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दुर्लभ धातु से बने उल्कापिंड पर हब्बल टेलीस्कोप की नजर पड़ी

  • पूरी दुनिया की संपत्ति से 70 हजार गुणा कीमती

  • लोहा और निकेल तो ऊपरी सतह पर ही है

  • पृथ्वी से करीब 230 लाख प्रकाशवर्ष दूर है

  • नासा वहां यान भेजने की तैयारी में जुटा है

राष्ट्रीय खबर

रांचीः दुर्लभ धातु से बना एक उल्कापिंड भी नासा के हब्बल टेलीस्कोप की नजर में आया

है। इस दूरबीन से मिले आंकड़ों का विश्लेषण करने के बाद ही वैज्ञानिक इस नतीजे पर

पहुंचे हैं कि यह अत्यंत बेशकीमती धातुओं से बना उल्कापिंड है।

नासा के वीडियो में देखिये इसपर बनी फिल्म

एक सामान्य अनुमान क मुताबिक वहां जो धातु मौजूद है उसकी कीमत पूरी दुनिया की

सारी दौलत एकत्रित करने से भी सत्तर हजार गुणा अधिक है। इसी वजह से अब

वैज्ञानिक इसके बारे में और अधिक अनुसंधान कर रहे हैं। प्लेनेटरी जर्नल साइंस में

प्रकाशित लेख के मुताबिक उल्कापिंड की ऐसी संरचना लगातार विकिरण के कारण और

अन्य उल्कापिंडों अथवा अंतरिक्ष में मंडराते अन्य पिंडों की वजह से हुई है। इसमें लोहा

और निकेल मौजूद है। मंगल ग्रह और गुरु ग्रह के बीच यह उल्कापिंड मंडरा रहा है। जहां

पर यह वर्तमान में अवस्थित है वह पृथ्वी से करीब 230 लाख प्रकाश वर्ष की दूरी पर है।

शोधकर्ताओं का आकलन है कि दुर्लभ धातुओं से बना यह उल्कापिंड आकार में करीब 140

मील व्यास वाला है।

आम तौर पर उल्कापिंडों में अत्यंत कठोर अवस्था में पहुंच चुके बर्फ होते हैं। लेकिन

एस्ट्रायड 16 साइक नाम का यह उल्कापिंड दूसरों से भिन्न है। इसका अधिकांश हिस्सा ही

धातुओ से बना है। उसके बाहरी छोर पर ही लोहा और निकेल के अंश पाये गये हैं। कुछ

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह यह एक ग्रह बनने की प्रक्रिया में था लेकिन किसी खास

वजह से यह बीच में ही अवस्था बदलकर उल्कापिंड हो गया। हो सकता है कि ग्रह बनने

की प्रक्रिया के बीच ही उसे किसी अन्य पिंड जोरदार टक्कर मारी होगी, जिसकी वजह से

उसकी रचना बीच में ही अधूरी रह गयी। खगोल विज्ञान की भाषा में इस किस्म की

अवस्था को प्रोटोप्लैनेट भी कहते हैं।

वहां से मिले चित्रों और आंकड़ों के मिलान के बाद जब पैरावैगनी किरणों की जांच की गयी

तो धातु होने की पुष्टि हो गयी। इस शोध प्रबंध के मुख्य लेखक डॉ ट्रेसी बेकर ने कहा कि

आम तौर पर मेट्रोयट धातु के बने होते हैं।

दुर्लभ धातु से बना उल्कापिंड पहली बार मिला है

यह पहला मौका है जब कोई ऐसा उल्कापिंड मिला है। जिस स्थान पर यह चक्कर काट

रहा है, वहां के दोनों छोर के पैरावैगनी तरंगों की जांच की गयी है। इसके आधार पर ही वहां

के धातु का निष्कर्ष निकाला गया है। यह पाया गया है कि इसकी सतह पर ही काफी

अधिक लोहा है। इसमें इतना लोहा होने की वजह से ही इस उल्कापिंड की कीमत इतनी

अधिक आंकी गयी है। प्रारंभिक जांच में इस बात की भी पुष्टि हो गयी है कि इस उल्कापिंड

पर फिलहाल ऑक्सीकरण की प्रक्रिया भी चल रही है। यानी यह अब भी बदलाव के दौर से

गुजर रहा है। वैज्ञानिक मानते हैं कि सूर्य किरणों से होने वाले विकिरणों की वजह से यह

प्रक्रिया जारी है। डॉ बेकर ने कहा कि अभी इस पर और शोध करने की जरूरत है।

दूसरी तरफ नासा ने पहले ही इस बात का एलान कर दिया है कि वह वर्ष 2022 में स्पेस

एक्स की मदद से एक अंतरिक्ष यान इसकी शोध के लिए रवाना करेगा उल्लेखनीय है कि

कई देश अब खनिज संबंधी आवश्यकताओं को पूरी करने के लिए अंतरिक्ष से खनिज

जुटाने की परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं। सैद्धांतिक तौर पर ऐसा माना जा रहा है कि

अंतरिक्ष यान किसी खास उल्कापिंड से नमूना लेकर किसी अंतरिक्ष स्टेशन पर उसे

एकत्रित करता रहे और दूसरा अंतरिक्ष यान उसे अंतरिक्ष स्टेशन से पृथ्वी तक लाता रहे।

इससे खनिज उत्पादन की लागत को कम कर खनिज संबंधी जरूरतों को पूरा किया जा

सकेगा। नासा की इस प्रस्तावित योजना के तहत यह अंतरिक्ष यान जनवरी 2026 में

उल्कापिंड पर पहुंचेगा।

नासा ने तैयार कर ली है इस उल्कापिंड के लिए अभियान की

उसका आर्बिटर अगले दो वर्षों तक वहां रहकर उसका अध्ययन करेगा और अपने नियंत्रण

कक्ष को आंकड़े और तस्वीरें भेजता रहेगा। लेकिन इस उल्कापिंड की कीमत का अंदाजा ने

अन्य देशों को भी इसके तथा ऐसे अन्य उल्कापिंडों से अपने लिए खनिज संसाधन जुटाने

को प्रोत्साहित किया है। वैसे शोध दल के लोगों ने यह स्पष्ट किया है कि उल्कापिंड की

कीमत के बारे में उनकी कोई रूचि नहीं है। उनकी रूचि तो इसकी संरचना की बदौलत इस

सौर मंडल के क्रमिक विकास को समझना है। बाकी व्यापारिक काम सरकारों की

जिम्मेदारी है।


 

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