Press "Enter" to skip to content

फिर अपनी बात से मुकर गये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी




फिर अपनी बात को खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गलत साबित कर दिया। संसद का शीतकालीन सत्र प्रारंभ होने के पहले उन्होंने हर विषय पर चर्चा की बात कही थी। इधर कल यानी सत्र के पहले ही दिन जो कुछ देखने को मिला, उससे साफ हो गया कि वह वाकई अब विपक्ष के साथ चर्चा करने से पीछे हटने लगे हैं।




यह आरोप उनपर पहले भी लगता रहा है लेकिन इस बार चूंकि तीन कृषि कानूनों की बात थी सो लोगों को उम्मीद थी कि शायद इस पर चर्चा हो। इन तीनों कृषि कानूनों पर चर्चा की उम्मीद इसलिए की जा सकती थी क्योंकि यह लगभग स्पष्ट हो गया था कि इन कानूनों की वापसी के विरोध में कोई भी नेता संसद में अपना बयान नहीं देता।

सभी इन कानूनों की वापसी के पक्ष में ही बोलते लेकिन इसके बाद भी चर्चा का नहीं होना कोई दूसरा ही संकेत देने लगा है। संसद में जिस तेजी से इन कानूनों को पारित किया गया था, लगभग उसी गति से उन्हें वापस लेने क प्रस्ताव भी पारित कर दिया गया।

बिना किसी चर्चा के सिर्फ ध्वनि मत के आधार पर फिर से एक बार ऐसा हुआ। इससे विरोधियों को नये सिरे से यह कहने का मौका मिल गया है कि दरअसल श्री मोदी का लोकतंत्र पर भरोसा नहीं है अथवा अब वह विरोधियों की बातें सुनने से डरने लगे हैं।

संसद के भीतर इस किस्म के आचरण पर भले ही कोई कुछ कहे लेकिन यह स्पष्ट होता जा रहा है कि दरअसल उत्तरप्रदेश में तेजी से बिगड़ते चुनावी समीकरण से भाजपा अब चिंतित है। भाजपा के अपने संगठन के माध्यम से किये गये सर्वेक्षणों में ही यह साफ हो गया था कि इस किसान आंदोलन की वजह से भाजपा को कमसे कम सत्तर सीटों का नुकसान होने जा रहा है।

उत्तर प्रदेश में माहौल बदलने का अंदेशा हो रहा है

इसके बाद भी उन सर्वेक्षणों में यह स्पष्ट था कि सीट कम होने के बाद भी अंततः भाजपा ही वहां सरकार बनाने में कामयाब होगी। लेकिन इस सर्वेक्षण के बाद बहुत सारे समीकरण तेजी से बदलते चले गये हैं जिस कारण अब भाजपा का सरकार बनाने का अंतर तेजी से घटता भी चला गया है। यह स्थिति निश्चित तौर पर भाजपा और खासकर नरेंद्र मोदी को चिंतित करने वाली ही है।

शायद इसी वजह से अब मोदी किसी बहस में उलझने के बजाए उत्तरप्रदेश के नाराज मतदाताओं को अपन पाले में करने पर अधिक जोर देने लगे हैं। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि यह भारतीय राजनीति का स्थापित सिद्धांत है कि दिल्ली दरबार का रास्ता अंततः उत्तरप्रदेश से होकर ही निकलता है।




इतने बड़े राज्य में सीट कम होने का अखिल भारतीय परिणाम क्या हो सकता है, यह सामान्य राजनेता भी अच्छी तरह समझते हैं। लेकिन विरोधियों से बिना चर्चा के तीनों कृषि कानूनों की वापसी के बाद भी श्री मोदी की परेशानी कम होती नजर नहीं आ रही है।

दिल्ली की सीमा पर बैठे किसानों का साफ साफ कहना है कि वे जिन मुद्दों पर आंदोलन के लिए यहां आये थे, उन मुद्दों पर कोई ठोस निर्णय होने तक वह वापस नहीं लौटेंगे। अगर फिर भी दिल्ली की सीमा पर फिर भी किसान इसी तरह डटे रहते हैं तो उसका क्या चुनावी प्रभाव होगा, यह अब स्पष्ट होता चला जा रहा है।

ऐसे में किसानों की मांगों में एमएसपी और साढ़े सात सौ से अधिक किसानों को शहीद का दर्जा देने का पेंच फंसा हुआ है। देश के कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर भले ही लोकसभा में कृषि कानूनों की वापसी का प्रस्ताव पेश कर चुके हैं लेकिन अपने पूर्व बयानों की वजह से वह दोबारा इन आंदोलनकारी किसानों के सामने सर उठाकर बात कर पायेंगे, उसकी बहुत कम संभावना है।

फिर अपनी बात को कैसे बदलेंगे, यह सवाल भाजपा के अंदर भी

फिलहाल भाजपा के खेमे की बात करें तो एक मात्र जाट नेता सत्यपाल मलिक ही भाजपा के तारणहार साबित हो सकते हैं, जिन्होंने प्रारंभ से ही किसानों की मांगों को न सिर्फ जायज ठहराया है बल्कि इस आंदोलन के अधिक लंबा खींचने के खतरों पर भी साफ साफ अपनी बात रखी है।

किसान नेता राकेश टिकैत कहते हैं कि एक साल से जो किसान सड़कों पर बैठकर भाजपा और उनके समर्थकों की गालियां सुनते रहे हैं, वे अपनी मांगों पर बिना किसी फैसले के घर कैसे लौट सकते हैं।

इन तमाम घटनाक्रमों को अगर एक सिरे में पिरोकर देखा जाए तो समझा जा सकता है कि भाजपा जिस वजह से कृषि कानूनों को इतनी तेजी से वापस ले रही है, वह मसला किसानों को भी समझ में आ रहा है।

दूसरी तरफ विरोधी भी इस बार मोदी के किले में दिख रही दरारों को और चौड़ा करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। लिहाजा यह स्पष्ट है कि हर बार बिना बात के मनमाने ढंग से फैसला लेने की मोदी की आदत अब उन्हीं के लिए भारी पड़ती नजर आ रही है।



More from ताजा समाचारMore posts in ताजा समाचार »
More from राज काजMore posts in राज काज »

Be First to Comment

Leave a Reply

%d bloggers like this: