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प्लास्टिक के कचड़े के निष्पादन की नई तकनीक विकसित

  • पूरी दुनिया के लिए कोरोना से बहुत बड़ा खतरा बनता जा रहा

  • पर्यावरण के लिए बहुत बड़ा खतरा बन चुका है यह उत्पादन

  • हिमालय से लेकर समुद्र की गहराइयों तक फैला है कचड़ा

  • हर काम में इस्तेमाल होगा सस्ती लागत का उत्पादन

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः प्लास्टिक के कचड़े दुनिया के हर इलाके में फैल चुके हैं। माउंट एवरेस्ट की

चोटियों से लेकर प्रशांत महासागर की गहराइयों तक के जीवन और पर्यावरण पर इसका

असर पड़ चुका है। वैज्ञानिक जांच में यह प्रमाणित हो चुका है कि प्लास्टिक के अति सुक्ष्म

कण इंसानी जीवन को भी खतरे में डाल रहे हैं। इसके बाद भी लगातार होते प्लास्टिक के

इस्तेमाल की वजह से इसके ढेर बढ़ते जा रहे हैं। दरअसल जिस रासासनिक प्रक्रिया के

तहत इसे बनाया गया है, उसमें इसके लंबे समय तक टिके होने की परिकल्पना थी। अब

काफी लंबे समय तक टिके होने और नष्ट नहीं होने की यही सोच दुनिया के लिए कोरोना

के मुकाबले अधिक बड़ा खतरा बन चुकी है। दुनिया के हर हिस्से में इस कचड़े को कम

करने की मुहिम चल रही है लेकिन जितना हम साफ कर पा रहे हैं, उससे अधिक हर रोज

इकट्ठा भी होता जा रहा है।

इसी प्लास्टिक के कचड़े के निष्पादन की सस्ती तकनीक अब हमें इससे मुक्ति भी दिला

सकती है। वैज्ञानिकों ने काफी शोध के बाद ऐसी तकनीक विकसित करने में कामयाबी

पायी है। दरअसल पृथ्वी के पर्यावरण को इस प्लास्टिक से मिल रही चुनौतियों को

समझते हुए हर इलाके में अब रिसाइकिल किये जाने वाले प्लास्टिक के लिए अलग से

कचड़ा पेटी लगाये गये हैं। इसके बाद भी इस कचड़े का सही तरीके से निष्पादन नहीं हो

पाने की वजह से समुद्री तट से लेकर हर पर्यटन स्थल और खेत खलिहानों में ऐसे

प्लास्टिक बिखरे नजर आते हैं। चूंकि यह नष्ट नहीं होता इसलिए काफी लंबे समय तक

यह हर तरह पर पृथ्व के पर्यावऱण को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं। इसके नुकसान पहुंचाने

की गति तेज होने की वजह से ही वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ी थी।


प्लास्टिक के कचड़े का असर हिमालय से समुद्र तक


अब नई तकनीक से हर किस्म के प्लास्टिक का निष्पादन किया जाना संभव होगा।

वैज्ञानिकों की यह नई तकनीक प्लास्टिक के लंबे समय तक टिके रहने की क्षमता के

सिद्धांत पर ही बनायी गयी है। लिहाजा प्लास्टिक के कचड़े को बहुत सस्ते दर पर

रिसाइकिल कर नई और जरूरत के सामानों में तब्दील किया जा सकेगा। इसके पहले से

ही दुनिया के अनेक स्थानों पर टिकाऊ सड़क बनाने के लिए प्लास्टिक का उपयोग हो रहा

है। इससे सड़कों की जीवन काफी लंबा और मजबूत बन रहा है। लेकिन इस बार वैज्ञानिकों

ने इस तकनीक को सस्ते दर पर विकसित किया है ताकि यह वाकई लोगों के काम आ

सके। वर्तमान आंकड़ों के मुताबिक दुनिया के प्लास्टिक का करीब बीस प्रतिशत हिस्सा ही

रिसाइकिल हो पाता है। शेष हिस्सा पृथ्वी के पर्यावऱण को लगातार नुकसान पहुंचाता जा

रहा है। अब इस किस्म के सारे कचड़े को दोबारा इस्तेमाल के लायक बनाया जा सकेगा।

जिस तकनीक को विकसित किया गया है, उसे संक्षेप में आरओजीपी पद्धति कहा गया है।

इसके तहत अस्सी प्रकार के कचड़े को बदलकर नये स्वरुप में ढाला जा सकेगा। इससे

सिर्फ सड़क और मजबूत ढांचा ही नहीं बल्कि घर के सामानों में भी तब्दील किया जा

सकेगा। इस पद्धति से दोबारा इस्तेमाल के लायक बनाये गये इस कचड़े से घर के वैसे

सामान भी बनाये जा सकेंगे, जो आम तौर पर लकड़ी के बनते है। इससे पेड़ों का कटना भी

बंद होगा। तकनीक के काफी सस्ती होने की वजह से उनकी कीमतों में भी कमी आयेगी।

लेकिन सबसे बड़ी बात हर साल जो लाखों टन कचड़ा एकत्रित होता चला जा रहे है, उसे

बहुत ही कम लागत पर दोबारा काम में लाने लायक बनाया जा सकेगा।

नई तकनीक काफी सस्ती और टिकाऊ इस्तेमाल के लायक

इस कचड़े को वैज्ञानिक परिभाषा में सात अलग अलग किस्म के माना गया है। यह नई

तकनीक सभी सात प्रकार के प्लास्टिक का रिसाइकिल करने में सक्षम होगी और उसकी

लागत भी बहुत कम होगी। इसका इस्तेमाल शीशे के विकल्प के तौर पर भी किया जा

सकेगा, जिसके टूटने का खतरा हमेशा बना रहता है और जिसे ले जाने मे भी काफी

सावधानी बरतनी पड़ती है। रिसाइकिल किये गये कचड़े का बहुआयामी इस्तेमाल हो

सकता है। यहां तक कि इन्हें भवन निर्माण जैसे व्यापक काम में भी लगाया जा सकता है।

कीमत कम होने की वजह से ही भविष्य में इस तकनीक के सफल होने और पर्यावरण

संरक्षण में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका के बारे में वैज्ञानिक अनुमान लगा रहे हैं। अनेक

प्राकृतिक वस्तुओं का भी यह विकल्प बन जाएगा, जिनमें लकड़ी और मिट्टी सबसे

महत्वपूर्ण हैं। इन दोनों की खपत को कम कर पर्यावऱण को दूसरा लाभ भी पहुंचाया जा

सकेगा।


 

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