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दिमाग की शक्ति से यंत्र इस्तेमाल कर चल पा रहा है विकलांग

  • आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल साबित हुआ वरदान
  • चार साल से पूरी तरह विकलांग था वह युवक
  • दिमाग में सेंसर लगाकर धीरे धीरे सक्रिय किया
  • अपाहिजों के लिए बड़ा वरदान साबित हो सकता है
प्रतिनिधि

नईदिल्लीः दिमाग की शक्ति इस्तेमाल कर वह व्यक्ति अब चल पा रहा है।

चिकित्सा विज्ञान के लिहाज से वह पूरी तरह विकलांग हो चुका है।

उसके अपने बलबूते पर खड़े होने तक की शक्ति नहीं थी।

लेकिन आधुनिक विज्ञान ने उसे खड़ा होने और चलने की यह क्रांतिकारी शक्ति उपलब्ध करायी है।

इस अकेले प्रयोग से अब माना जा सकता है कि दिमागी तौर पर सोचने और समझने में सक्षम

हर विकलांग भविष्य में चल फिर सकेगा।

एक भीषण सड़क दुर्घटना में घायल होने के बाद थिबोल्ट (नाम बदला हुआ) पूरी तरह अपाहिज हो गये थे।

यह घटना चार साल पहले की है।

डाक्टरों ने किसी तरह उनकी जान तो बचा ली थी पर दुर्घटना की वजह से उन्हें पूर्ण रुप से अपाहिज मान लिया गया था।

इस घटना के बारे में बताया गया है कि काम करते वक्त यह 28 वर्षीय युवक बॉलकोनी की छत से गिर गया था।

काफी ऊंचाई से गिरने की वजह से उसे कई जगह चोट लगी थी।

इसी क्रम में उसकी रीढ़ भी भीषण तरीके से क्षतिग्रस्त हुई थी।

जान बचा लेने के बाद भी डाक्टर उसकी क्षतिग्रस्त रीढ़ को ठीक नहीं कर पाये थे।

इस वजह से उसके दिमाग से निकलने वाले संकेत उसके शरीर के अन्य अंगों तक नहीं पहुंच पाते थे।

डाक्टरों के लिहाज से वह पूरी तरह पक्षाघात पीड़ित था।

जिसके दोबारा खड़े होने की कोई उम्मीद नहीं थी।

इसी स्थिति का पता चलने के बाद ग्रेनोबल विश्वविद्यालय (फ्रांस) के शोधकर्ताओं ने अपनी विधि उसपर आजमाने की तैयारी प्रारंभ की थी।

इसके लिए सबसे पहले दो वर्ष पूर्व उसके दिमाग में दो सेंसर लगाये गये थे।

इन सेंसरों की मदद से यह पता चल पाया कि उसका दिमाग सही तरीके से संकेत भेज पा रहा है।

दिमाग की शक्ति समझने के लिए सेंसीमोटर कॉरटेक्स में सेंसर

इन सेंसरों को दिमाग के सेंसीमोटर कॉरटेक्स के दोनों तरफ लगाया गया था।

दिमाग का यही हिस्सा शरीर की अन्य तमाम गतिविधियों को नियंत्रित करता है।

वहां से सही संकेत प्राप्त होने की पुष्टि होने के बाद इसके आगे की तैयारी की गयी।

वहां से प्राप्त होने वाले तमाम संकेतों को एक एक कर दर्ज किया गया और उनके आधार पर कंप्यूटर के ढांचे में उन्हें विश्लेषित किया गया।

कौन सा संकेत क्या कुछ निर्देश दे रहा है, इसे समझने में वैज्ञानिकों ने काफी धैर्य के साथ काम किया।

सारा काम होने के बाद यह देखा गया कि उसके निर्देशों को समझने और विश्लेषित करने में कंप्यूटर को मात्र 350 मिलीसेकंड लग रहे हैं।

इसके बाद उसके शरीर के लिए बाहरी आवरण तैयार करने का काम प्रारंभ किया गया।

इस यांत्रिक परिधान को काम करने के लायक बनाया गया।

इसमें ऐसी विधि डाली गयी कि संकेत प्राप्त होने के बाद इस यांत्रिक परिधान में लगे हिस्से अलग अलग अथवा एक साथ काम कर सकें।

इसी यांत्रिक परिधान के आधार पर यह मरीज अपनी पैरों पर खड़ा नहीं होने के बाद भी सारा काम करने लगा।

इसे अमल में लाने के लिए उस मरीज को भी काफी अभ्यास करना पड़ा

ताकि उसकी सोच, कंप्यूटर और इस यांत्रिक परिधान के बीच सही तालमेल बैठ सके।

यह कोई आसान काम नहीं था।

लेकिन फिर से खड़े होने की अदम्य चाहत ने मरीज को ऐसा करने के लिए प्रेरित किया।

परीक्षण के दौरान अगले 24 महीनों तक मरीज को क्रमवार तरीके से अलग अलग काम करने का प्रशिक्षण भी दिया गया।

धीरे धीरे वह सारा काम सही तरीके से करने भी लगा।

यह सारा कुछ सफल होने के बाद इस परीक्षण के बारे में लेंसेट न्यूरोलॉजी जर्नल में गत शुक्रवार को इसकी जानकारी प्रकाशित की गयी है।

इस उपलब्धि को वैज्ञानिक क्रांतिकारी मान रहे हैं

वैज्ञानिक इसे एक क्रांतिकारी उपलब्धि मानते हैं।

इस शोध के बारे में वैज्ञानिक और प्रोफसर टॉम शैक्सपेयर ने कहा कि सभी हिस्सों को

मरीज संचालित कर पा रहा है, यह वाकई एक बड़ी उपलब्धि है।

प्रो. शैक्सपेयर लंदन स्कूल ऑफ हाइजिन एंड ट्रापिकल मेडिसन विभाग से जुड़े हुए हैं।

वैज्ञानिकों ने माना है कि रोबोटिक्स की मदद से बहुत सारा काम तो पहले से किया जा रहा है।

लेकिन किसी इंसान की दिमागी सोच की मदद से इस किस्म के यांत्रिक संचालन अपने आप में पहली और क्रांतिकारी घटना है।

अब ब्रेन में लगे सेंसरों की मदद से जब ऐसा काम हो पा रहा है तो पक्षापात के उन तमाम मरीजों को

इस पद्धति का लाभ मिलेगा जो अपने दिमाग से सही तरीके से सोच समझ सकते हैं।

अपनी सोच से शरीर के बाहर लगे यंत्रों यानी यांत्रिक परिधान की मदद से अपना काम करने की आजादी ऐसे मरीजों के लिए वरदान साबित होने जा रही है।

लेकिन इस काम को अमल में लाने में अभी और सुधार की जरूरत है। जिसमें अभी और वक्त लगेगा।

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