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गरीबी ने पत्नी को निगला, भूखे पेट परदेश में बिलबिला रहा है पति

  • लॉकडाउन की वजह से कितने परिवार तबाह
  • गरीबी मार रही ताना, मौत बनी सजा
  • नरेश को पत्नी की आखिरी झलक भी नसीब नहीं

गढ़वा : गरीबी का तांडव वैसे तो गढ़वा जैसे पिछड़े जिले में नयी बात नहीं है। परंतु कोरोना

महामारी को लगाये गये लॉक डाउन में गरीबी वज्र के रूप में गरीबों पर प्रहार कर रही है।

इस कारण गरीबों की मौत भी होने लगी है। ताजा घटना जिले के मेराल प्रखंड के भीमखांड़

गांव की है। गांव के नरेश भुईयां तेलंगाना में मजदूरी करने गया था। जहां लॉकडाउन में

फंस गया। इधर उसकी पत्नी कमजोरी के कारण ग्रसित रोग से चल बसी। सीएम हेमंत

सोरेन की ट्वीट के बाद प्रशासन और झामुमो नेताओं ने तत्काल मदद प्रदान किया।

क्या है मामला

इंसानियत को झकझोर देने वाली इस घटना का जिक्र करें तो मिट्टी का ढ़हता टूटता घर,

छत से उजड़े छप्पर, किवाड़ विहीन दरवाजा, न खाट न पर्याप्त चादर। इसी घर से

निकलकर नरेश भुईयां हजारों किलोमीटर दूर तेलंगाना राज्य की राजधानी हैदराबाद से

20 किलोमीटर दूर मियांपुर गांव में मजदूरी करने गया। पत्नी शांति देवी विगत एक वर्ष

से कमजोरी जनित बीमारी से पीड़ित थी। जब पत्नी का रोग बढ़ने लगा तब नरेश अपने

तीन नाबालिग बच्चों और बीमार पत्नी को दोनों आंख से अंधी अपनी बुढ़ी मां के हवाले

कर परदेश चला गया। ताकि कुछ पैसे कमाकर पत्नी का इलाज करा सके। 25 मार्च को

वह घर आने वाला था। परंतु उसी दिन से देश में लॉकडाउन के कारण वह वहीं फंस गया।

गरीबी, भुखमरी व बीमारी से बिगड़ने लगी थी पत्नी की हालत

जैसे-जैसे दिन गुजरता जा रहा था नरेश की पत्नी की हालत बिगड़ती जा रही है। घर में

भोजन की व्यवस्था पीडीएस से मिले राशन से किसी तरह हो रही थी। बुढ़ी मां का विधवा

पेंशन भी तकनीकी कारण से बंद हो गया था। उपर से लॉकडाउन के कारण वाहन सुविधा

भी नहीं थी और न ही घर में कोई वैसा मेल मेंबर जो उसे इलाज के लिए बाहर ले जाए। उस

अभागन को पति के हाथों मुखाग्नि का भी अवसर प्राप्त नहीं हुआ। तेलंगाना में फंसे नरेश

को पत्नी की मौत की खबर ने झकझोर दिया और वह दहाड़ मारकर विलाप करने लगा।

मंत्री मिथिलेश ठाकुर ने सीएम से की थी मदद की मांग

गढ़वा के विधायक सह झारखंड के पेयजल एवं स्वच्छता मंत्री मिथिलेश कुमार ठाकुर ने

ट्वीटर पर सीएम से पीड़ित परिवार को मदद करने की गुहार लगायी थी। सीएम हेमंत

सोरेन ने गढ़वा डीसी को ट्वीट कर त्वरित कार्रवाई का निर्देश दिया था। डीसी के आदेश

पर जिले के एक पदाधिकारी भीमखांड़ गांव पहुंचे और पीड़ित परिवार को छ: हजार रूपये

प्रदान किये। वहीं मेराल बीडीओ ने भी 1500 रूपये का योगदान दिया। जबकि झामुमो के

मेराल के प्रखंड अध्यक्ष दशरथ प्रसाद ने 25 हजार रूपये नगद और 50 किलो चावल

पीड़ित परिवार को उपलब्ध कराया। वहीं मुखिया ने 50 किलो आटा देने का आश्वासन

किया और संवेदना जताई। जबकि एक स्थानीय ठिकेदार ने तीन हजार रूपये दिये।

न तो मिला सरकारी आवास और न ही है एक इंच जमीन

भीमखांड़ गांव में बसे नरेश भुईयां सहित कई लोगों को न तो सरकारी आवास की सुविधा

मिली है और न हीं उनके पास अपना एक इंच जमीन ही है। दरअसल भीमखांड़ गांव वन

विभाग की जमीन पर बसा हुआ है। इस गांव के मूलत जिले के मझिआंव प्रखंड के करूई

गांव के भागोडीह टोला के मूल निवासी है। तत्कालीन बिहार राज्य में नक्सल आंदोलन

जब चरण पर था। तब 1994 मेंइस टोले के नौ लोगों की हत्या नक्सली होने के आरोप में

कर दी गई थी। उसके बाद उस टोले के शेष लोग भागकर मेराल प्रखंड के बाना गांव के

समीप वन विभाग की जमीन पर अपना आशियाना डाल लिये थे। जिसका नाम भीमखांड़

रखा। अपना जमीन नहीं होने के कारण उन्हें सरकारी आवास का लाभ नहीं मिल पा रहा

है। गांव के कमल कुमार ने कहा कि नरेश भुईयां का 14 वर्षीय पुत्र गुरू भुईयां ने अपनी मां

को मुखाग्नि देकर अंतिम संस्कार किया, नरेश बस अपनी आंसु बहाकर विलाप कर पाया।

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