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कोरोना के लिए खाने वाली दवा इस साल के अंत तक लाएगी फाइजर

  • फाइजर कंपनी के सीईओ ने सार्वजनिक जानकारी दी

  • पूरी दुनिया और भारत तबाह है इस महामारी से

  • खाने की गोली जो अस्पताल जाने से बचायेगी

  • साल के अंत तक क्लीनिकल ट्रायल पूरा होगा

राष्ट्रीय खबर

रांचीः कोरोना के लिए खाने वाली दवा से अधिक उम्मीद शायद इस दुनिया को किसी और

चीज की नहीं है। पूरी दुनिया और खासकर भारतवर्ष अभी इस महामारी की दूसरी लहर को

कुछ ऐसी तरह झेल रहा है कि उनके लिए ऐसी कोई भी दवा किसी वरदान से कम साबित

नहीं होगी। इस दवा को पिल के तौर पर तैयार किया जा रहा है, जिसके बारे में यह उम्मीद

जतायी गयी है कि इस गोली को निगल लेने के बाद कोरोना वायरस से पीड़ित रोगियों को

अस्पताल का चक्कर नहीं लगाना पड़ेगा। साथ ही अभी कोरोना संक्रमण बढ़ने से जिन

परेशानियों का सामना करना पड़ता है, उन्हें यह दवा खुद ही नियंत्रित कर लेगी। फाइजर

कंपनी के सीईओ अलबर्ट बाउरला ने इसकी घोषणा करते हुए कहा है कि कोरोना के लिए

अभी दवा परीक्षण के दौर में है। पूरी तरह इसका अंतिम क्लीनिकल ट्रायल कर लेने के

बाद ही उसे बाजार में लाया जाएगा। इसके परीक्षण का हर कदम बहुत संभलकर और

बिना किसी जल्दबाजी के किया जा रहा है। लिहाजा दवा को बाजार में आते आते साल का

अंत लग सकता है। कंपनी ने पिछले मार्च महीने से इस पर प्रारंभिक परीक्षण कर लेने के

बाद पहले दौर का क्लीनिकल ट्रायल चालू किया है। दुनिया में कहर बरपा रहे इस

महामारी को सिर्फ एक निगलने वाली गोली से रोकने की दिशा में कंपनी फूंक फूंक कर

कदम रख रही है।

कंपनी के मुख्य वैज्ञानिक डॉ मिखाएल डोल्सटेन ने कहा कि इस दवा का प्रयोग लोगों को

अस्पताल में भर्ती होने और बाद की परेशानियों से बचाना है। इस दवा को तैयार करने में

प्रोटीस इनहिविटर का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसका प्रयोग एचआईवी और

हेपाटाइटिस सी में भी होता है।

कोरोना के लिए खाने वाली दवा का काम भी बताया

यह दरअसल उन एंजाइमों को नियंत्रित करता है जो इंसानी कोष में वायरस को वंशवृद्धि

करने में मदद करते हैं। इसके लिए साठ स्वयंसेवकों का चयन किया गया है। वे 18 से साठ

साल की उम्र के हैं। इनमें से कुछ लोगों को दवा के चार डोज दिये जाएंगे जबकि शेष को

सामान्य दवा मिलेगी। सिर्फ शोधकर्ताओं को यह पता होगा कि किस स्वयंसेवक को

असली दवा दी गयी है। इसका पहला चरण आगामी 25 मई को पूरा होने की उम्मीद है।

उससे पता चल पायेगा कि यह दवा कितनी कारगर और सुरक्षित है। उसके बाद ही दवा के

परीक्षण का अगला क्लीनिकल ट्रायल प्रारंभ किया जाएगा। उस दौर में अधिक संख्या में

स्वयंसेवकों की इस काम में मदद ली जाएगी। इस बारे में किंग्स कॉलेज लंदन के प्रोफसर

डॉ पेन्नी वार्ड ने कहा कि दूसरे दौर तक सही तरीके से पहुंचना एक बड़ी बात होगी। इस

बात को समझना ज्यादा जरूरी है कि लोगों के शरीर पर इस दवा का असर कैसा होता है।

इस बारे में डॉ नीता ओडेजन ने कहा कि वायरस तो अपनी आदत के मुताबिक अपना

स्वरुप बदलता चला जाएगा। इसलिए इस बात पर अधिक ध्यान देना है कि वायरस के

मूल पर यह दवा बराबर तरीके से काम कर सके। अगर ऐसा हो पाया तो यह वायरस को

नियंत्रित करने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम साबित होगा।

क्लीनिकल ट्रायल के बाद ही अस्पतालों में परीक्षण होगा

फाइजर ने अपनी तरफ से कोरोना की वैक्सिन भी बनायी है। इसका अब छह माह से 11

साल के बच्चों के बीच परीक्षण चल रहा है। इस वैक्सिन को लेकर भी कंपनी बहुत

आशावादी है। जिस दवा पर अभी काम हो रहा है, वह भी अन्य एंटीवायरल गोलियो के

जैसा ही है, जिसे खाने के बाद मरीज को अस्पताल में भर्ती होने और बाद की परेशानियों से

मुक्ति मिल पायेगी। इस दवा के पूरे क्लीनिकल ट्रायल को तीन चरणों में और कुल 145

दिनों में बांटा गया है। इससे माना जा सकता है कि जुलाई के मध्य तक यह काम पूरा हो

जाएगा। उसके बाद ही व्यापक ट्रायल के लिए इस दवा को अस्पतालों में उपलब्ध कराया

जाएगा। इस दवा को बनाने से जुड़े वैज्ञानिक कोरोना की मारक क्षमताओँ का विश्लेषण

कर लेने के बाद ही दवा को कुछ इस तरीके से बना रहे हैं कि वह सीधे फेफड़े तक अपना

प्रभाव डाले, जहां कोरोना वायरस सबसे अधिक परेशानियां पैदा कर रहा है। समझा जाता

है कि इस कोविड की गोली का परीक्षण कनिकट और ब्रूसेल्स में भी किया जा रहा है।

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