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शुक्र ग्रह के चारों तरफ धूलकणों के वलय को भी पहली बार ऐसे देखा गया

  • अनुमान से दस फीसद अधिक गहरा है

  • इसकी वजह से कई बार चमक बढ़ती है

  • शायद नये तारों की रचना में भी मददगार

  • पार्कर सोलर प्रोव की मदद से देखने को मिला

राष्ट्रीय खबर

रांचीः शुक्र ग्रह के चारों तरफ धूल के कणों का एक बादल है। इस पर पहली बार वैज्ञानिकों

की नजर गयी है। दरअसल पृथ्वी से इतनी दूरी पर वहां दरअसल क्या कुछ हो रहा है, उसे

इतनी दूरी से देख पाना संभव भी नहीं होता। अंतरिक्ष की गतिविधियों पर नजर रखने

वाले खगोल दूरबीन भी इन घटनाओं को नियमित तौर पर नहीं देख पाते हैं। सूर्य के

अनुसंधान के लिए भेजे गये नासा के पार्कर सोलर प्रोव ने पहली बार इसकी तस्वीर भेजी

है। वैज्ञानिकों ने वहां से मिले आंकड़ों का विश्लेषण करने के बाद शुक्र ग्रह के चारों तरफ

बने धूल के इस वलय को देखा और समझा है। पहले भी कई बार शुक्र ग्रह के बाहर कुछ

ऐसा होने के संकेत मिले थे, लेकिन यह पहला अवसर है जबकि उसे साफ साफ देखा और

समझा जा सका है। यह धूल कणों का घेरा सूर्य के चारों तरफ पूरे 360 डिग्री में घूमता

रहता है। पार्कर सोलर प्रोव ने लगे विस्पर यंत्र की मदद से इसे समझ पाना संभव हुआ है।

इस यंत्र को खास तौर पर सौर आंधियों को समझने के लिए ही तैयार कर इस अभियान पर

भेजा गया है। इन धूल कणों के बादल से लगातार सूर्य की रोशनी भी प्रतिबिंबित होती

रहती है। इसी वजह से कई बार वहां की चमक इतनी बढ़ जाती है कि वह पृथ्वी से भी थोड़ा

थोड़ा नजर आता रहता है। अब वहां के आंकड़ों को मिलने के बाद वैज्ञानिक यह समझ

पाये हैं कि उस सुदूर अंतरिक्ष में कई बार ऐसे धूल कणों के बादल भी अधिक चमकदार

रोशनी पैदा करते रहते हैं। वहां से मिले आंकड़ों में इस धूल कण के बादल को समझना

कोई आसान काम नहीं था।

शुक्र ग्रह के चारों तरफ ऐसे वलय का विश्लेषण जारी है

इसके लिए वैज्ञानिकों ने तस्वीरों में कैद अन्य तथ्यों को एक एक कर अलग किया और

कैमरे में कैद अन्य आंकड़ों को अलग करने के बाद ही इस धूल कणों के बादल की असली

तस्वीर सामने आयी है। वैसे यह बताया गया है कि इसे पूरी तरह समझने के लिए भी

नासा के इस पार्कर सोलर प्रोव के पूरी तरह चक्कर काटने का इंतजार करना पड़ा ताकि हर

तरफ की तस्वीर सामने आ सके। अब वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि अनुमान से

यह धूल कणों का बादल दस प्रतिशत अधिक घना है। जॉन हॉपकिंस विश्वविद्यालय के

एप्लाइड फिजिक्स लैब के वैज्ञानिक इस पर नजर रखे हुए हैं। अपने सूर्य अभियान पर

गये पार्कर सोलर प्रोव अपनी यात्रा के दौरान फिर से इस रास्ते से गुजरेगा और नये कोण

से वहां की तस्वीरों को कैद करेगा। उन आंकड़ों के मिलने के बाद फिर से उनका विश्लेषण

का जाएगा। दरअसल अब वहां धूल कणों का ऐसा वलय मिलने के बाद वैज्ञानिक इन धूल

कणों की संरचना और वहां उनके मौजूद होने के कारणों का भी पता लगाना चाहते हैं। यह

सवाल इसलिए महत्वपूर्ण बना हुआ है क्योंकि सूर्य के इतने करीब प्रचंड गर्मी से वहां

धूलकणों के भाप बन जाने की सामान्य वैज्ञानिक परिकल्पना रही है। इतने अधिक

तापमान में अगर धूल कणों का वलय वहां लगातार मौजूद है तो उसकी क्या वजह से तथा

इन धूल कणों में क्या है, यह समझना ज्यादा जरूरी हो गया है। इन धूल कणों की

मौजूदगी और कहां कहां है, उसे समझना भी अब जरूरी हो गया है क्योंकि कई बार ऐसे

धूल कणों के बादलों की वजह से भी प्रारंभिक गणना आगे चलकर गलत साबित हो सकती

है। पहले ऐसा माना जाता है कि सिर्फ धूमकेतुओं के गुजरने के बाद उनके पीछे ऐसे धूल

कण अंतरिक्ष में छूट जाते हैं।

शायद यह धूल कण भी नये तारों की रचना करते हैं

ऐसा अनुमान भी लगाया जा रहा है कि ऐसे धूल कण की नये तारों की सृष्टि में मदद करते

हैं क्योंकि उनमें मौजूद गैस इसकी नींव रखते हैं। सूर्य को करीब से देखने और समझने के

लिए नासा द्वारा भेजा गया पार्कर सोलर प्रोव एक खास धुरी पर चक्कर काटता हुआ सूर्य

के करीब पहुंच रहा है। इसी धुरी पर आगे बढ़ने के क्रम में वह अपने रास्ते में नजर आने

वाले दृश्यों को कैद करने के साथ साथ वैज्ञानिक आंकड़े भी अपने नियंत्रण कक्ष को भेजता

रहता है। इस यान की मदद से सूर्य के अंदर हो रहे प्लाज्मा किरणों की बारिश को भी

देखने का अवसर हमें मिले हैं, जिसमें आसमान पर लाखों मील दूर तक यह प्लाज्मा

किरणों फैलती हैं और फिर वापस सूर्य में बारिश की तरह गिरती रहती है।

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