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इंदिरा गांधी वाली गलती दोहरा रहे हैं नरेंद्र मोदी

इंदिरा गांधी ने भी किसानों के मुद्दे पर ऐसी गलती की थी लेकिन बात समझ में आते ही

उन्होंने अपनी गलती स्वीकार करते हुए अपने फैसले को तुरंत वापस भी ले लिया था।

लेकिन इस एक गलती का खामियजा यह हुआ कि जयप्रकाश नारायण का आंदोलन

परवान चढ़ा और आपातकाल से राजनीति की गाड़ी आगे बढ़ते हुए पूरे देश से कांग्रेस के

सफाये के तौर पर सामने आयी। इसी आपातकाल के कुप्रबंधन की वजह से इंदिरा गांधी न

सिर्फ सत्ता से बेदखल हुई बल्कि कई अन्य परेशानियों से भी गुजरी। लेकिन इंदिरा गांधी

की राजनीतिक समझ इतने परिपक्व थी कि वह हर मौके पर अपने से हुए गलती को

स्वीकारती चली गयी। जिसका नतीजा भी इस देश ने बाद में देखा। 2014 की जीत के बाद

वर्तमान भाजपा का नेतृत्व या यूं कहें कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी आत्म

विभोर की मुद्रा में सारे काम करती चली गयी। इंदिरा गांधी ने सन 1973 में देश के अनाज

व्यापार का राष्ट्रीयकरण करके कैसी गलती की थी। उस समय उनका समाजवादी रुख

चरम पर था, माना जा रहा था कि बांग्लादेश के निर्माण के बाद के दुर्गा अवतार में थीं और

गलती कर ही नहीं सकती थीं। यह वही दौर था जब अर्थव्यवस्था युद्ध और उनके

अधिनायकवादी समाजवाद से जूझ रही थी। खाड़ी क्षेत्र की अस्थिरता की वजह से तेल

कीमतों ने बड़ा झटका दिया था और मुद्रास्फीति 33 फीसदी हो चुकी थी। इस दौर में इंदिरा

गांधी सोवियत शैली के समाजवादी कल्पनालोक में जी रही थीं और कारों समेत हर चीज

की कीमत तय थी। लब्बोलुआब यह है कि उनके वाम रुझान वाले प्रमुख सलाहकार और

योजना आयोग के तत्कालीन उपाध्यक्ष डीपी धर ने उन्हें समझाया था कि कीमतों को

नियंत्रित करने का सबसे अच्छा तरीका है अनाज कारोबार का राष्ट्रीयकरण करना।

इंदिरा गांधी को भी सलाहकारों ने गलत सूचना दी थी

जाहिर है इस विषय में कोई सार्वजनिक राय नहीं ली गई। मजबूत और लोकप्रिय नेता

ऐसा कहां करते हैं। इसने आपदा को न्योता दिया। किसान, व्यापारी, उपभोक्ता सभी

नाराज थे। कीमतें बढ़ीं, अनाज की कमी होने लगी और किसान गरीब से गरीब होते गए।

उनके साथ काम करने वालों में से जिस व्यक्ति ने आसन्न संकट को पहचाना और

चेतावनी देने का प्रयास किया वह एक जानेमाने पंजाबी अर्थशास्त्री थे: बी एस मिन्हास

लेकिन उनकी राय को तवज्जो नहीं दी गई। यह इकलौता बड़ा निर्णय था जिसे इंदिरा

गांधी को वापस लेना पड़ा जबकि उनके सामने कोई राजनीतिक चुनौती नहीं थी। इंदिरा

गांधी के काल और अभी की परिस्थितियां अलग हैं। इंदिरा गांधी ने निजी बाजार को

किसानों से दूर करने का प्रयास किया और मुंह की खाई। मोदी बाजार को किसानों के पास

लाना चाहते हैं लेकिन किसान ऐसा नहीं चाहते। परंतु राजनीतिक रूप से कोई विरोधाभास

नहीं है। दोनों मामलों में अत्यधिक शक्तिशाली और ताकतवर नेता अपनी सीमा

पहचानने में नाकाम रहे। उस समय इंदिरा गांधी के पास लोकसभा में 352 सीट थीं जबकि

मोदी के पास 303। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में नेताओं की लोकप्रियता की भी सीमा है।

सुधारवादी कदमों की त्वरित और गहन समीक्षा की कमी 

एलपीजी सब्सिडी छोडऩे का अभियान जहां आबादी का बड़ा हिस्सा शामिल था और

जिसमें उनके समर्थक भी शामिल थे। परंतु पंजाब में न उन्हें यह लोकप्रियता हासिल है, न

ही गुजरात या हिंदी प्रदेशों की तरह लोग उन पर इतना भरोसा करते हैं। राजनीति में यदि

आपका लक्ष्य केवल चुनाव जीतना हो तो चाणक्य नीति से काम बन सकता है। परंतु

शासन के लिए चाणक्य नीति भी चाहिए और राम राज्य भी यानी दूसरों की सलाह भी

लेनी होगी। आप किसानों पर दबाव डालकर अपनी बात नहीं मनवा सकते हैं और न ही

उन्हें खालिस्तानी बताकर खारिज कर सकते हैं। धैर्य की इस कमी और पंजाब में

व्यक्तिगत लोकप्रियता की सीमा को न समझने के कारण कृषि कानूनों को लेकर ऐसे

हालात बने। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में अर्थव्यवस्था में तमाम गड़बडिय़ों के बाद

यह दूसरे कार्यकाल का सबसे सुधारवादी कदम हो सकता था। परंतु जैसा कि हम सब

जानते हैं एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में आर्थिक नीति कुछ और नहीं राजनीति का ही एक

रूप है। नतीजा हमारे सामने है कि कई खास इलाकों में भाजपा अभी ही अपने सबसे बड़े

वोट बैंकों से हाथ धो बैठी है। इन वोट बैकों ने पिछले दोनों लोकसभा चुनाव में मोदी पर ही

अपना विश्वास जताया था। वैसे दोनों ही चुनाव में स्थानीय प्रत्याशी के मुकाबले मोदी का

प्रभाव ही भाजपा की गाड़ी को शिखर तक पहुंचाने में प्रमुख भूमिका निभाने वाला साबित

हुआ है। अब तीन कृषि कानूनों को अपने तरीके से बिल्कुल सही समझने के बाद भी

किसानों से सलाह मशविरा नहीं करने का खामियजा यह सरकार भुगतने जा रही है। अब

यह देखना है कि इस राजनीतिक नुकसान को नरेंद्र मोदी खुद इंदिरा गांधी की तरह समझ

भी पाते हैं अथवा नहीं।

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