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पश्चिम बंगाल चुनाव के वक्त अभिषेक और प्रशांत की बात चीत भी पिगासूस में

पश्चिम बंगाल चुनाव के वक्त अभिषेक और प्रशांत की बात चीत भी पिगासूस में
  • सरकार के खंडन के बाद सवाल आखिर कौन कर रहा था जासूसी

राष्ट्रीय खबर

कोलकाताः पश्चिम बंगाल चुनाव के वक्त ममता बनर्जी के भतीजे और अभी हाल में पार्टी

महासचिव बनाये गये अभिषेक बनर्जी के फोन पर भी सेंधमारी हुई थी। इसी क्रम में बंगाल में

तृणमूल कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर के फोन को भी पिगासूस साफ्टवेयर के

माध्यम से सुना जा रहा था। केंद्र सरकार द्वारा इस बारे में खंडन किये जाने के बाद उल्टा

सवाल यह उठ गया है कि फिर यह जासूसी कौन करा रहा था। भारत में किसी दूसरे देश के

द्वारा इस किस्म की जासूसी कराने का कोई औचित्य तो नहीं हैं। दरअसल एक स्वतंत्र संस्था

ने उल्लेखित टेलीफोन नंबरों की फोरेंसिक ऑडिट कर लेने क बाद किन लोगों के फोन

पिगासूस के माध्यम से टैप किये गये हैं, उसकी सूची क्रमवार तरीके से जारी कर दी है। इससे

पता चला है कि पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के पूर्व अभिषेक और प्रशांत किशोर की

बात चीत भी कोई सुन रहा था। पश्चिम बंगाल चुनाव के लिए किसी विदेशी एजेंसी की रूचि के

तर्क को तृणमूल कांग्रेस स्वीकार करने के पक्ष में नहीं हैं। वैसे इस बीच कांग्रेस नेता राहुल

गांधी के अलावा भी भाजपा के कई नेताओं पर जासूसी किये जाने की वजह से शक की सूई

अब अमित शाह पर टिक गयी है। जिन भाजपा नेताओं की जासूसी की गयी थी, उनमें

वर्तमान सूचना एवं तकनीकी मंत्री अश्विनी वैष्णव का नाम भी शामिल है। दूसरी तरफ स्मृति

ईरानी जैसी नेत्री के फोन पर भी जासूसी कान लगा हुआ था, यह बात सामने आ चुकी है। इन

सभी तथ्यों की वजह से ही यह संदेह केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की तरफ बढ़ रहा है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल के डिजिटल लैब में तमाम फोनों की फोरेंसिक ऑडिट का यह काम

किया गया है।

पश्चिम बंगाल चुनाव के वक्त इन पर किसकी नजरदारी थी

इसमें भारतीय फोन धारकों के नंबर भी हैं। इनमें से किनके फोन को पिगासूस के जरिए हैक

किया गया था, वह सूची भी क्रमवार तरीके से जारी हो रही है। दूसरी तरफ केंद्र सरकार

लगातार दो दिनों से इस बात का खंडन कर रही है कि केंद्र सरकार ने ऐसी कोई जासूसी नहीं

की है। वैसे नये आइटी कानून के तहत इस किस्म की कार्रवाई को भी दंड योग्य समझा गया

है। सिर्फ राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवादी गतिविधियों के लिए इस किस्म की सूचना तकनीक

के इस्तेमाल की छूट है। इसके लिए पहले से ही केंद्रीय तथा राज्य सरकार की एजेंसियों के

पास विकल्प मौजूद हैं।

पश्चिम बंगाल चुनाव में टीएमसी को मिली प्रचंड जीत के बाद यह सवाल भी उठ गया है कि

आखिर टीएमसी के नेताओं और उसके रणनीतिकार की बातचीत पर जासूसी करने का फायदा

किसे होने वाला था, उसकी भी जांच होनी चाहिए।

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