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चांद की सतह के नीचे कीमती धातुओं का भंडार की उम्मीद




  • अमेरिका और कनाडा के वैज्ञानिकों का नया अनुमान
  • अब तक सिर्फ ऊपरी सतह के नमूने मिले हैं
  • कई कारणों से बन सकते हैं धातु

नईदिल्लीः चांद की सतह के नीचे दरअसल क्या है, इस बार में पहले के चंद्र अभियानों में भी कोई जानकारी नहीं दी गयी थी।

वहां तक पहुंचने वाले अंतरिक्ष यानों ने वहां की मिट्टी के नमूने भी एकत्रित किये थे।

लेकिन अब आधुनिक उपकरणों की मदद से जब से चांद की सतह के नीचे का पता लगाने का काम चल रहा है, इस बारे में नये नये तथ्य सामने आते जा रहे हैं।

इस बारे में कहा जा रहा है कि अंतरिक्ष यानों और उसमें मौजूद उपकरणों से सिर्फ ऊपरी सतह को खुरचा जा सका है।

अब अमेरिका और कनाडा के वैज्ञानिकों का एक दल यह मानता है कि दरअसल चांद की गहराई में धातुओं का भंडार छिपा हो सकता है।

वहां के बारे में उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर वैज्ञानिकों का यह दल ऐसे निष्कर्ष पर पहुंचा है।

दरअसल चांद के दक्षिणी छोर पर भारतीय रोवर विक्रम के जा गिरने के बाद शोध दल का यह निष्कर्ष सार्वजनिक किया गया है।

इससे पहले किसी भी देश ने इस छोर में यान भेजने का काम नहीं किया था।

उल्लेखनीय है कि हाल ही में नासा ने एक ऐसे उल्कापिंड का पता लगाया है

जिसपर पृथ्वी से कई लाख गुणा अधिक सोना है।

इस उल्कापिंड के बारे में तो पहले से ही पता था।

उसमें इतना सोना है यह पहली बार पता चल पाया है।

अब इस एक उल्कापिंड की वजह से अन्य सभी उल्कापिंडों और ग्रहों तथा उपग्रहकों की

संरचना के बार में नये सिरे से जानकारी हासिल की जा रही है।

चांद की सतह के नीचे गहराई में मूल ढांचा

चांद की सतह के नीचे कीमती धातुओं का खजाना होने की सोच रखने वालों का तर्क है कि

जिस तरीके से चांद का जन्म हुआ है, उसकी भौगोलिक और खगोलीय परिस्थितियां ही

वहां बेशकीमती धातु पैदा करने लायक ही थीं।

लेकिन इसके लिए खोज दल को चांद की गहराई तक पहुंचना होगा क्योंकि चांद की

ऊपरी सतह पर इसके कोई निशान नहीं मिलेंगे।

करोड़ों वर्ष के घटनाक्रमों की वजह से चांद का यह ऊपरी सतह सामान्य हो चुका है।

ऊपर से वहां के ठंड की वजह से बर्फ की मोटी पर्त ने भी आंतरिक सतह को अच्छी तरह घेरने का काम किया है।

जिसकी नतीजा है कि चांद की सतह के ऊपर सामान्य खनिज संरचना की मोटी पर्त तैयार हो चुकी है।

चांद में इस तरह का खजाना होने की सोच रखने वालों ने अपनी सोच को तब से क्रमबद्ध किया है,

जब करीब पचास वर्ष पूर्व चांद से पहली बार मिट्टी के नमूने लाये गये थे।

वहां के अब तक कई सौ किलोग्राम मिट्टी लायी जा चुकी है।

इनके विश्लेषण से भी वहां के खनिजीय संरचना के संकेत तो मिल ही गये थे।

अब शोध को उससे आगे ले जाने की कोशिश हो रही है।

गहराई तक पहुंचने के बाद ही खुलेगी इसकी असलियत

इस शोध से जुड़े कनाडा के डलहौसी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक जेम्स ब्रेनान

कहते हैं कि अपोलो और अन्य चंद्र अभियानों से मिट्टी के जो नमूने लाये गये हैं, वे काफी कम है।

इसमें जो कुछ संकेत मिलते हैं, उसी के आधार पर चांद की गहराई से नमूना लाने

और उसका विश्लेषण करने की जरूरत है ताकि आंतरिक संरचना के बारे में और ठोस जानकारी मिल सके।

ऊपरी आवरण से धातुओं के होने का संकेत भर मिल सकता है।

अब तक के चंद्र अभियानों से सिर्फ वहां किस किस्म के धातु हो सकते हैं, उसके संकेत भर मिले हैं।

लेकिन इससे भी यह स्पष्ट हो गया है कि चांद का आंतरिक ढांचा धातुओं से निर्मित हैं।

ऊपरी सतह से ही जो संकेत मिलते हैं, उसके मुताबिक अंदर में ऐसे धातुओं का भंडार है

जो लौह अयस्क के साथ मेल खाते हैं।

सौर आंधियों और उल्कापिंड से भी बनते हैं धातु

वैज्ञानिक मानते हैं कि चांद पर लगातार होने वाले सौर किरणों की बारिश के दौरान सौर आंधियों का भी असर होता है।




इस वजह से वहां सौर मंडल के कणों का जमावड़ा लगता रहता है।

इनमें भी अनेक बेशकीमती धातुओं के अंश होते हैं, जो दरअसल सौर आंधियों की वजह से

अंतरिक्ष में रासायनिक प्रतिक्रिया की वजह से पैदा होते हैं।

शोध दल यह भी मानता है कि अनेक बार चांद की सतह पर गिरने वाले उल्कापिंडों के साथ भी

अनेक बेशकीमती धातु वहां की संरचना में शामिल हो गये हैं।

लेकिन वैज्ञानिक इस कल्पना से उत्साहित हैं कि जहां कहीं भी धातुओं का यह भंडार होगा

वह पृथ्वी पर पायी जाने वाली खदाने के जैसी स्थिति में ही होगा।

वैज्ञानिक मानते हैं कि पृथ्वी के हिस्से से ही अलग होकर इन्हीं पदार्थों से बने चांद की

परिस्थितियां भिन्न है।

इसलिए वहां की संरचना भी काफी बदल चुकी है।

ऊपर से अनेक ऐसी प्रतिक्रियाएं वहां होती रहती हैं जो वहां की संरचना को बदलने का काम करती रहती है।

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