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प्रागैतिहासिक पक्षियों का पंख बीस फीट लंबा होता था




  • ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन में विशाल चिड़ियों के अवशेष मिले
  • आसमान में उड़ते हुए शिकार करता था
  • विशाल पक्षी का वजन करीब तीन सौ किलो
  • कंप्यूटर मॉडल बनाने का काम प्रगति प
प्रतिनिधि

नईदिल्लीः प्रागैतिहासिक पक्षियों की कई प्रजातियां डायनोसर के युग में पृथ्वी पर थी।

इनमें से एक के अवशेष पाये जाने के बाद यह निष्कर्ष निकला है कि

यह जब आसमान पर उड़ता था तो करीब पचास फीट की दूरी घेरकर उड़ता था।

इस प्रजाति के प्रागैतिहासिक पक्षी के पंखों की लंबाई ही करीब बीस फीट हुआ करती थी।

ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन में पाये गये विशाल पक्षियों के एक तरफ का पंख करीब बीस फीट लंबा था।

आकार में काफी विशाल होने की वजह से आसमान में उड़ते हुए ही वह शिकार किया करते थे।

इनके अवशेषों से समझा जा सकता है कि वर्तमान प्रजाति के इंसान भी इनके पंजों में आसानी से समा सकते है।

यह चिड़िया प्रागैतिहासिक काल के बाद पृथ्वी पर हुए उथल पुथल के दौरान विलुप्त हो चुकी है।

इन अवशेषों के आधार पर उनका मॉडल भी तैयार किया गया है।

इस मॉडल के आधार पर आगे का अनुसंधान किया जा रहा है।

ऑस्ट्रेलिया में इस विषय पर शोध कर रहे दल ने गत शुक्रवार की शाम अपनी उपलब्धियों की औपचारिक घोषणा की है।

पूर्व में स्थापित वैज्ञानिक नामों के मुताबिक प्रागैतिहासिक काल के इस चिड़ियां का नाम पेट्रोसोर है।

यह डॉयनासोर के काल का पक्षी है।

उस प्राचीन प्रागैतिहासिक काल में पृथ्वी पर अनेक विशालकाय जानवर हुआ करते थे।

जो बाद में विवर्तन की प्रक्रिया में पृथ्वी पर होने वाले उथल पुथल के दौरान खुद को संभाल और बदल नहीं सके।

इसी वजह से वह दुनिया से गायब हो गये।

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस आकार की पक्षी का वजन

औसतन साढ़े छह सौ पाउंड यानी करीब तीन सौ किलो हुआ करता था।

प्रागैतिहासिक काल के इस पक्षी के अवशेष काफी पुराने हैं

शोध दल का अनुमान है कि जो अवशेष पाये गये हैं, वह काफी पुराना है।

इनके आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि इस विशाल आकार के पक्षी पृथ्वी पर करीब एक करोड़ वर्ष पूर्व रहा करते थे।

इसी किस्म के अवशेष ब्रिटेन में भी पाये गये हैं।

इस प्रजाति की पक्षी का नया अवशेष भी पाया गया है।

जो पेट्रोसर प्रजाति का ही माना जा सकता है। इसका नाम फेरोड्राको लेंटोनी रखा गया  है।

इस प्रजाति के चिड़ियों के पक्ष की लंबाई करीब 13 फीट हुआ करती थी।

मेलबोर्न के स्वीनबर्न विश्वविद्यालय की तकनीकी विभाग के शोधकर्ताओं ने इस पर काम किया है।

इस बारे में प्रकाशित शोध प्रबंध के मुख्य लेखक सुश्री एडेले पेंटलैंड ने कहा कि ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन में पायी गयी प्रजाति में काफी समानताएं हैं।

इनके आकार से ही यह स्पष्ट है कि यह किसी भी महासागर को आसानी से उड़कर पार कर सकते थे।

लेकिन वैज्ञानिक यह भी मान रहे हैं कि तब शायद पृथ्वी की भौगोलिक संरचना कुछ भिन्न थी और कई इलाके आपस में जुड़े हुए भी थे।

इसकी पूंछ की बनावट कुछ ऐसी थी कि उन्हें सरीसृप (छिपकली) प्रजाति प्राणी की श्रेणी में भी रखा जा सकता है।

शोध दल का निष्कर्ष है कि इस प्रागैतिहासिक पक्षी के कुछ अवशेष पहले दक्षिण अमेरिका के इलाकों में भी पाये गये थे।

इससे पक्षियों की आबादी कहां तक फैली थी अथवा पृथ्वी की भौगोलिक संरचना उस वक्त कैसी थी, इसे समझने में मदद मिल सकती है।

उस युग में शायद पृथ्वी की भौगोलिक संरचना ही भिन्न थी

सुश्री पेंटलैंड ने कहा कि ऑस्ट्रेलिया में इस प्राचीन प्रजाति की पक्षी का पाया जाना अपने आप में  बड़ी बात है।

संरचना के आधार पर यह माना जा सकता है कि पानी के निकट रहने वाली

इस पक्षी का मुख्य भोजन शायद मछली अथवा पानी में रहने वाले अन्य जीव ही हुआ करते थे।

लेकिन आकार में काफी बड़ा होने की वजह से वह किसी छोटे आकार के प्राणी को भी आसानी से अपने पंजे में दबाकर उड़ सकता था।

उसके चोंच भी इतने बड़े और नुकीले थे कि उससे भी किसी सामान्य शिकार को मारा जा सकता था।

वैज्ञानिक यह भी मानते हैं कि यह पक्षी अपने काल में डायनासोर के साथ ही रहा करते थे।

आकाश में उड़ने की क्षमता की वजह से वे अक्सर ही डायनासोर के हमले के बाहर हो जाया करते थे।

इतने बड़े पंख होने की वजह से उनके उड़ने की गति भी काफी तेज होती थी

और एक बार में वह सैकड़ों मील तक निकल सकते थे।

ऑस्ट्रेलिया में जो अवशेष पाये गये हैं, वे विंटन (क्वींसलैंड) के क्षेत्र के हैं।

शोध दल को इस प्रजाति की पक्षी के सर का हिस्सा, गरदन के कुछ अंश, रीढ़ और पंख की हड्डियां मिली हैं।

इन्हीं के आधार पर इस प्राचीन प्रजाति की पक्षी का कंप्यूटर मॉडल तैयार करने का काम चल रहा है।



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