क्या पूरी पार्टी सिर्फ मोदी के भरोसे? काम के वक्त बयानवीर हो जाते गायब

क्या नरेंद्र मोदी ही भारतीय जनता पार्टी की सारी जिम्मेदारी उठायेंगे।

हर बात के लिए उनके संकेत की प्रतीक्षा करना, यह भाजपा की रीत तो नहीं रही है।

सामाजिक ज्वलंत मुद्दों पर भाजपा के नेता त्वरित प्रतिक्रिया देते आये हैं।

जम्मु कश्मीर और उत्तर प्रदेश में अचानक घटनाक्रम बदलते चले गये।

पहले उच्च न्यायालय ने सीधे सीबीआइ को आदेश दिया कि उन्नाव की घटना के दोषियों को तुरंत गिरफ्तार किया जाए।

सीबीआइ ने आरोपी विधायक को गिरफ्तार भी कर लिया।

इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बयान आते ही अचानक से पूरी फिजां ही बदल गयी।

देश के प्रधानमंत्री ने दोनों घटनाओं पर दुख व्यक्त करते हुए दोनों पीड़िताओं को

देश की बेटी कहकर सम्मान दिया और पीड़ित परिवार के प्रति अपनी संवेदना भी

व्यक्त कर दी।

लेकिन इसके पहले तक भारतीय जनता पार्टी के अन्य नेता क्या कर रहे थे,

यह महत्वपूर्ण सवाल बन चुका है। क्या पूरी पार्टी सिर्फ और सिर्फ नरेंद्र मोदी के भरोसे चल रही है।

अगर ऐेसी स्थिति है तो यह खुद भाजपा के लिए भी खतरे की घंटी है।

इसी एक व्यक्ति के भरोसे चलने की वजह से आज कांग्रेस की ऐसी बुरी गत हो चुकी है।

ऐसे अत्यंत संवेदनशील मामलों में भी वोट बैंक की राजनीति की ताक-झांक में

अगर भाजपा को भी सोचना पड़े तो वह किस मुंह से खुद को दूसरों से भिन्न

पार्टी होने का दावा करती है।

वैसे भी हर ज्वलंत मुद्दे पर ऊपर की तरफ झांकते और सोचते हुए प्रतिक्रिया

देना पलायनवादी सोच है।

पूर्व में अटल बिहारी बाजपेयी के कार्यकाल में पार्टी की यह स्थिति नहीं थी।

तब भी कई मुद्दों पर बड़े नेताओं की राय एक दूसरे से भिन्न होने के बाद भी

एक सामंजस्य कायम होता था।

तो क्या यह मान लिया जाए कि वैचारिक मतभिन्नता अब भाजपा में भी मनभेद बन चुकी है।

एक तरफ संयुक्त राष्ट्र में इन घटनाओं की चर्चा हो रही थी तो भाजपा की दूसरी

पंक्ति के नेता अनाप शनाप बयान देकर आम जनता को और नाराज कर रहे थे।

प्रधानमंत्री ने जैसे ही पीड़िताओं के बारे में देश की बेटी शब्द का इस्तेमाल किया,

लोगों के तेवर एक ही झटके में बदल गये।

मोदी के बयान देते ही बदल गये लोगों के तेवर

बीजापुर में एक कार्यक्रम में भाग लेते हुए मोदी ने जम्मु-कश्मीर के कठुआ और

उत्तर प्रदेश के उन्नाव की घटना पर अपनी बात रखी।

उन्होंने इन दो घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इन गलत घटनाओं से देश

के सुसंस्कत समाज को कोई अच्छा संदेश नहीं मिलता।

मोदी ने पीड़िताओं को देश की बेटी कहते हुए उनके साथ न्याय की बात कह दी।

मोदी ने कहा कि ऐसी घटनाएं हमारे देश के लिए जान देने वाले शहीदों के लिए शर्मनांक है।

एक सभ्य समाज के नाते हम सभी ऐसी घटनाओं से शर्मिंदा हैं।

मोदी ने और दो बड़े काम किये

मोदी ने इसी कार्यक्रम में दो और बड़े काम किये।

वह एक महिला ई रिक्शा चालक की रिक्शा पर सवार हुए।

दूसरे उन्होंने अपने सभामंच पर आयी एक महिला को चप्पल भेंट करने के

क्रम में खुद उनके पैरों में चप्पल डालने का भी काम किया।

आम तौर पर सत्ता की शीर्ष पर पहुंचते पहुंचते अनेक नेताओं के हाव भाव बदलते देखा गया है।

जब श्री मोदी ने संसद के चौखट को प्रणाम किया था तब भी यह सवाल उठा था कि

क्या यह महज दिखावा भर है।

अंदर से मोदी अब भी यथावत है

लेकिन बीजापुर की घटना ने यह साबित कर दिया कि कड़े हाथ से शासन चलाने

के बाद भी खुद को प्रधानमंत्री नहीं प्रधानसेवक मानने वाले नरेंद्र मोदी अंदर से

अब भी वही इंसान है, जिसे पूरे देश में प्रचंड जनमत देकर देश का प्रधानमंत्री बनाया है।

लेकिन यही से जो गंभीर सवाल खड़ा हो रहा है, वह यह है कि क्या भाजपा के

अन्य सारे नेता आगे भी सिर्फ मोदी के भरोसे ही राजनीति करना चाहते हैं।

अगर ऐेसा नहीं है तो सामाजिक और ज्वलंत राष्ट्रीय मुद्दों पर बात करने की

बारी जब आती है तो उनकी जुबान पर ताला क्यों लग जाता है।

केरल के एक बैंक के अभद्र टिप्पणी करने वाले अपने ही कर्मचारी को नौकरी से

निकालने में वक्त नहीं लगता और भाजपा जैसी पार्टी के नेता बयान देने के पहले

अपना नफा नुकसान तौलने लगते हैं, यह सही बात नहीं है।

वर्तमान उप राष्ट्रपति और पूर्व के भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष वैंक्कैया नायडू के

कार्यकाल में यह वाक्य प्रचलित हुआ था कि पार्टी विथ द डिफरेंस यानी दूसरों

से अलग दिखने वाली पार्टी।

बाद में इस वाक्य का मजाक उड़ाते हुए यह भी कहा गया कि पार्टी विथ द

डिफरेंसेज यानी मतभेदों की पार्टी।

लेकिन तमाम उतार चढ़ाव के बाद भी इस बात पर संदेह की कोई गुंजाइश

नहीं है कि नरेंद्र मोदी अब भी देश के सबसे लोकप्रिय नेता हैं।

लिहाजा उनका काम आसान करना पार्टी के दूसरे नेताओं की जिम्मेदारी है।

नरेंद्र मोदी ने अपने नाम की लहर पैदा कर सभी को चुनाव में जीत दिला दी।

अब उस भरोसे को कायम रखना संबंधित लोगों को जिम्मेदारी बनती है।

सिर्फ मोदी पर हर बात की जिम्मेदारी थोपना राजनीतिक तौर पर सही भी नहीं है।

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