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प्लास्टिक की वजह से हो रही है हाथियों की मौत श्रीलंका में




कोलंबोः प्लास्टिक की वजह से हाथी मर रहे हैं। दरअसल भोजन की कमी और भीषण आर्थिक संकट से जूझते श्रीलंका के हाथी अब कचड़ों के ढेर से अपना भोजन तलाश रहे हैं। इसी क्रम में वे प्लास्टिक भी निगल ले रहे हैं, जो उनकी मौत का कारण बन रहा है।




श्रीलंका का पूर्वी क्षेत्र में अनेक स्थानों पर ऐसा प्लास्टिक कचड़े का ढेर खुला पड़ा है। इस सप्ताह दो हाथी यहां मरे हुए पाये गये हैं। जिनकी मौत की वजह प्लास्टिक ही है। पोस्टमार्टम से इस बात का खुलासा हुआ है कि अत्यधिक मात्रा में प्लास्टिक खा लेने की वजह से ही उनकी मौत हुई है।

पर्यावरण प्रेमियों और विशेषज्ञों ने सरकार से इस तरफ ध्यान देने का आग्रह किया है। दूसरी तरफ श्रीलंका सरकार अभी खुद ही भीषण आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रही है, इसलिए सरकारी स्तर पर इन हाथियों को बचाने के लिए अतिरिक्त धन खर्च करने जैसी कोई हालत नहीं है।

मिली जानकारी के मुताबिक आमपारा जिला के गांव पल्लाकाडू में यह घटना हुई है। यह इलाका राजधानी कोलंबो से करीब 210 किलोमीटर पूर्व में है। इस इलाके में अनेक ऐसे इलाके हैं, जहां कचड़ा फेंक दिया गया है। खुले मैदान में पड़े कचड़ों से ही अपना भोजन तलाशने के क्रम में हाथी इन प्लास्टिकों को भी निगल लेते हैं, जो पेट के अंदर पच नहीं पाता और मौत का कारण बन रहा है।




प्लास्टिक के कचड़े को भी खा लेते हैं जंगली हाथी

श्रीलंका में कभी 14 हजार हाथी हुआ करते थे। वर्ष 2011 के आंकड़ों में इनकी तादाद घटकर मात्र छह हजार रह गयी है। अब प्लास्टिक के प्रदूषण की वजह से मौत का आंकड़ा तेजी से बढ़ता हुआ नजर आ रहा है। जंगल खत्म होने तथा जंगल में भोजन का अभाव होने की वजह से भी हाथियों का दल इंसानी आबादी के करीब चला आ रहा है।

यहां पर खुले में पड़े कचड़ों के ढेर से भोजन तलाशने के क्रम में वे प्लास्टिक भी निगल रहे हैं। यह सारा कुछ खुली जमीन पर यूं ही पड़ा हुआ है जो उनकी जान के लिए आफत बन गया है। इन इलाको में करीब 54 ऐसे स्थान हैं, जहां कचड़ा फेंका जा रहा है। पहले यह तय हुआ था कि इन्हें बिजली के तार से घेर दिया जाएगा ताकि हाथी यहां नहीं आ सके।

आर्थिक तंगी की वजह से यह काम भी पूरा नहीं हुआ है। अब इस इलाके में मौजूद तीन सौ हाथियों का दल कभी भी भोजन की तलाश में इन इलाको में आ धमकता है। हाथियों की मौत की सूचना के बाद यह भी जानकारी मिली है कि वर्ष 2014 में कुछ स्थानों पर बिजली के बाड़ लगाये भी गये थे। लेकिन बिजली गिरने से खराब होने के बाद उनकी दोबारा मरम्मत भी नहीं की गयी। इससे भी हाथी अब आसानी से उन्हें लांघकर आबादी के इलाकों में चले आते हैं।



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