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अब तो 2024 के फाइनल के पहले के सेमीफाइनल पर लगी नजर




चुनावी चकल्लस

पार्टी के अन्य नेता भी दूरी बनाकर चल रहे
किसान, घमासान के बीच भाजपा परेशान
पंजाब में भाजपा की पैठ अंदर तक नहीं
सत्यपाल मलिक की बातों में दम है
राष्ट्रीय खबर

रांचीः अब तो सारे राजनीतिक दलों के नजर में 2024 का लोकसभा चुनाव ही अहम है। ऐसी स्थिति में आने वाले दिनों में होने वाले पांच राज्यों के चुनाव को उसी फाइनल मैच के पहले का सेमीफाइनल माना जा रहा है। गंभीर मसला यह भी है कि इस सेमीफाइनल में उत्तरप्रदेश का मैदान भी है, जहां से होकर दिल्ली दरबार का रास्ता खुलता है।




इस परिस्थिति में एक तरफ किसान आंदोलन औऱ दूसरी तरफ भाजपा के अंदर का घमासान क्या कुछ गुल खिलायेगा, यह बड़ी बात है। किसान आंदोलन की बात को अब जगजाहिर है लेकिन भाजपा के अंदर के घमासान का संकेत भाजपा के कद्दावर जाट नेता और वर्तमान में राज्यपाल सत्यपाल मलिक की बातों से झलक जाता है।

ऐसा नहीं है कि श्री मलिक का अपने इलाके एवं पार्टी के अन्य नेताओं के साथ संपर्क नहीं है। वह जो कुछ कह रहे हैं वह खास तौर पर पश्चिमी उत्तरप्रदेश की राजनीति का संकेत है। श्री मलिक ने हाल के दिनों में कई गंभीर बातें कही हैं, जो शायद भाजपा के पक्षधर पत्रकारों और पर्दे के पीछे से भाजपा साइबर सेल के लिए काम करने वालों को नागवार गुजरी है।

श्री मलिक ने कहा है कि इस किसान आंदोलन के बहुत अधिक लंबा चलने का असर भारतीय सेना के अंदर पड़ रहा है, इस बात को जल्द समझने की जरूरत भी है। वैसे भी उनकी बातों से नाराज लोगों के सवाल पर उन्होंने साफ साफ कहा है कि जिन्होंने उन्हें राज्यपाल की यह जिम्मेदारी सौंपी हैं, वह जब इशारा कर देंगे तो वह पद छोड़ देंगे। यहां से जो सवाल खड़ा होता है कि अगर सत्यपाल मलिक ने राज्यपाल के पद से त्यागपत्र दे दिया तो वह क्या करेंगे।




अब तो साफ है कि सत्यपाल मलिक मोर्चा बांधकर खड़े हैं

जाहिर ही बात है कि जाट इलाके में वह ऐसे भाजपा नेता के तौर पर उभरेंगे, जो किसान आंदोलन के मुद्दे पर कभी भी पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व से इत्तेफाक नहीं रखते हैं। अब किसान आंदोलन की बात करें तो तीनों कृषि कानूनों की वापसी से पंजाब के किसानों की समस्या तो काफी हद तक हल हो चुकी है। क्योंकि पंजाब में प्रमुख फसलों पर पहले से ही एमएसपी लागू है।

परेशानी उत्तरप्रदेश की अधिक है जो भाजपा के गले में कांटा की तरह फंसा हुआ है। पार्टी के अन्य बड़े नेता मसलन राजनाथ सिंह और नीतीन गडकरी जैसे लोग फिलहाल नरेंद्र मोदी से दूरी बनाकर चल रहे हैं, यह भी स्पष्ट है। भाजपा की परेशानी अब अमित शाह से भी अधिक है, जो अपनी जनसभाओं में हड़बड़ी में ऐसी बातें बोल जाते हैं जो जगहंसाई का कारण बन रहा है।

पंजाब में भाजपा को पैठ बनाने के लिए अधिक अवसर फिलहाल नहीं है और उत्तरप्रदेश में उसके मजबूत जनाधारा का बड़ा हिस्सा इस किसान आंदोलन की वजह से खिसका हुआ है। इसलिए अब तो 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले यह विधानसभा चुनावों के परिणाम से ही दिखने लगेगा कि अब देश के राजनीति की गाड़ी किस ओर बढ़ती जा रही है।



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