल का दिन असम में नववर्ष के रूप में मनाया जाता है

इस दिन के महाभोज को बिहू कबोलोई कहते हैं। इस दिन नये वस्त्रों के साथ गमछा भी

पहना जाता है। यह विशेष प्रकार गमछा एक सुन्दर तौलिए के रूप में होता है। जिसमें

अनेक आकृतियाँ बनी होती हैं।स गमछे को सिर या कमर पर बाँधा जाता है। स्त्रियाँ

मेखली चादर व मूंगा रेशम केकर्षक वस्त्र धारण करती हैं। ये परिधान असम के विशेष

परिधान हैं। बिहू मनाने को अनेक दल गीत गाते और संगीत की धुन पर नृत्य करते हुए

टोलियों में निकलते हैं। गाय जाने वाले भक्तिगीतों को हुसरी विधि के द्वारा गाया जाता

है। इस विधि में श्रीकृष्णकी प्रशंसा व उनके आशीर्वाद की कामना की जाती है।बिहू के

समय में गांव में विभिन्न तरह के खेल-तमाशों का आयोजन किया जाता है। इसके साथ-

साथ खेती में पहली बार के लिए हल भी जोता जाता है। बिहू नाच के लिए जो ढोल व्यवहार

किया जाता है उसका भी एक महत्व है। कहा जाता है कि ढोल की आवाज से आकाश में

बादल आ जाते हैं और बारिश शुरू हो जाती है जिसके कारण खेती अच्छी होती है।

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