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जेब में लेकर चलिए शक्तिशाली ऊर्जा पैदा करने का जेनरेटर




  • नाखुन के आकार से भी छोटा है यह

  • मुख्य अंश बाल से दो सौ गुणा छोटा

  • अनेक तरीके से लागत को कम करेगी

  • लार्ज हैड्रोन कोलाइडर के बाद सुक्ष्म स्वरुप

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः जेब में पार्टिकल एक्सीलरेटर तैयार करने में वैज्ञानिकों ने सफलता पायी है।

इसका इस्तेमाल कई वैज्ञानिक विधियों में किया जा सकता है और इससे हर किस्म का

फायदा होने की पूरी उम्मीद है। अणुओं की गतिविधियों पर नजर रखकर सौर मंडल के

विकास का प्रयोग अब तक का सबसे बड़ा प्रयोग रहा है। इस काम के लिए जिस मशीन का

इस्तेमाल किया गया था, उसे लार्ज हैड्रोन कोलाइडर कहते हैं। अब तक वैज्ञानिक दुनिया

में यह सबसे बड़ी मशीन के तौर पर आंकी गयी है। हमें पता है कि इस परीक्षण को करने के

लिए 26 किलोमीटर की परिधि में मशीन को बिछाया गया था। इसे तैयार करने में 12

साल का समय लगा था और इस पर करीब 24262 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। इस मशीन के

माध्यम से ऊर्जा की गतिविधियों को नापने का काम किया गया था। इस प्रयोग के आधार

पर अनेक नये तथ्यों का पता चलने के बाद वैज्ञानिक गतिविधियों में भी विकास हुआ है।

अब स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने इसका सुक्ष्म मॉडल तैयार किया है।

इस वैज्ञानिक दल के नेता प्रोफसर रॉबर्ट एल बायर हैं। उनकी देख-रेख में सुक्ष्म स्तर पर

अणुओं के विखंडन और आचरण की विधि विकसित करने में सफलता मिली है। प्रारंभिक

परीक्षण के दौरान इस अति लघु मशीन को सफल पाया गया है। यह मशीन इतनी छोटी है

कि यह इंसान की अंगुलियों में समा सकती है। लेकिन उसकी क्षमता कतई सुक्ष्म अथवा

छोटी नहीं है। ऊर्जा के लिहाज से इसे एक महत्वपूर्ण उपलब्ध माना जा रहा है। लागत के

लिहाज से काफी सस्ता होने की वजह से चिकित्सा विज्ञान सहित अनेक इलाकों में इसके

प्रयोग से फायदा होने की उम्मीद जतायी गयी है।

जेब में समाने वाले इस यंत्र की मुख्य भूमिका शोध कार्यों में

इस शोध से जुड़े वैज्ञानिक जेलिना वूकोविक मानती हैं कि इसे मुख्य तौर पर अनुसंधान

के एक यंत्र के तौर पर बेहतर उपयोग में लाया जा सकता है। वह खुद भी इस

विश्वविद्यालय के इलेक्ट्रिकल विभाग की इंजीनियर हैं।

जिस स्तर पर इस परीक्षण को सफल बनाया गया है, उसके आकार के बारे में यह समझ

लेना चाहिए कि दरअसल यह किसी बाल के मुकाबले दो सौ गुणा कम है। लेजर किरणों

की मदद से इसे काम में लाया जा सकता है। हवा रहित चैंबर में होने के बाद जब इसपर

किसी लेजर की किरण पड़ती है तो इसके इलेक्ट्रान तेजी से आगे बढ़ते हैं। मजे की बात

यह है कि यह उपकरण सिर्फ 10 मिलीवाट बिजली की खपत करती है। इससे समझा जा

सकता है कि किसी वस्तु के सबसे छोटे हिस्से यानी इलेक्ट्रॉन को सक्रिय बनाने के लिहाज

से यह बिजली का भी काफी कम खपत करती है।

फोटोन ऊर्जा के माध्यम से काम करेगी यह मशीन

इससे पहले इस किस्म का इलेक्ट्रॉन संचार करने अथवा मापने के लिए बड़े यंत्रों की

आवश्यकता पड़ती थी। अब इस अत्यंत लघु उपकरण के आने से यह सारा खर्च अपने

आप ही कम होना तय है। इससे विज्ञान के अनेक क्षेत्रों में ऊर्जा आधारित जो काम होते थे,

उसकी लागत भी अपने आप ही कम हो जाएगी। इससे वैज्ञानिक शोध और इस्तेमाल की

लागत भी उल्लेखनीय तरीके से कम होने की उम्मीद है। एक छोटे से उपकरण से अणुओँ

को चार्ज कर किसी काम के लिए निर्देशित करने की इस क्षमता से कई आयामों में बदलाव

होने की उम्मीद है। परीक्षण के सफल होने के बाद उसके बड़े आकार के संस्करण तैयार

करने की भी तैयारी चल रही है । पहले जिस काम को करने के लिए सैकड़ों मीटर लंबे तार

और अत्याधुनिक उपकरणों की आवश्यकता पड़ती थी, उस काम को इस जेब का यंत्र कर

पाने का असली लाभ वैज्ञानिक उपकरणों से लाभ पाने वालों के साथ साथ वैज्ञानिक

गतिविधियों से जुड़े तमाम लोगों को होने जा रही है। वैज्ञानिक मानते हैं कि जेब में समाने

वाले इस यंत्र की बदौलत कई मशीनों की संरचना भी आने वाले दिनों में न सिर्फ बदल

जाएगी बल्कि वे आकार में भी इतने छोटे हो जाएगें कि उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान

तक आसानी से ले जाना भी संभव हो पायेगा।



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