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राज्यसभा चुनाव में जोर आजमाइश की रणनीति

राज्यसभा चुनाव की गरमाहट फिर से झारखंड में महसूस की जाने लगी है। जाहिर है कि

ऐसा होना पहले से ही तय माना जा रहा था। लेकिन झारखंड विधानसभा में जारी बजट

सत्र के दौरान इस राज्यसभा चुनाव में लगने वाल दांव-पेंच का राज्य की राजनीति पर भी

असर पड़ना तय है। सामान्य समीकरणों के मुताबिक इस चुनाव में सत्ता पक्ष को एक

और विपक्ष को एक सीट मिल सकता है। इन्हीं दो सीटों के लिए चुनाव होना है। लेकिन

सफल राजनीति तो दोनों सीटों को अपने पक्ष में करने की होती है। ऐसा पहले भी होता रहा

है जब झारखंड के लिए राज्यसभा चुनाव में सामान्य गणित के समीकरण विफल साबित

हुए हैं। लिहाजा यह माना जा सकता है कि पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास के कार्यकाल के

दौरान जिस स्टिंग ऑपरेशन की सीडी का खुलासा एक अन्य पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल

मरांडी द्वारा किया गया था, उस पर फिर से चर्चा होने जा रही है।

इसी मामले में हाल ही में वरिष्ठ आइपीएस अधिकारी अनुराग गुप्ता को हेमंत सोरेन की

सरकार ने निलंबित भी कर दिया है। यह बड़ा सवाल है कि चुनाव आयोग के निर्देश के बाद

भी अगर पूर्व सरकार ने उक्त अफसर पर कार्रवाई नहीं की तो अब की कार्रवाई के बाद इस

विलंब की सफाई भी पूर्व की सरकार यानी रघुवर दास के पक्ष के लोग दें। इस मामले में

तत्कालीन मुख्यमंत्री के सलाहकार अजय कुमार का नाम भी आया था। प्राथमिकी में

जिन लोगों के नाम हैं, उनका मुद्दा राज्यसभा चुनाव के जोड़-तोड़ के दौरान फिर से चर्चा में

आना भी तय है। सामान्य मोर्चाबंदी के तहत सत्तारूढ़ महागठबंधन की तरफ से एक सीट

पर पूर्व मुख्यमंत्री और झामुमो प्रमुख शिबू सोरेन के चुने जाने की चर्चा हो रही है।

राज्यसभा चुनाव भी देगा जोर आजमाइश का मौका

लेकिन दोनों खेमा एक एक सीट और की रणनीति पर काम कर रहे हैं। भाजपा में दो सीटों

पर दो नामों की चर्चा तेज हो चुकी है। जाहिर है कि इस रणनीति की चर्चा से यह माना जा

सकता है कि दोनों ही खेमा एक दूसरे के मोर्चाबंदी के अंदर सेंध लगाने की संभावनाओं को

तलाश रहे हैं। यह काम झारखंड में पहले भी होता आया है। अजीब स्थिति यह है कि क्रास

वोटिंग की चर्चा अनेकों बार होने के बाद भी आज तक यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि आखिर

क्रास वोटिंग करता कौन है। जिन मामलों में क्रास वोटिंग करने वालों का खुलासा हो जाता

है, चुनाव के बाद कोई यह नहीं कहता कि आखिर इस क्रास वोटिंग का असली मकसद

क्या था। कई बार झारखंड के राज्यसभा चुनाव में अचानक ही धूमकेतु की तरह आने वाले

चंद धनपशुओं के नामों की चर्चा से यह समझा जा सकता है कि दरअसल इस सीट पर पैसे

के बल पर आसीन होने की प्रवृत्ति भी धन देने वाले और धन लेने वालों के बीच का एक

सुलभ सौदा बन जाता है। वरना इसका कोई राजनीतिक औचित्य तो स्पष्ट नहीं होता।

लेकिन मजेदार बात यह भी है कि कोई पक्ष इस बारे में खुलकर यह स्वीकार नहीं करता

कि आखिर किसी पैसेवाले का नाम अचानक से राज्यसभा चुनाव के लिए सामने कैसे आ

जाता है। अभी जो मोर्चाबंदी है उसमें साफ है कि दोनों ही खेमा में सेंध लगाने के अवसर

मौजूद हैं। दरअसल समीकरण अनुकूल नहीं होने की वजह से ही वर्तमान राज्य सरकार के

मंत्रिमंडल में एक सीट अब भी रिक्त है।

भाजपा के आंतरिक समीकरण भी अब बदल रहे हैं

दूसरी तरफ भाजपा के अंदर बाबूलाल मरांडी के आने के बाद से समीकरण तेजी से बदलते

जा रहे हैं। इन दोनों ही खेमाबंदी के बीच हमें यह भी याद रखना चाहिए कि दुमका

विधानसभा की सीट पर उपचुनाव भी होना है। एक साथ दो सीटों पर जीत हासिल करने

वाले वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा दुमका सीट छोड़ देने की घोषणा के बाद यह

चुनाव होना है। लिहाजा सारे समीकरणों को सिर्फ रांची और दिल्ली आधारित नहीं माना

जा सकता है। सरकार के मुखिया हेमंत सोरेन को इन सभी लक्ष्यों को एक साथ साधने की

जिम्मेदारी है तो दूसरी तरफ भाजपा के अंदर पहले से बने और अभी तैयार हुए समीकरणों

को एक साथ लेकर कोई फैसला करने की चुनौती है। दोनों पक्षों के लिए यह कोई आसान

काम तो हर्गिज नहीं है। ऐसे में हेमंत सोरेन और सरकार में शामिल अन्य दलों के बड़े नेता

राज्यसभा चुनाव के लिए किस फार्मूले के तहत काम करेंगे, यह देखने लायक बात होगी।

दूसरी तरफ भाजपा के अंदर पहले से चली आ रही गुटबाजी के बाद अब बाबूलाल मरांडी के

आने से एक तीसरा कोण भी तैयार हो चुका है। ऐसे में पूर्व से चला आ रहा एकाधिकार भी

समाप्त होता नजर आ रहा है। जाहिर है कि अब झारखंड भाजपा के सारे फैसले अकेले

रघुवर दास की इच्छा पर नहीं लिये जा सकते। ऐसे में चुनाव का ऊंट किस करवट बैठता है

यह देखना रोचक होगा।


 

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