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प्लास्टिक खुद को खाकर पूरी तरह खत्म कर देगा

  • वैज्ञानिकों ने खुद नष्ट होने वाला प्लास्टिक बनाया

  • दुनिया की बहुत बड़ी समस्या है यह प्रदूषण

  • समुद्र की गहराई तक में है इसका कुप्रभाव

  • इसका एंजाइम ही इसे खाकर नष्ट करेगा

राष्ट्रीय खबर

रांचीः प्लास्टिक खुद को खाकर नष्ट कर लेगा। यानी यह अब हमारे पर्यावरण के लिए

भविष्य में समस्या नहीं रहेगी। एक बार इस्तेमाल होने वाले वैसे प्लास्टिक को बनाने में

सफलता मिली है जो दो सप्ताह में खुद को खाकर समाप्त कर लेगा। इससे प्लास्टिक की

वजह से पूरी दुनिया में निरंतर बढ़ रही परेशानी से मुक्ति का एक सफल मार्ग मिल गया

है। वर्तमान में प्लास्टिक के कचड़ों का एकत्रित होना पूरी दुनिया के लिए एक बहुत बड़ा

खतरा बन गया है। यहां तक की समुद्र की गहराई में भी यह प्रदूषण समुद्री जीवन और

पर्यावरण को तेजी से नुकसान पहुंचाता जा रहा है। इससे मुक्ति का शायद यह मार्ग बेहतर

विकल्प साबित होगा। बर्कले लैब और यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के वैज्ञानिकों ने इस

प्रयोग को सफलतापूर्वक अंजाम दे दिया है। इन वैज्ञानिकों ने प्लास्टिक के अंदर वैसा

एंजाइम जोड़ दिया है जो उसे खुद ही खाकर खत्म कर देगा। यानी जमीन पर पड़े होने के

दो सप्ताह के भीतर यह अपने आप ही कंपोस्ट श्रेणी का प्लास्टिक बना देगा। इससे खेतों

के बंजर होने अथवा समुद्री जीवन पर प्लास्टिक के खतरे को तेजी से काम किया जा

सकेगा। इससे जो पदार्थ बचा रह जाएगा, उसकी फिर से रिसाइक्लिंग हो सकेगी और यह

कचड़ा नहीं बनेगा। इसके लिए वैज्ञानिकों ने उसमें मोनोमर को जोड़ा है, जो इसे खुद ही

खाकर नष्ट कर देता है। इस शोध से जुड़े वरीय वैज्ञानिक टिंग जू ने कहा कि जब हमलोग

या कोई भी जीवित प्राणी मर जाते हैं तो शरीर के अंदर मौजूद एंजाइम ही हमें नष्ट करता

चला जाता है। इसी सोच के आधार पर इस नये किस्म के प्लास्टिक का विकास किया

गया है। टिंग जू इस विश्वविद्यालय के केमिस्ट्री एंड मैटेरियल्स साइंस के प्रोफसर हैं।

प्लास्टिक खुद को खत्म करने की विधि टिंग जू की टीम की है

वर्तमान में पूरी दुनिया के मात्र नौ प्रतिशत प्लास्टिक को रिसाइकिल किया जा रहा है।

इसके अलावा शेष किसी न किसी स्तर पर जमीन को बंजर बनाता हुआ नदियों के सहारे

समुद्र तक पहुंच रहा है और पूरी दुनिया के लिए खतरा बनता जा रहा है। बॉयोडिग्रेडेबल

प्लास्टिक बैग तो बन रहे हैं लेकिन उनका भी सही तरीके से रिसाइकिल नहीं होने से

समस्या बढ़ती जा रही है। साथ ही यह खतरा भी है कि खुद ही नष्ट होने में ऐसे प्लास्टिक

बहुत समय लेते हैं। इस बीच वे मवेशियों के पेट तक पहुंचकर नई किस्म की परेशानी पैदा

करते हैं। इन सारी समस्याओँ को ध्यान में रखते हुए जू और उनके साथियों ने यह काम

पूरा किया है। इस काम को अंजाम देने में कई विभागों के वैज्ञानिकों ने मिलकर काम पूरा

किया है। जू और उनकी टीम ने इस समस्या से निपटने के लिए बिल्कुल नया रास्ता चुना

है। इनलोगों ने प्लास्टिक में नैनो स्तर पर एंजाइम जोड़ने की पद्धति पर काम किया।

इसके लिए टीम ने कई तरीके से प्रयोग किये और एक एक कर रास्ते के अवरोधों को

समाप्त किया। जू और उनकी टीम ने व्यापारिक एंजाइम के जरिए इस काम को आगे

बढ़ाया और इसमें बुखोल्डेरिया सिपासियन एंजाइम के साथ प्रोटिनेज के का समावेश

किया। इसमें फोर मोनोमर नामक एंजाएम प्रोटेक्टंट भी जोड़ा गया। वैज्ञानिकों ने पाया

कि सामान्य नल के पानी या सामान्य जमीनी कॉम्पोस्ट ने इसके ढांचे के तेजी से टूटने में

मदद की और कुछ ही दिनों में यह साफ साफ दिख गया। शोध में देखा गया कि बीसी

लिपासे एक प्लास्टिक खाने वाले साबित हो रहा है। यह पॉलिमर के एक छोर को पकड़ने

के बाद अंतिम सिरा तक उसे खाकर समाप्त कर देता है। गर्म पानी या कंपोस्ट के संपर्क

में आने पर यह प्रक्रिया तेज हो जाती है।

यह सामान्य जल या मिट्टी के संपर्क में आकर नष्ट होता है

इसके बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए बताया गया है कि इस किस्म के प्लास्टिक को

सात माह तक सुरक्षित रखा जा सकता है। साथ ही इसकी लागत भी अत्यधिक नहीं है।

आम तौर पर घरेलू काम काज में इस्तेमाल होने वाले सभी किस्म के प्लास्टिकों का यह

बेहतर विकल्प बन सकता है। अब यह टीम इसके पेटेंट के लिए आवेदन दे चुकी है। शोध

दल अपनी इस प्रारंभिक उपलब्धि से उत्साहित होकर प्लास्टिक आधारित खिलौने तथा

इलेक्ट्रानिक उत्पादों में भी ऐसा ही सुधार करने की दिशा में भी अपना अनुसंधान प्रारंभ

कर चुकी है।

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