कृषि पर ध्यान देना हर पार्टी की मजबूरी बनी

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कृषि पर अब भाजपा की सत्तारूढ़ सरकार को भी काम करना पड़ रहा है।

इससे पूर्व भाजपा ने कांग्रेस की तीन राज्य सरकारों द्वारा किसानों की कर्जमाफी की घोषणा की आलोचना की थी।

यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा था कि किसानों को कर्जमाफी से

कोई फायदा नहीं होने वाला बल्कि नीतियां ऐसी होनी चाहिए

जिसमें किसानों को कर्ज लेने की नौबत ही नहीं आये।

लेकिन इतना कुछ होने के बाद भी चुनावी लाभ नहीं होते भांप अब भाजपा भी किसानों की हिमायती बनने लगी है।

इस मुद्दे पर अब वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के प्रमुखों के साथ

बैठक कर किसानों के हित में फैसला लेने की बात कही है।

जाहिर है कि अब लोकसभा चुनाव सर पर होने की वजह से भाजपा सहित

तमाम राजनीतिक दलों को किसानों की राजनीतिक ताकत का एहसास हो गया है।

अब वर्तमान केंद्रीय वित्त मंत्री गोयल ने बैंकों से लघु एवं मझोले उद्योगों (एमएसएमई), कृषि और आवास क्षेत्र को ज्यादा कर्ज देने को कहा।

साथ ही उन्हें सरकार की ओर से हर संभव मदद देने का आश्वासन भी दिया।

दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) से सरकारी बैंकों को चालू वित्त वर्ष की तीन तिमाहियों में एक लाख करोड़ रुपये से अधिक की उगाही करने में मदद मिली है।

इस बात को रेखांकित करते हुए गोयल ने भरोसा जताया कि आने वाले दिनों में यह स्थिति बैंकों को अधिक लाभकारी बनाएगी।

श्री गोयल ने बैठक के बाद बताया, आईबीसी की प्रणाली और राष्ट्रीय कंपनी विधि

न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) के काम करना शुरू करने के बाद से कैसे बैंकों को

राशि उगाही करने में मदद मिली है, हमने बैठक के दौरान इस विषय पर चर्चा की।

कई मामलों में तो एनसीएलटी में जाए बिना ही बड़े देनदारों पर दबाव बनाया जा सका है।

उन्होंने कहा कि बैठक के दौरान हमने भारतीय रिजर्व बैंक के दिशानिदेर्शों के तहत मुद्दों के समाधान की

आंतरिक प्रणाली पर भी विचार-विमर्श किया।

गोयल ने कहा, हमने सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों (एमएसएमई) को कर्ज,

आवास ऋण और कृषि ऋण को बढ़ावा देने के उपायों पर चर्चा की।

गोयल ने सरकारी बैंकों को पूरा समर्थन देने की बात कही।

इस पूरे प्रकरण में बड़े बकायेदारों से हुई वसूली की बात कहने के बाद भी

केंद्रीय मंत्री उन बड़े बकायेदारों का नाम बताने से पीछे हट गये, जिसकी चर्चा अब पूरे देश में हो रही है।

अपुष्ट माध्यमों से जो सूचनाएं सार्वजनिक हो रही हैं, उनमें कई ऐसी कंपनियां भी हैं,

जिनके शेयर के दाम सिर्फ इस वजह से गिर रहे हैं क्योंकि उनके कर्ज में डूबे होने की चर्चा हो रही है।

इसलिए स्थिति को स्पष्ट करने की दिशा में केंद्र सरकार को कठोर फैसला लेते हुए

देश को यह बताना चाहिए कि देश के वे बड़े बकायेदार कौन हैं,

जिनके पास देश का करीब 120 लाख करोड़ रुपया फंसा हुआ है।

यह आंकड़ा भी सिर्फ लोकसभा में राजनीतिक चर्चा के दौरान उठाये गये तथ्यों पर आधारित है।

जाहिर है कि अगर वाकई यह पैसा बड़े बकायेदारों के पास बकाया है तो इसकी वसूली अंततः हो पायेगी

इस बारे में वर्तमान आर्थिक परिस्थिति में संदेह की पूरी गुंजाइश है।

लिहाजा पहले कांग्रेस के जिस फैसले को भाजपा गलत बता रही थी, उसी फैसले पर चलना अब उसकी चुनावी मजबूरी इसलिए बन चुकी है क्योंकि चुनाव करीब आने के साथ साथ देश के चुनावी हालात तेजी से बदलते जा रहे हैं।

भाजपा ने अभी से चार माह पूर्व यह सही सोच रखा था कि उसे अगले चुनाव में भी कोई चुनौती नहीं मिलने वाली।

लेकिन तीन राज्यो में कांग्रेस की जीत में किसानों की भूमिका की बात स्पष्ट होते ही

भाजपा को भी अपनी सोच में बदलाव लाना पड़ा है।

रही कसर कोलकाता के ब्रिगेड पैरेड मैदान में आयोजित विरोधियों की रैली ने पूरी कर दी है।

अब मजबूरी में भाजपा को वह सब करना पड़ रहा है, जो उसके वोट बैंक को टूटने से बचा सके।

यह याद रखना होगा कि पिछले चुनाव में भी भाजपा ने मात्र 31 प्रतिशत वोट हासिल कर लोकसभा में पूर्ण बहुमत हासिल कर लिया था।

अब भाजपा विरोधी वोटों के बंटने की संभावना कम होते ही भाजपा की यह चिंता स्वाभाविक है।

लेकिन किसानों के इन फैसलों से एक भला यह भी होगा कि ग्रामीण भारत में पैसे का प्रवाह बढ़ेगा।

ग्रामीण इलाकों में पैसे का प्रवाह पूरे देश की अर्थनीति को त्वरित गति से प्रभावित करता है।

भारत की पारंपरिक अर्थव्यवस्था की वजह से किसानों तक पहुंचा पैसा गांव होते हुए शहर तक आता है।

इससे निश्चित तौर पर देश की अर्थनीति में गति आयेगी।

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