Press "Enter" to skip to content

पृथ्वी की तरफ बढ़ने वाले उल्कापिंड से बचाव की तैयारियां शुरु







  • आगामी 10 अगस्त पर है वैज्ञानिकों की नजर

  • करीब से गुजरते वक्त रास्ता बदल सकता है यह

  • पृथ्वी पर अक्सर ही गिरते रहे हैं छोटे बड़े उल्कापिंड

  • 10 अगस्त को टकराने वाला उल्कापिंड आकार में थोड़ा बड़ा है

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः पृथ्वी की तरफ बढ़ने वाले इस उल्कापिंड की लेकर वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ी हुई है।

यह चिंता सिर्फ उल्कापिंड के आकार की वजह से है।

यह आकार में एम्पायर स्टेट बिल्डिंग से भी बड़ा है।

इसलिए इसके धरती पर आ गिरने के दौरान बड़ा हादसा हो सकता है।

वैज्ञानिक इसके गिरने के स्थान को निर्धारित करने की कोशिश में जुटे हैं ताकि जिस स्थान पर यह गिरेगा वहां का नुकसान कमसे कम किया जा सके।

पहले से ही यह तय हो गया था कि यह उल्कापिंड आगामी 10 अगस्त को पृथ्वी की सतह पर आ सकता है।

इस बारे में पिछले माह की स्पष्ट कर दिया गया था।


इन रोचक खबरों को भी पढ़ें


पृथ्वी की तरफ तेजी से बढ़ रहे इस उल्कापिंड का नाम 2006 क्यू क्यू 23 है।

इसके अगले छह दिनों के भीतर पृथ्वी पर गिरने की आशंका है।

दरअसल इसे अपनी धुरी पर पृथ्वी के काफी करीब से गुजर जाना है।

लेकिन खगोल वैज्ञानिक मानते हैं कि इतनी नजदीकी से गुजरते वक्त यह कभी भी पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण की चपेट में आकर पृथ्वी पर गिर सकता है।

लिहाजा आकार में काफी बड़ा होने की वजह से यह जहां पर गिरेगा, वहां भारी तबाही होगी।

ऐसी आशंका जतायी गयी है।

नासा के वैज्ञानिकों के मुताबिक यह उल्कापिंड अपनी धुरी पर आगे बढ़ते हुए पृथ्वी के करीब 45 लाख किलोमीटर करीब तक आयेगा।

हमारे हिसाब से यह काफी दूरी होने के बाद भी अंतरिक्ष में इस दूरी का कोई महत्व नहीं है।

इसी वजह से इस पर पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का असर होने की भी आशंका जतायी जा रही है।

इसमें जरा सी भी हेरफेर हुई तो यह निश्चित धरती से आ टकरायेगा।

इसी वजह से अब इसकी गतिविधियों पर हर पल नजर रखी जा रही है।


इन रोचक खबरों को भी पढ़ें


पृथ्वी की तरफ सूर्य के चारों तरफ चक्कर काटने वाले उल्कापिंडों की संख्या अनगिनत हैं।

पृथ्वी की तरफ बढते उल्कापिंडों में कई नियर अर्थ उल्कापिंड भी हैं

इनमें से जो भी 1.3 एस्ट्रोनॉमिकल इकाई से करीब से चक्कर काट रहे हैं, उन्हें खगोल विज्ञान में नियर अर्थ उल्कापिंड माना जाता है।




यह जान लें कि एक एस्ट्रोनॉमिकल इकाई का मतलब 929.5 लाख किलोमीटर होता है।

यह दरअसल पृथ्वी से सूर्य तक की अनुमानित दूरी है।

इस श्रेणी के करीब 900 उल्कापिंडों की पहचान की गयी है, जो अंतरिक्ष में चक्कर काट रहे हैं।

उनमें से सबसे बड़े उल्कापिंड का व्यास 34 किलोमीटर है।

इस दौरान पृथ्वी पर कई उल्कापिंड पहले भी गिर चुके हैं।

उल्कापिंडों के लगातार पृथ्वी के करीब आने से बढ़ रहे खतरों से निपटने के लिए नासा अपनी एक अलग योजना पर काम कर रही है।

इस योजना के तहत पृथ्वी पर गिरने वाले उल्कापिंडों को अंतरिक्ष में काफी दूरी पर ही नष्ट करना अथवा उनकी दिशा बदल देना शामिल हैं।

इसके लिए खास यान भी तैयार किया जा रहा है।

इस यान की मदद से पृथ्वी की तरफ बढ़ने वाले उल्कापिंडों पर मिसाइल से प्रहार किया जाएगा।

इस प्रहार से या तो उल्कापिंड टूट कर छोटे छोटे टुकड़ों में बंट जाएंगे, अथवा उनकी दिशा बदल जाएगी।

अंतरिक्ष में काफी दूर इस किस्म का हमला होने की वजह से पृथ्वी तक इनका कोई प्रभाव नहीं होगा।

साथ ही ऐसे उल्कापिंडों के पृथ्वी पर आ गिरने की संभावना भी कम हो जाएगा।

इन तमाम अनुसंधानों के बीच चर्चित पदार्थविज्ञानी नील डीग्रासे ने कहा है कि हमारी पृथ्वी का अंत भी संभवत किसी बड़े उल्कापिंड के अचानक आ टकराने की वजह से ही होगा।

उन्होंने उल्कापिडों और धूमकेतु विषय पर एक व्याख्यान के दौरान यह आशंका जतायी है।

इनका गिरना काफी समय से चला आ रहा है कोई नई बात नहीं

दूसरी तरफ कई अन्य वैज्ञानिक मानते हैं कि उल्कापिडों का पृथ्वी पर गिरना कोई नई बात नहीं है।




इनकी टक्कर में पृथ्वी पर लगातार परिवर्तन होते रहे हैं।

यहां तक कि पृथ्वी पर पाये जाने वाले धातुओं में से कई धातु बाहरी दुनिया से इन्हीं उल्कापिंडों के साथ ही आये हैं।

कुछ लोगों का मानना है कि पृथ्वी पर जो वर्तमान जीवन नजर आता है, उसकी नींव भी किसी उल्कापिंड के टकराने की वजह से ही पड़ी है।

कुछ लोग मानते हैं कि यह जीवन भी दरअसल बाहरी जगत से ही पृथ्वी पर उल्कापिंड के सहारे ही आया है।


इन रोचक खबरों को भी पढ़ें



Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •   
  •  
  •  

Be First to Comment

Leave a Reply

WP2Social Auto Publish Powered By : XYZScripts.com