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प्रसार भारती में पैसा लुटाने में जुटे हैं वहां के उच्चाधिकारी




  • हर साल चौदह सौ करोड़ की लूट मची है
  • मनमाने तरीके से ले ली है वेतनवृद्धि
  • वित्त मंत्रालय से स्वीकृति भी नहीं ली
  • नीचे से ऊपर तक सभी जानते हैं इसको
सुरेश उन्नीथन

नईदिल्लीः प्रसार भारती में व्याप्त भ्रष्टाचारो की पोटली धीरे धीरे खुलने लगी है। अंदरखाने से आ रही सूचनाओ के मुताबिक इस संस्था के अधिकारी मनमाने तरीके से जनता का पैसा उड़ा रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक इस गोरखधंधे की वजह से जनता का करीब चौदह सौ करोड़ रुपया हर साल बेवजह खर्च हो रहा है।




प्रसार भारती का यह हाल अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस नारा को गलत साबित करता दिख रहा है, जिसमें उन्होंने कहा था कि न खाऊंगा और न खाने दूंगा। इस नारे की वजह से श्री मोदी को जबर्दस्त लोकप्रियता भी मिली है। लेकिन अब के घटनाक्रम इस नारे को भी गलत साबित करने लगे हैं।

इस संस्था के दस्तावेजों की जांच से यह तथ्य सामने आने लगे हैं कि वहां की फिजूलखर्ची की वजह से उसकी वित्तीय हालत लगातार कमजोर होती चली जा रही है। पहली गड़बड़ी मोडिफायड एश्युयर्ड कैरियर प्रोग्रेशन स्कीम के तहत किया गया है।

इस योजना का मकसद उन सरकारी कर्मचारियों को वित्तीय लाभ दिलाना था, जिन्हें समय पर प्रोन्नति नहीं मिल पायी है। एक सामान्य़ अनुमान ते मुताबिक वहां इस योजना का गलत फायदा उठाया गया है। जिसकी वजह से प्रसार भारती पर हर साल चौदह सौ करोड़ का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ा है।

हर जगह पर वित्तीय कमी का रोना रोने वाली सरकार इस अंधेरगर्दी को क्यों नजरअंदाज कर रही है, उसकी कहानी कुछ और ही है। जांच से स्पष्ट हो गया है कि लोगों को यह वित्तीय लाभ दिलाने के लिए जानबूझकर गलत आकलन किया गया है।




प्रसार भारती में आर्थिक संकट के बाद भी फिजूलखर्ची क्यों

सूत्रों की मानें तो इतने अधिक आर्थिक संकट से जूझते भारतवर्ष में इस किस्म की शाहखर्ची वह भी जनता के पैसे का क्यों हो रहा है, यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है क्योंकि वहां इन पर नजर रखने के लिए भी कई वरीय अधिकारी मौजूद हैं।

अब तो यह भी आरोप लगने लगा है कि इस गड़बड़ी में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधिकारियों की भी मिलीभगत है, जो जानबूझकर इस पर आंख बंद किये हुए हैं। आर्थिक लाभ दिलाने के मुद्दे पर इस मंत्रालय ने विधिवत वित्त मंत्रालय से कोई स्वीकृति भी नहीं ली है जबकि यह जरूरी था।

प्रोन्नति मिलती तब भी इतना वेतन नहीं होता

बता दें कि प्रसार भारती में अभियंत्रण सेवा के ही करीब दस हजार से अधिक लोग हैं। सभी को उच्च वेतनमान पर बिना किसी स्वीकृति के ही लाभ दे दिया गया है। इनमें से अनेक इसके योग्य भी नहीं थे। यानी एमएसीपी स्कीम का यहां दुरुपयोग हुआ है।

जानकार मानते हैं कि अगर इस स्कीम का दुरुपयोग नहीं किया गया होता तो प्रोन्नति पाने के बाद भी ऐसे लोगों का वेतन बढ़कर इतना अधिक नहीं होता। नीचे से ऊपर तक हर कोई इस गड़बड़ी को जानता है। जिनपर इसकी जांच और नियंत्रण करने की जिम्मेदारी हैं, वे भी जानते हैं कि नियमों और कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन कर जनता का पैसा लुटाया जा रहा है।

कमाई कम और इस अत्यधिक वित्तीय बोझ की वजह से प्रसार भारती लगातार आर्थिक तौर पर कमजोर होती चली गयी है। यह स्थिति जारी रहने की वजह से अब विशेषज्ञों में यह सवाल भी उठने लगा है कि प्रसार भारती के मामले में प्रधानमंत्री का भ्रष्टाचार विरोधी नारा कहां गुम हो गया है।



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