अब रांची तक पहुंच गयी बहुचर्चित सृजन घोटाले की आंच

पुलिस के मुताबिक सृजन घोटाले के अभियुक्तों का लोकेशन रांची में अभियुक्तों की तलाश में पुलिस टीम रांची भी पहुंची

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दीपक नौरंगी

सृजन घोटाले के तार अब रांची से जुड़े चुके हैं.

मामले में अभियुक्त बनाये गये सृजन के पदाधिकारी रांची में ही छिपे हुए हैं.

पुलिस की नजर में फरार चल रहे अभियुक्तों का मोबाइल लोकेशन रांची में दर्ज हुआ है.

सृजन के पदाधिकारी अमित कुमार की पत्नी प्रिया कुमारी रांची की रहने वाली है.

प्रिया कुमारी के पिता कांग्रेस के बड़े नेता हैं.

बिहार और झारखंड के ही नहीं दिल्ली मैं बैठे बड़े नेता से भी प्रिया कुमारी की जान पहचान है. भागलपुर पुलिस रांची के लिए रवाना हो चुकी है.

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अब देखना यह है कि सृजन घोटाले के मास्टरमाइंड अमित और प्रिया पुलिस की गिरफ्त में कब आते हैं.

सीबीआइ जांच की अनुशंसा किये जाने के बाद इसकी चर्चा बिहार से बाहर होने लगी है.

सृजन संस्था का पूरा नाम ‘सृजन महिला विकास सहयोग समिति’ है.

1991 मनोरमा देवी के पति अवधेश कुमार रांची के लाह अनुसंधान में वरीय वैज्ञानिक के रूप में पद स्थापित थे.

उनके निधन के बाद मनोरमा देवी रांची से भागलपुर चली गई.

 वहां वह अपने बच्चों को लेकर सबौर में एक किराए का कमरा लेकर रहने लगीं.

ऐसे हुई थी सृजन की शुरुआत

1993-94 में मनोरमा देवी ने दो महिलाओं के साथ सृजन संस्था की शुरूआत की.

वर्ष 1996 में सहकारिता विभाग में इसका पंजीयन हुआ.

काम आगे बढ़ा तो सदस्यों को कर्ज भी दिया जाने लगा.

महिलाओं को उनके द्वारा जमा कराये गये पैसों पर ब्याज भी मिलता था.

मनोरमा देवी ने एक सिलाई मशीन लेकर कपड़ा सिलने का काम शुरू किया.

कपड़े तैयार कर बाजार में बेचा जाने लगा.

काम अधिक आने पर मनोरमा देवी ने रजंदीपुर पैक्स से 10 हजार रुपये कर्ज लिया.

कपड़े सिलने और बाजार में आपूर्ति बढ़ने से मनोरमा देवी ने स्वयं सहायता समूह बनाना शुरू कर दिया.

इन महिलाओं को स्वरोजगार के जरिये अपनी संस्था ‘सृजन’ से जोड़ने लगीं.

‘सृजन संस्था’ का कद धीरे-धीरे बढ़ा

सिलाई-कढ़ाई का काम भी बढ़ता गया. एक से बढ़ कर कई सिलाई मशीनों पर काम होने लगा.

महिलाओं की संख्या भी बढ़ने लगी.

इसके बाद वर्ष 1996 में मनोरमा देवी ने ‘सृजन महिला विकास सहयोग समिति’ नाम से निबंधन कराया.

साथ ही मनोरमा देवी संस्था में सचिव के रूप काम करने लगीं.

समिति की स्थिति देख सहकारिता बैंक ने 40 हजार रुपये का लोन पास कर दिया.

काम से प्रभावित होकर सबौर स्थित ट्रायसम भवन में समिति को अपनी गतिविधियों के आयोजन की अनुमति भी मिल गयी.

बाद में जिलाधिकारी ने 200 रुपया महीने पर संस्था को कमरा 35 साल की लीज पर दे दिया.

ऐसे शुरु हुआ सृजन का घोटाला

जानकारों की माने तो घोटाले का खेल वर्ष 2002 से घोटाले का खेल शुरू हुआ.

सन 2003 में मनोरमा देवी के देवर सुनील कुमार की संदिग्ध व्यवस्था में पटना में मौत हो गई थी.

भागलपुर पुलिस इस मामले की जांच करने के लिए सबौर की संस्था में मनोरमा देवी से जाकर पूछताछ की थी.

लेकिन उसके बाद क्या हुआ कहना मुश्किल है.

2007-08 में सृजन को-ऑपरेटिव बैंक खुल जाने के बाद से घोटाले का ऑपरेटिव खेल तेजी आती गयी.

सृजन में स्वयं सहायता समूह के नाम पर कई फर्जी ग्रुप बनाये गये.

उनके खाते भी खोले गये और इन खातों के जरिये नेताओं और नौकरशाहों का कालाधन सफेद किया जाने लगा.

कैसे होता था सृजन घोटाला

चेक के पीछे ‘सृजन’ की मुहर लगाते हुए हस्ताक्षर कर दिया जाता था.

चेक का भुगतान सृजन के उसी बैंक में खुले खाते में हो जाते थे.

जब भी कभी संबंधित विभाग को अपने खाते की विवरणी चाहिए होती थी, तो फर्जी विवरणी दे दी जाती थी.

इस तरह विभागीय ऑडिट में भी अवैध निकासी पकड़ में नहीं आ पाती थी.

उस समय बिहार में जदयू-भाजपा की सरकार थी. वित्त लय का प्रभार सुशील कुमार मोदी के पास था.

ऑडिटर ने जतायी थी सृजन पर आपत्ति

आॅडिटर ने यह गड़बड़ी पकड़ ली और आपत्ति जतायी.

उसने लिखा था कि सरकार का पैसा को-आॅपरेटिव बैंक में कैसे जमा हो रहा है?

तत्कालीन डीएम विपिन कुमार ने सभी बीडीओ को पत्र लिखा कि पैसा ‘सृजन’ के खाते में जमा नहीं करें.

इसके बावजूद सब कुछ पहले जैसा ही होता रहा.

आखिर कोई जिलाधिकारी किसके आदेश पर सरकारी विभागों का पैसा ‘सृजन को- को-ऑपरेटिव बैंक’ के खाते में भेज रहा था? यहां पदस्थापित होनेवाले दूसरे कई जिलाधिकारियों ने भी ऐसा होने दिया.

25 जुलाई, 2013 को रिजर्व बैंक ने बिहार सरकार से कहा था कि इस को-आॅपरेटिव बैंक की की जांच करें.

वर्ष 2013 में जिलाधिकारी प्रेम सिंह मीणा ने ‘सृजन’ पर जांच टीम गठित कर दी थी.

अब फिर यह मामला गर्म हो गया है.

भागलपुर एसएसपी मनोज कुमार ने बताया कि आधा दर्जन से भी अधिक लोग आज जेल जाएंगे.

कई महत्वपूर्ण ठिकाने का पता चला है जहां आज छापामारी की जाएगी.

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