लोकसभा चुनाव में टूटती भाषा की मर्यादा

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लोकसभा का चुनाव कई किस्म के कड़वे अनुभव भी देता जा रहा है।

यूं कहें तो पहले भी चुनाव के दौरान सामान्य शिष्टाचार को ताक पर

रखकर ही नेतागण चुनाव प्रचार किया करते थे।

इस बार यह तल्खी काफी अधिक है।

बड़े दलों के साथ साथ अब दूसरी पार्टियां भी इस लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन कर रही हैं,

यह मतदाता के लिए नहीं बल्कि राजनीतिक दलों के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

इसके कुछ उदाहरणों को लें तो हम पाते हैं कि भाजपा और कांग्रेस के अनेक नेता

बार बार ऐसी भाषा और टिप्पणियों का इस्तेमाल कर रहे हैं जो

आम तौर पर शिष्टाचार की भाषा नहीं होती है।

राजनीतिक मुद्दों पर प्रचार के दौरान जब कोई व्यक्ति निजी टिप्पणियों पर उतर आता है

तो यह समझ लेना चाहिए कि उसके पास अपनी तरफ से बेहतर कुछ कहने को नहीं है

और वह दूसरे की लकीर को मिटाकर अपनी लकीर बड़ी करने की कोशिश कर रहा है।

दुर्भाग्य है कि इस कड़ी में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी शामिल हो गये हैं,

जिन्हें राजधानी यानी सबसे समझदार लोगों के इलाके का प्रचंड बहुमत से जीतने वाली पार्टी का नेता माना गया है।

दिल्ली के मुख्यमंत्री और आप संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भाषा की मर्यादा तोड़ते हुए

कहा कि इस देश के लिए मोदी के पिता ने कुबार्नी नहीं दी है

बल्कि भगत सिंह ने दी है।

केजरीवाल ने कहा कि दिल्ली के लोगों को मजबूर मत करो, तुम्हारे घर मे घुसकर अपना हक ले लेगी।

इससे पहले केजरीवाल ने ट्वीट कर राहुल गांधी से गठबंधन पर सोचने की अपील भी की थी।

केजरीवाल ने कहा कि देश के लोग अमित शाह और मोदी जी की जोड़ी को हराना चाहते हैं।

अब कांग्रेस की तरफ लौटते हैं तो प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि

न नौकरी, ना रोजगार, युवाओं के भविष्य में फैलाया अंधकार,

अर्थव्यवस्था का बंटाधार, झोला उठा हो जाइये जाने को तैयार, इस बार जनता बदलेगी ये निकम्मी सरकार।

उन्होंने कहा मोदीनामिक्स अब पकौड़ानामिक्स हो गया है।

रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि मोदी सरकार की नीति अयोग ने फरवरी 2018 में स्वीकार किया है कि

भारत ‘असंतोषजनक नौकरियों और बेरोजगारी’ से त्रस्त है।

अखिल भारतीय निमार्ता संगठन ने भी दिसंबर 2018 में कहा कि 2016 के बाद से अकेले सेक्टर में 35 लाख नौकरियों का नुकसान हुआ,

जिसके दो मुख्य कारण नोटबंदी और जीएसटी है।

इन घटिया किस्म के प्रचारों के बीच कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के

चेन्नई के कार्यक्रम को एक बेहतर संकेत के तौर पर देखा जा सकता है।

वैसे उन्होंने भी प्रधानमंत्री के लिए चौकीदार चोर है नारे का ईजाद किया है।

जिससे भाजपा को बहुत परेशानी है और यह शिष्टाचार की भाषा तो कतई नहीं है।

यह अलग बात है कि अपने लिए चौकीदार शब्द का इस्तेमाल खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था।

श्री गांधी ने चेन्नई के स्टेला मेरिस कॉलेज में छात्राओं से उन्होंने कहा कि

कांग्रेस देश के मिजाज को बदल देगी और लोगों को खुश एवं सशक्त महसूस कराएगी।

अच्छी बात यह रही कि अपने जीजा रॉबर्ट वाड्रा पर पूछे गए सवाल के जवाब में

गांधी ने कहा कि कानून हर किसी पर लागू होना चाहिए न कि चुनिंदा लोगों पर।

गांधी ने कहा कि मैं यह कहने वाला पहला शख्स हूंगा कि रॉबर्ट वाड्रा की जांच करें

लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भी करें।

उन्होंने कहा कि उन्हें अपनी मां सोनिया गांधी से प्रेम एवं विनम्रता की सीख मिली है।

वैसे इस शालिनता भरे माहौल मे भी वह एक गंभीर सवाल निश्चित तौर पर

नरेंद्र मोदी के लिए छोड़ गये कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

इतनी बड़ी भीड़ के बीच खड़े होकर लोगों के सवालों का जवाब दे सकते हैं।

केजरीवाल के सवालों पर दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष मनोज तिवारी ने

उत्तर तो दिया है पर श्री तिवारी भी इस बात का संतोषजनक उत्तर देने से चूक गये

कि आखिर पार्टी ने जब अपने चुनाव घोषणा पत्र में दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने का वादा किया था

तो पिछले पांच वर्षों में भाजपा ने इस मुद्दे पर चुप्पी क्यों साध ली।

सामान्य मर्यादा लांघते राजनीतिक दलों के लिए चिंता का विषय यह है कि

देश के डेढ़ करोड़ नये मतदाताओ के साथ साथ युवा वोटरो को इस किस्म की भाषा रास नहीं आ रही है।

उन्हें तो अपने जीवन से जुड़े मुद्दों पर उत्तर चाहिए।

इसलिए असली मुद्दों की बात करे बिना मतदाताओं को अपने पक्ष में करना

हर दल के लिए दिनोंदिन कठिन होता जा रहा है।

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