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महामारी के दौर में भी अगंभीर सोच ने भारत का नुकसान किया

महामारी के दौर में भी शायद केंद्र सरकार को भगवान का पूरा भरोसा था। इसी वजह से

विशेषज्ञों की राय को नजरअंदाज कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी आदत के मुताबिक

चुनावी मोड में व्यस्त रहे। वह शायद हमेशा ही चुनावी प्रचार के मोड में ही खुद को रखना

पसंद करते हैं। उनकी दूसरी पसंद पर फिलहाल कोरोना का ग्रहण लगा है और वे विदेश

दौरों पर नहीं जा पा रहे हैं। अब तो अनेक देशों ने भारत की बिगड़ती हालत की वजह से

भारत से यात्रा संबंध तोड़ रखे हैं। अब यह समझने वाली बात है कि जब कोरोना की दूसरी

लहर बांध तोड़कर आगे बढ़ी यानी वायरस हमारे शरीरों में घुस रहा है, हजारों लोगों की

जान ले रहा है, हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था को ध्वस्त कर रहा है, इसके चलते चिकित्सकों,

नर्सों, दवाओं और यहां तक कि ऑक्सीजन की कमी हो रही है। महामारी के दौर में यह

मोदी सरकार का सबसे बड़ा संकट है और तब से अब तक यह संकट और बढ़ा है। अगले

कुछ सप्ताह में यह विकराल रूप धारण कर लेगा। ऐसे राष्ट्रीय संकट के समय भी अगर

राजनीतिक लाभ उठाने की मंशा बार बार नजर आती हो तो इसे देश का दुर्भाग्य कहा

जाना चाहिए कि हमने एक ऐसी सरकार को अपनी जिम्मेदारी सौंपी है, जिसे देश की

जनता की तकलीफों का शायद ध्यान ही नहीं है। यह एक बड़ा राष्ट्रीय संकट है और हमें

चुपचाप कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढऩा चाहिए। परंतु लोकतंत्र में राजनीति नहीं रुकती

है और न ही राजनीतिक विश्लेषण और सवाल रुकते हैं।

महामारी के दौर में असली नेतृत्व की पहचान होती है

कुछ चीजें ऐसी भी हैं जो मजबूत नेता कभी नहीं करता। मसलन वह नाकामी को कभी

स्वीकार नहीं करता। उसे पराजय स्वीकार नहीं, चाहे वह कितनी भी छोटी क्यों न हो।

उसका जनाधार उसे इसलिए पसंद करता है क्योंकि उसे लगता है कि वह गलती कर ही

नहीं सकता। वह यह उम्मीद नहीं करता कि उनका नेता कहेगा, ‘माफ करना दोस्तों।

मुझसे गलती हो गई। ऐसा करके वह स्वीकार करेगा कि वह भी एक आम आदमी है, न कि

कोई अवतार। यही कारण है कि आपकी हर शुरुआत का अंत जीत के रूप में होना चाहिए,

ऐसी सोच भी देश को बहुत नुकसान पहुंचा रही है। इस सप्ताह के आरंभ में प्रधानमंत्री का

बरताव असामान्य रूप से बदला रहा। टेलीविजन पर अपने संक्षिप्त संदेश में उन्होंने कोई

दावा या वादा नहीं किया और न ही उसमें कोई उपदेश था। दूसरी बात, डॉ. मनमोहन सिंह

के एक छोटे से पत्र ने सरकार को हिलाकर रख दिया। यह बात स्वास्थ्य मंत्री की

आक्रामक प्रतिक्रिया से जाहिर होती है। यह सामान्य होता लेकिन अगले ही दिन सरकार

ने टीकाकरण को लेकर लगभग वही घोषणाएं कीं जिनका सुझाव सिंह ने दिया था। एक

मजबूत सरकार ऐसा नहीं करती। तीसरी बात, प्रधानमंत्री मोदी ने पश्चिम बंगाल में अपने

प्रचार का अंतिम चरण रद्द कर दिया। उन्होंने यह फैसला तब किया जबकि बहुत देर हो

चुकी थी। अब तो मद्रास हाईकोर्ट ने भी साफ साफ शब्दों में वहां कोरोना बढ़ने के लिए

चुनाव आयोग को जिम्मेदार ठहरा दिया है। दरअसल शायद मोदी के अनुयायियों को लग

रहा होगा कि यह अस्थायी है। चुनावी नतीजों के आने तक सब कुछ सामान्य हो चुका

होगी। किसी की भक्ति में आकंड डूबे होने के बीच सामान्य समझदारी का परित्याग कर

देने जैसी भूल कोई और नहीं हो सकती है।

वायरस की रोकथाम पर चुनावी बुखार हावी होने का नुकसान

वायरस को लेकर कई ऐसी बातें हैं जो अच्छे से अच्छे वैज्ञानिक भी अभी नहीं जानते

लेकिन कुछ बातें हमें पता हैं। वायरस वोट नहीं देता। वह किसी की हार या जीत की परवाह

भी नहीं करता। उसका ध्रुवीकरण संभव नहीं। अमेरिका, ब्राजील और अभी हाल तक ब्रिटेन

में लोगों को अपने नेताओं पर अत्यधिक भरोसे की कीमत चुकानी पड़ी। अब भारत में भी

ऐसा होने का खतरा उत्पन्न है। काफी देर से काम प्रारंभ होने का ही नतीजा है कि पूरे देश

में हाहाकार मचा है। अब केंद्र सरकार को असली सच्चाई से दो चार होना पड़ रहा है, जहां

सिर्फ लोकप्रिय नारों से लोगों के जान नहीं बचाये जा सकते। पहले से दी गयी चेतावनियों

को नजरअंदाज करने का खामियजा यह देश और देश की जनता भले ही जान देकर चुका

रही है लेकिन इसकी जिम्मेदारी तय करने का कोई दूसरा चेहरा फिलहाल नहीं है। इसलिए

ऐसा भी माना जाना चाहिए कि हर बार लोकप्रियता की नाव की सवारी करने की मानसिक

बीमारी ने भी इस देश को महामारी के उस संकट तक पहुंचा दिया है, जहां से वापसी में

अभी काफी वक्त लगना है और यह काम सिर्फ नारेबाजी से नहीं हो सकता है।

वास्तविकता के धरातल पर क्या कुछ काम हुआ, यह तो दिल्ली के ऑक्सीजन का मामला

ही स्पष्ट कर देता है। अब जिम्मेदारी कौन ले, यह भी बड़ी बात है।

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