कोविड के बाद मानसिक तनाव से गुजरता युवा वर्ग

कोविड के बाद मानसिक तनाव से गुजरता युवा वर्ग

कोविड के बाद युवा वर्ग को मानसिक तनाव की स्थिति से गुजरना पड़ रहा है। इस युवा

वर्ग में वे खास तौर पर अधिक प्रभावित हुए हैं, जो कोरोना रोगियों की मदद के लिए

लगातार प्रयासरत थे। लॉकडाउन के दौरान भी अनेक ऑनलाइन समूह बनाकर युवाओं

की टोली ने रोगियों को हर स्तर पर मदद देन की कोशिश की है। ऐसे युवा अब महसूस

करते हैं कि रात को सोते वक्त भी उन्हें मदद की गुहार लगाते लोगों की आवाज परेशान

करती है। मानसिक दुष्प्रभाव का खुलासा तो देश भर के मनोचिकित्सकों ने भी किया है।

टीका लगवाने के लिए कतार में आखिर में तथा स्कूल और कॉलेज बंद होने से देश के

युवाओं (15 से 25 वर्ष की आयु वाले) को अपने आसपास के लोगों की रक्षा के लिए कई

कुर्बानियां देने के लिए मजबूर किया जाता है। अनेक युवा हर रोज 16 घंटे से अधिक का

वक्त समय अजनबियों को अस्पताल के बेड खोजने में मदद करने में बिता रहे हैं, जबकि

अन्य युवाओं को एक और साल केवल ऑनलाइन लर्निंग के रूप में ही निकल जाने का डर

सता रहा है। कुछ युवाओं को किसी प्रियजन या रिश्ता खाने की वजह से समझौता करना

पड़ा। इसके साथ ही रोजगार का सवाल उनके लिए बड़ी मानसिक परेशानी का कारण बन

रहा है, जो कोविड के बाद तेजी से उभरती हुई नई बीमारी है। निमहांस (राष्ट्रीय मानसिक

स्वास्थ्य और स्नायु विज्ञान संस्थान) में बाल और किशोर मनोचिकित्सा विभाग के

प्रोफेसर एवं प्रमुख के जॉन विजय सागर कहते हैं कि इस वैश्विक महामारी के बाद से मैंने

आधे से अधिक युवा-वयस्कों को पहली बार मदद मांगते हुए देखा है।

कोविड के बाद मानसिक तनाव महसूस किया गया है

पिछले साल जब कोविड के मामले बढ़े, तो निमहांस के मनोरोग चिकित्सा विभाग को

आंशिक रूप से कोविड देखभाल केंद्र में तब्दील कर दिया गया था। गंभीर अवसाद और

चिंता के लक्षण वाले पहले से अधिक नवयुवकों ने इसके आपातकालीन सेवा विभाग का

दौरा करना शुरू कर दिया। देश के कई अन्य केंद्र भी इस किस्म की मानसिक परेशानियों

से उबरने में रोगियों की मदद कर रहे हैं। मध्यम आयु वर्ग वाले कई रोगियों ने इस दूसरी

लहर में वायरस के कारण दम तोड़ दिया। अब उनके पास किशोर बच्चों का इलाज चल

रहा है। कई मनोचिकित्सक मानते हैं कि अपने घर में और आस पास हुई मौतों का भी

गंभीर कुप्रभाव बच्चों और युवाओं पर सबसे अधिक पड़ा है। यह उनके लिए ऐसी चुनौती

थी, जिसका उन्हें कोई पूर्व अनुभव प्राप्त नहीं था। बड़ों में लोगों की मौत देखने का एक

अभ्यास होता है लेकिन कम उम्र के लोग पहले महामारी के ऐसे विकराल स्वरुप से उपजे

इन खतरों को नहीं जानते थे। लिहाजा उनपर इसका असर हुआ है और चिंता की बात यह

है कि अधिकांश ऐसे पीड़ित खुद अपनी इस बीमारी के बारे में भी नहीं जानते हैं। वे नहीं

समझ पा रहे हैं कि उनकी दिनचर्या क्यों बिगड़ गयी है। ऐसे में खास तौर पर युवाओं में

नशे की तरफ आकर्षित होना सबसे बड़ा खतरा है। बहुत सारे युवा भी अपने घरों में

अकेलापन महसूस कर रहे हैं और निजता, दोस्तों के साथ वक्त बिताने तथा रिश्ते बनाए

रखने को लेकर चिंतित हैं। उनमें से एक ने बताया कि वे किस तरह अपनी कई खास चीजों

को याद करते हैं, जैसे कॉलेज का पहला दिन, कॉलेज फेस्टिवल, कैंटीन का खाना और यहां

तक कि किसी अच्छी लाइब्रेरी में जाना भी।

लगातार लॉकडाउन के बीच बुरी खबरों ने बुरा असर डाला है

यहां तक कि सोशल मीडिया, जो कई लोगों के लिए बेहतर टाइम पास था, बदल चुका था।

हर टाइमलाइन सहायता के अनुरोधों और निधन की सूचना से भरी हुई थी। कई प्रमुख

शैक्षणिक संस्थान अब इस विषय पर भी वेब या टेलीफोन पर परामर्श सत्र आयोजित

करता है और छात्रों के साथ भावनात्मक स्वास्थ्य के संबंध में डिजिटल सामग्री साझा

करता है। लैंसेट में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार यह इसलिए महत्त्वपूर्ण माना

जाता है, क्योंकि भारत में 15 से 29 वर्ष की आयु वालों में आत्महत्या से मरने का जोखिम

सबसे ज्यादा होता है। जो बच्चे पहले से ही खुद को समुदाय से हाशिये पर महसूस कर रहे

थे, उन्होंने स्कूलों, विशेष जरूरत वाले विभागों और चिकित्सा पर भरोसा किया। कई

बच्चों के मामले में यह सब उनसे छीन लिया गया है। खास जरूरत वाले युवा भी अपने

लिए उपलब्ध चिकित्सा सेवाओं को लेकर अनिश्चित हैं और कहते हैं कि उन्हें इस बात का

कोई भान नहीं है कि उन्हें इंजेक्शन कैसे लगेगा, क्योंकि अधिकांश टीकाकरण केंद्र पहुंच

से बाहर हैं। ऐसे में कोविड के बाद जो नई चुनौतियां आ खड़ी हुई हैं उनके बारे में भी विचार

किया जाना चाहिए।

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