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प्रशांत भूषण का मामला भी न्यायपालिका की अग्निपरीक्षा

प्रशांत भूषण को सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ ने अवमानना का दोषी ठहराया है। आज

इस मुद्दे पर पुनर्विचार याचिका को भी अदालत ने खारिज करते हुए सिर्फ इतना कहा कि

रिब्यू पिटिशन पर फैसला आने तक यह सजा लागू नहीं होगी जबकि प्रशांत भूषण के

वकील ने कहा था कि अगर सजा को अगला फैसला आने तक रद्द भी कर दिया जाए तो

इससे आसमान नहीं टूट पड़ेगा। लेकिन घटनाक्रम यह साफ कर देते हैं कि इस एक मामले

को लेकर न्यायपालिका भी दो घड़ों में बंटी हुई है। प्रशांत के खिलाफ अदालती फैसले की

आलोचना करने वालों में कई सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश भी हैं। इसलिए ऐसा माना जा

सकता है कि न्याय की संवैधानिक परिभाषा में वर्तमान पीठ का फैसला शायद पूरी तरह

तर्कसंगत नहीं है, जिसका न्यायविदों ने विरोध किया है। याद रहे कि प्रशांत भूषण को

जस्टिस अरुण मिश्र की अगुआई वाली 3 जजों की बेंच ने 14 अगस्त को आपराधिक

अवमानना का दोषी ठहराया था। इस अदालती फैसले के खिलाफ 772 लोगों के ग्रुप ने

सीजेआई को पत्र लिखकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ आपत्ति दर्ज कराई थी।

रिटायर्ड जज, वकीलों और नौकरशाहों के एक समूह ने सीनियर एडवोकेट प्रशांत भूषण पर

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आलोचना करने वालों के रवैये को लेकर विरोध जताया है। 772

लोगों के इस समूह ने इस संबंध में सीजेआई को पत्र भी लिखा है। उन्होंने इस पत्र में लोगों

द्वारा न्यायपालिका को डराने और धमकाने के ट्रेंड के उभरने को लेकर भी चिंता जताई

है।

प्रशांत भूषण के पक्ष में खड़े हुए हैं अनेक न्यायविद भी

इनलोगों ने लिखा है कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब वकीलों के खिलाफ कोर्ट कोई फैसला

सुनाता है, तो वह अपमानजनक टिप्पणी कर कोर्ट को दोषी ठहराने लगते हैं। इसके चलते

सुप्रीम कोर्ट के साथ-साथ जजों को भी अपमानजनक भाषा, दुर्भावनापूर्ण हमले और

अपमानजनक टिप्पणी का सामना करना पड़ता है। पत्र में कहा गया कि यदि

न्यायपालिका को अपनी ड्यूटी और कामकाज को प्रभावी ढंग से करना है, तो कोर्ट के

गौरव और अधिकारों की रक्षा करना जरूरी हो जाता है। न्यायपालिका की नींव लोगों को

न्याय देने की क्षमता में विश्वास है। कोर्ट के फैसलों की आलोचना करने वाले लोगों की

अपमानजनक भाषा की मंशा न्यायपालिका में लोगों के विश्वास को कम करने की होती

है। इनलोगों ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से आग्रह किया कि हमें पूरी उम्मीद है कि

सुप्रीम कोर्ट ये सुनिश्चित करेगा कि ऐसे लोगों से सख्ती से निपटा जाए। लेकिन इस पूरे

घटनाक्रम पर इतना तो स्पष्ट हो गया है कि संविधान के दायरे में प्रदत्त अधिकारों पर भी

न्यायपालिका पूरी तरह तटस्थ नहीं रह पा रही है। उसके तटस्थ नहीं होने से देश के

अन्यतम मौलिक संवैधानिक अधिकार यानी बोलने की आजादी पर भी परोक्ष रुप से

पाबंदी लग रही है। यह भारतीय लोकतंत्र के लिए निश्चित तौर पर शुभ संकेत नहीं हैं। हम

उस युग में जी रहे हैं जहां सूचना क्रांति ने वाकई पूरी दुनिया को एक ग्लोबल विलेज यानी

वैश्विक गांव में बदलकर रख दिया है। सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्मों के माध्यम से पलभर

में सारी दुनिया तक सूचनाएं प्रेषित हो रही हैं। ऐसे में बोलने की आजादी से अगर किसी

संवैधानिक संस्था को ही परेशानी होने लगे तो यह गंभीर चिंता और व्यापक चिंतन का

विषय बन जाता है।

अभिव्यक्ति की आजादी पर निरंतर संघर्ष जारी है देश में

पूरे देश में इसके बाद अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार और इसकी सीमा को लेकर

नये सिरे से बहस छिड़ गयी है। सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले को लेकर सोशल मीडिया

पर बुद्धिजीवी और समाज के प्रगतिशील तबके के लोग इस अधिवक्ता का समर्थन और

विरोध में अपनी बेबाक टिप्पणियां कर रहे हैं| इसलिए सवाल यह है कि अभिव्यक्ति की

आजादी के इस अधिकार की सीमा क्या और कहाँ तक है ? संविधान के अनुच्छेद 19 (1)

(ए) में भारत के नागरिकों को बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार प्राप्त है,

साथ ही यह भी सही है कि यह अधिकार निर्बाध नहीं है। अब सवाल उठता है कि अगर

अभिव्यक्ति और बोलने की आजादी का अधिकार निर्बाध नहीं है तो इसकी ‘लक्ष्मण रेखा’

कहाँ है? क्या संविधान में प्रदत्त इस अधिकार का इस्तेमाल करके किसी व्यक्ति के बारे

में अभद्र या अश्लील भाषा का इस्तेमाल किया जा सकता है? क्या इस अधिकार का

इस्तेमाल करते समय ऐसी भाषा का प्रयोग किया जा सकता है जो दूसरों को अपमानित

करने वाली हो या किसी समूह को हिंसक रवैया अपनाने के लिये प्रेरित करने वाली हो?

प्रशांत भूषण के मामले की अंतिम परिणति भी यह तय करेगी कि भारतीय संविधान की

श्रेष्ठता की रक्षा करने में न्यायपालिका खुद को कितना तटस्थ रख पाती है अथवा जो

आरोप लगातार लगते रहे हैं, वह सही साबित होगा कि न्यायपालिका भी अब राजनीतिक

संक्रमण को वायरस से पीड़ित हो चुका है।


 

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