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जासूसी के मुद्दे पर केंद्र सरकार की गलतबयानी या साजिशन झूठ




जासूसी के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान निर्देश से यह स्पष्ट है कि केंद्र सरकार ने इस बारे में जो दलीलें दी थी, वह स्वीकार्य नहीं है। राष्ट्रीय सुरक्षा का उल्लेख कर केंद्र सरकार ने पिगासूस स्पाईवेयर के बारे में जानकारी देने से इंकार कर दिया है।




दूसरी तरफ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हुई जांच में यह स्पष्ट हो गया है कि देश के वैसे लोगों के फोन में भी सेंधमारी हुई है, जिनसे राष्ट्रीय सुरक्षा का कोई मसला जुड़ा हुआ नहीं था। साथ ही यह भी स्पष्ट हो गया है कि यह जासूसी भारत से ही की गयी है।

वरना फ्रांस के राष्ट्रपति इमानूएल मैंक्रों और अन्य के बारे में यह पता चला है कि उनकी फोन की जासूसी मोरक्को से की गयी थी। इसलिए अब केंद्र सरकार द्वारा जासूसी के मुद्दे पर जो बहाने बनाये गये थे वह या तो गलतबयानी है अथवा साजिश के तहत बोला गया झूठ है।

उच्चतम न्यायालय ने भारत में राजनीतिक नेताओं, अदालत के कर्मियों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं सहित विभिन्न लोगों की निगरानी के लिए इजरायली स्पाईवेयर पेगासस के इस्तेमाल के आरोपों की जांच के लिए बुधवार को साइबर विशेषज्ञों की तीन सदस्यीय समिति नियुक्त की।

इस समिति में साइबर विशेषज्ञ, डिजिटल फॉरेंसिक, नेटवर्क एवं हार्डवेयर के विशेषज्ञ शामिल हैं। जांच की निगरानी शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर वी रवींद्रन करेंगे।

जासूसी के मुद्दे पर जांच कमेटी में सभी अनुभवी लोग

शीर्ष अदालत ने कहा कि पूर्व आईपीएस अधिकारी आलोक जोशी और संदीप ओबेरॉय (अध्यक्ष, उप समिति (अंतरराष्ट्रीय मानकीकरण संगठन/अंतरराष्ट्रीय इलेक्ट्रो-तकनीकी आयोग/ संयुक्त तकनीकी समिति) न्यायमूर्ति रवींद्रन समिति के कामकाज की निगरानी करने में मदद करेंगे।

अदालत ने कहा कि सरकार हर बार राष्ट्रीय सुरक्षा की दुहाई देकर बच नहीं सकती और इसे हौवा नहीं बनाया जा सकता जिसका जिक्र होने मात्र से न्यायालय खुद को मामले से दूर कर ले।

नागरिकों के निजता के अधिकार के विषय पर पिछले कुछ सालों के एक महत्त्वपूर्ण फैसले में मुख्य न्यायाधीश एन वी रमण, न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति हिमा कोहली के तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि सरकार द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा की दुहाई देने मात्र से न्यायालय मूक दर्शक बना नहीं रह सकता।




पीठ ने केंद्र के स्वयं विशेषज्ञ समिति गठित करने के अनुरोध को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि ऐसा करना पूर्वाग्रह के खिलाफ स्थापित न्यायिक सिद्धांत का उल्लंघन होगा। पीठ ने कहा कि एक बाध्यकारी परिस्थिति यह थी कि नागरिकों के निजता और बोलने की आजादी के अधिकार प्रभावित होने के आरोप हैं जिनकी पड़ताल जरूरी है।

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि प्रेस की आजादी लोकतंत्र का महत्त्वपूर्ण स्तंभ है और पेगासस मामले में अदालत का काम, पत्रकारीय सूत्रों की सुरक्षा के महत्त्व के लिहाज से अहम है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि पत्रकारीय सूत्रों का संरक्षण प्रेस की आजादी के लिए एक बुनियादी शर्त है और इसके बिना सूत्र जनहित के मामलों पर जनता को सूचित करने में मीडिया की मदद करने से पीछे हट सकते हैं।

भारतीय नागरिकों की शिकायतों की जांच होगी

समिति यह भी जांच करेगी कि स्पाईवेयर के पेगासस सूट का उपयोग कर भारतीय नागरिकों के व्हाट्सऐप खातों की हैकिंग के बारे में वर्ष 2019 में रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद केंद्र ने क्या कदम उठाए और क्या भारत के नागरिकों के खिलाफ इस्तेमाल के लिए भारत संघ, या किसी भी राज्य सरकार, या किसी भी केंद्रीय या राज्य एजेंसी ने स्पाईवेयर के किसी पेगासस सूट की खरीद की थी।

जुलाई में बहुराष्ट्रीय स्तर की जांच में जासूसी का एक मामला सामने आया जिसमें यह बात सामने आई कि कई देश अपने नागरिकों की व्यापक स्तर पर कथित अवैध निगरानी करा रहे हैं। पूरी जांच पेगासस स्पाईवेयर के लक्षित लोगों की एक सूची पर केंद्रित थी जिनकी जासूसी कराई जा रही थी। पेगासस के जरिये सांसदों, न्यायाधीशों और अन्य लोगों के अलावा तकरीबन 40 भारतीय पत्रकारों की कथित जासूसी कराई जा रही थी।

दूसरी तरफ इसे बनाने वाली कंपनी से साफ कर दिया है कि वह केवल सरकारी एजेंसियों को पेगासस सॉफ्टवेयर बेचती है जिसके लिए विशेष अनुबंध शर्त भी होती है कि स्पाईवेयर का इस्तेमाल केवल संदिग्ध अपराध या आतंकी गतिविधियों की जांच के मामले में किया जा सकता है।

हालांकि व्यावहारिक स्तर पर यह शर्त लागू नहीं हैं और कोई भी खरीदार इसका अपने हिसाब से इस्तेमाल कर सकता है। इसके लाइसेंस की कीमत 2016 में न्यूनतम करीब 650,000 डॉलर थी।

इसके अलावा, खरीदार को डेटा हासिल करने और निगरानी आदि के लिए बुनियादी ढांचा स्थापित करने के लिए बड़ी राशि खर्च करनी होती है। इसकी कीमत भी लगभग 350,000 डॉलर हो सकती है। जासूसी के मुद्दे पर केंद्र सरकार की गलतबयानी के बाद यह देखना आवश्यक है कि गृह मंत्रालय के अधीन कौन विभाग और अधिकारी इसका संचालन करते रहे हैं।



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