अंटार्कटिका के ओजोन परत में नजर आया है सुधार

अंटार्कटिका के ओजोन परत में सुधार
  • नासा ने जारी किये अंटार्कटिका की सैटेलाइट तस्वीरें

  • पूर्व स्थिति में लौटने में लगेगा वक्त

  • अल्ट्रा वॉयोलेट किरणों को रोकता है ओजोन

  • ग्लेशियरों को गला देती है यू वी किरणें

प्रतिनिधि



नईदिल्लीः अंटार्कटिका के ऊपर के ओजोन की परत में सुधार हुआ है।

यानी यहां पर ओजोन की परत पहले से बेहतर स्थिति में आयी है।

नासा के वैज्ञानिकों ने अनुसंधा के इन चित्रों को जारी करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि

इसे संतोषजनक स्थिति नहीं माना जा सकता।

वहां के ओजोन की परत को और सुधारने की जरूरत है।

इस ओजोन परत के क्षतिग्रस्त होने की वजह से खतरनाक अल्ट्रावॉयोलेट किरणें पृथ्वी पर अधिक पड़ रही थी।

इस वजह से इस क्षेत्र में बर्फ के ग्लेशियर भी तेजी से पिघलने लगे थे।

नासा के अनुसंधा से जुड़े नेशनल ओसिनिक एटमास्फेयर एडमिंस्ट्रेशन (एनओएए) ने कहा है कि

पिछले 20 वर्षों के तुलनात्मक अध्ययन ने पता चलता है कि अंटार्कटिका के ऊपर स्थित ओजोन की परत में सुधार हुआ है।

पहले से यहां ओजोन की परत बेहतर हुई है।

अंटार्कटिका में हर साल सितंबर में बनती है यह परत

यह परत प्रति वर्ष सितंबर माह में बनती है

और तब के वातावरण की वजह से वहां की रासायनिक परिस्थितियां भी भिन्न हो जाती हैं।

इसमें सुधार का सीधा अर्थ है कि खास तौर पर ओजोन की परत को नुकसान पहुंचाने वाले औद्योगिक प्रदूषण में कमी आयी है।

इससे यह परत फिर से सुधार की तरफ अग्रसर है। वैज्ञानिकों ने बताया है कि अगर स्थिति में सुधार नहीं हुआ होता

तो यहां पर ओजोन की परत में और बड़ा छेद दिख सकता था।

पिछले कई दशकों से औद्योगिक प्रदूषण की वजह से इस परत को इतना अधिक नुकसान पहुंचा है।

खास तौर पर क्लोरिन आधारित उद्योगों ने ही इस परत को सबसे ज्यादा क्षतिग्रस्त किया है।

ओजोन की परत को क्लोरिन आधारित गैसों से होने वाले नुकसान का पता तो 80 के दशक में ही चल गया है।

उसे व्यवस्थित और सभी देशों को इसके लिए उचित कदम उठाने के लिए तैयार करने तक

पृथ्वी के वायुमंडल का इस हद तक नुकसान हो चुका था।

वर्ष 2016 में ओजोन की परत सबसे ज्यादा 20.7 वर्गकिलोमीटर तक फैली हुई थी।

वर्ष 2017 में यह थोड़ा घटकर 19.7 वर्ग किलोमीटर तक पहुंची थी।

वैसे वैज्ञानिकों ने बताया कि 80 के दशक जैसी पूर्व स्थिति के बहाल होने में अभी बहुत समय लगेगा।

इतना अधिक नुकसान हो चुका है, जिसकी भरपाई अब रातों रात तो कतई नहीं हो सकती।

पृथ्वी के दस किलोमीटर ऊपर होती है वायुमंडल के ओजोन की परत

ओजोन की यह परत पृथ्वी से करीब दस किलोमीटर की ऊंचाई पर वायुमंडल में होती है।

इसमें अत्यधिक मात्रा में ओजोन होता है।

इस ओजोन के वहां अत्यधिक मात्रा में होने की वजह से ही सूर्य से आने वाली रोशनी के खतरनाक अल्ट्रा वॉयोलेट किरणें सोख ली जाती हैं।

जब इस परत में छेद होता है तो यही अल्ट्रा वॉयोलेट किरणें पृथ्वी तक पहुंचती हैं।

इन किरणों से इंसान सहित सभी प्राणियों को नुकसान तो होता ही है।

साथ ही उत्तर ध्रुव पर इसकी वजह से बर्फ के ग्लेशियर भी तेजी से पिघलने लगते हैं।

प्राणियों में चमड़ी के कैंसर का सबसे बड़ा कारण भी यही अल्ट्रा वॉयोलेट किरण ही है।

पहले इस बात की जानकारी मिली थी कि एक खास किस्म के रसायन की वजह से ओजोन की परत को नुकसान पहुंचता है।

इसे सीएफसी बताया जाता है। इसका इस्तेमाल फ्रीज के साथ साथ कई कार्यों में किया जाता है।

इससे निकलने वाली गैस ही वायुमंडल में ऊपर जाकर ओजोन की परत में छेद कर देती है।

1985 में इस बात के प्रमाणित होने के बाद वर्ष 1987 में इसकी रोकथाम के लिए मॉंट्रियल समझौता हुआ था।

उसके बाद से लगातार सीएफसी का प्रभाव कम करने की कोशिश पूरी दुनिया में चल रही है।

हाल ही में वैज्ञानिकों के एक नये शोध में चीन के एक खास इलाके से इसके अधिक उत्सर्जित होने का पता भी चला है।



Facebooktwittergoogle_plusredditpinterestlinkedinmail

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.