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पप्पू यादव की गिरफ्तारी के दूरगामी परिणाम जगजाहिर हैं

पप्पू यादव की गिरफ्तारी के बाद क्या कुछ हो सकता है, यह औसत आदमी भी समझ

सकता है। इसके बाद भी उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। पहले तो उन्हें लॉकडाउन

तोड़ने के अपराध में सिर्फ हिरासत में लिया गया था। उसके बाद मधेपुरा पुलिस वर्ष 1989

के एक मामले को कब्र से निकालकर ले आयी। जिस मामले में उन्हें गिरफ्तार कर जेल

भेजा गया है। रात करीब एक बजे कोर्ट के सामने पेशी कराने के बाद उन्हें जेल भेजा गया

है। तकनीकी तौर पर यह सभी पक्ष सही हो सकते हैं लेकिन जनता के मन में जो सवाल है

वह नीतीश सरकार के लिए खतरे की घंटी है। पूर्व केंद्रीय मंत्री राजीव प्रताप रूढ़ी के घर में

रखे गये एंबुलेंस का मामला उजागर होने के बाद ऐसा कुछ होगा, इसका अंदाजा तो आम

जनता को भी था। लेकिन सरकार चाहे वह केंद्र की हो या राज्य की, इस बात का एहसास

नहीं कर पायी कि लगातार मरीजों की सेवा में लगे इस शख्त की गिरफ्तारी के क्या

लोकतांत्रिक मायने निकलेंगे। लालू प्रसाद के जमानत पर बाहर आने के बाद वैसे ही बिहार

की राजनीति अस्थिर अवस्था में आ चुकी है। ऐसे में रूढ़ी के घर से एंबुलेंस की बरामदगी

के बाद के घटनाक्रम यह साबित कर देते हैं कि दरअसल पप्पू यादव की गिरफ्तारी बदला

लेने की नियत से की गयी कार्रवाई है। ऐसा भी माना जा सकता है कि आम तौर पर

नीतीश कुमार आलोचनाओं को व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं मानते हैं। लेकिन राजीव प्रताप

रूढ़ी के समर्थन में जिस तरीके से भाजपा के लोग सामने आये थे, उससे साफ है कि पप्पू

को जेल में डालने के पीछे कहीं न कहीं यह दबाव भी काम कर रहा होगा।

पप्पू यादव की गिरफ्तारी का असली कारण तो हर कोई जान रहा है

लेकिन लगातार जनता के बीच कौन मरीजों की सेवा कर रहा है, यह तो बिहार की जनता

देख रही है। मरीजों और उसके परिजनों को खाना पहुंचाने से लेकर ऑक्सीजन सिलिंडर

तक के इंतजाम के लिए अब बिहार के लोग पप्पू यादव को ही एक मात्र गैर सरकारी

आसरा मानकर चल रहे थे। सरकार ने आम जनता से उनका यह आसरा छीनकर जनता

को नाराज होने की खुली छूट दे दी है। दूसरी तरफ रूढ़ी के आवास पर नियम विरुद्ध तरीके

से यह एंबुलेंस क्यों रखे गये थे, उनका कोई संतोषजनक उत्तर किसी तरफ से नहीं आया

है। आम तौर पर इस किस्म की शिकायतों के आने के बाद सरकारी स्तर पर भी त्वरित

कार्रवाई होती है, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ है। प्रेस कांफ्रेंस कर श्री रूढ़ी को चालीस

ड्राइवरों की सूची देने के बाद न तो एंबुलेंस चालू हुए हैं और न ही उनके घर पर यह क्यों रखे

हुए थे, उस बारे में कोई संतोषजनक उत्तर सामने आया है। इस बीच पप्पू यादव ने प्रेस

कांफ्रेंस कर उन्हें धमकी देने का आरोप अवश्य ही सार्वजनिक कर दिया है। कोरोना की इस

दूसरी लहर के बीच भाजपा के अधिकांश नेता अब सिर्फ सोशल मीडिया पर ही अपनी

सक्रियता दिखा रहे हैं। उनके मुकाबले पप्पू यादव ने जो लंबी लकीर खींची है, उसका असर

तो बिहार की जनता पर होना तय है। करवट लेने की कोशिशों में जुटी बिहार की राजनीति

के इस संक्रमण काल के बीच पप्पू यादव के खिलाफ की गयी यह कार्रवाई शायद बिहार

सरकार और खास तौर पर बिहार भाजपा के लिए गले की हड्डी भी बन सकती है। ऐसा

इसलिए है क्योंकि जनता के बीच पप्पू यादव का काम साफ साफ लोगों को दिख रहा था।

एक लोगों के बीच सेवा कर रहा था बाकी सब तो गायब हैं

दूसरी तरफ समाज सेवा से गायब नेता भी गिने जा रहे थे। अब दोबारा जनता के बीच

जाने की नौबत आने पर भाजपा का कहीं वही हाल ना हो जाए, जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश के

पंचायत चुनाव के दौरान हुआ है। जनता को नजरअंदाज कर अपनी राजनीति चलाने का

खामियजा किसान आंदोलन से प्रारंभ होकर पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव तक तो

नजर आ चुका है। दिल्ली में ऑक्सीजन की कमी का खेल भी जनता समझ चुकी है। देश

में टीका वितरण में गड़बड़ी क्यों हुई है, यह भी सार्वजनिक सत्य है। ऐसे में जो चंद लोग

कोरोना के मरीजों के बीच लगातार काम कर रहे हैं, उन्हें राजनीतिक विद्वेष के कारण

न्यायिक हिरासत में भेजा जाना राजनीतिक तौर पर संवेदनशील बिहार की जनता को

पसंद नहीं आयेगा, यह तय बात है। इसलिए यह मानकर चला जाना चाहिए कि पप्पू

यादव की गिरफ्तारी के बिहार की राजनीति में दूरगामी परिणाम होंगे। सिर्फ अपने सेवा

भाव की वजह से उन्होंने जो सामाजिक लोकप्रियता हासिल की है, उसका राजनीतिक

नुकसान सिर्फ भाजपा अथवा पूरे बिहार सरकार को होगा, इसका आकलन भी शेष है।

लेकिन इससे विपक्ष को सक्रिय होने का मौका अवश्य मिल गया है। 

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