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सही दिशा में आगे बढ़ रहा है ऑक्सफोर्ड का वैक्सिन अनुसंधान

  • एक हजार से अधिक लोगों पर हुई जांच

  • बुस्टर डोज से तुरंत बढ़ी प्रतिरोधक क्षमता

  • सामान्य किस्म के साइड एफेक्ट भी दिखे

  • मरीजों में प्रतिरोधक और टी कोष विकसित

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः सही दिशा में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय का कोरोना वैक्सिन अनुसंधान आगे

बढ़ रहा है। इस बारे मे पूरी दुनिया की नजर गड़ी हुई है। दुनिया भर के वैज्ञानिक भी

निर्धारित प्रक्रिया और पूरी पारदर्शिता के साथ किये जा रहे इस शोध की हर पल की

जानकारी चाह रहे हैं। अब इस संबंध में पहली बार यह बताया गया है कि वैक्सिन बनाने

के तहत चल रहे मानव परीक्षण का पहला दौर सफल रहा है। इसके तहत मरीजों में वे टी

सेल विकसित हुए हैं जो कोरोना वायरस को टक्कर दे सकते हैं। इसके तहत मरीजों में

कुछ साइड एफेक्ट्स भी देखे गये थे लेकिन कोरोना के संकट के लिहाज से वे नगण्य हैं।

सोमवार की रात को इस वैक्सिन के पहले चरण में मिली सफलताओं और उसके अन्य

आंकड़ों की जानकारी दी गयी है। इस जानकारी से अन्य वैज्ञानिकों को लगा है कि यह

काम सही दिशा में आगे बढ़ रहा है।  ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय जो वैक्सिन तैयार करने

मे जुटा है, उसका नाम सी एच ए डी 0 एक्स 1 एन सी ओ वी -19 है। इस पहले चरण के

क्लीनिकल ट्रायल के बारे में बताया गया है कि मरीजों के अंदर टी सेल विकसित करने में

सफलता मिली है। साथ ही मरीजों के अंदर रोग प्रतिरोधक शक्ति का भी विकास हो गया

है। इस विधि से शरीर के अंदर तैयार प्रतिरोधक कोरोना वायरस को फैलने से रोक सकता

है जबकि टी सेल खास तौर पर वायरस प्रभावित कोषों को नष्ट करने की क्षमता रखते हैं।

एक हजार 77 लोगों को इस क्लीनिकल ट्रायल के पहले दौर में शामिल किया गया था।

सही दिशा में परीक्षण के लिए अलग अलग प्रयोग हुए

इनमें से जिनलोगों को बुस्टर डोज दिये गये उनकी प्रतिरोधक क्षमता में उल्लेखनीय

बढ़ोत्तरी दर्ज की गयी। इसके बीच ही चीन ने फिर से अपनी वैक्सिन के वुहान में सफल

परीक्षण होने की दूसरी कड़ी की जानकारी दी है। लेकिन पहले के भ्रम और अविश्वास की

वजह से अब दुनिया के वैज्ञानिक चीन के दावों को बिना वैज्ञानिक तथ्यों के सामने आये

स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। चीन का दावा है कि उसकी कंपनी कैनसिनो द्वारा

तैयार इस वैक्सिन का वुहान में दूसरा परीक्षण भी ठीक रहा है।

बताते चलें कि इन दोनों ही किस्म के वैक्सिन अनुसंधान में दरअसल एक वायरस को ही

इस कोरोना वायरस से लड़ने का हथियार बनाया गया है। सामान्य ठंड और फ्लू पैदा करने

वाले एक वायरस की शक्ति को कमजोर करने के बाद उसनें आवश्यक संशोधन कर इस

वैक्सिन के डोज को विकसित किया गया है। इसके लिए जिस वायरस का उपयोग हुआ है

वह एडेनोवायरस कहलाता है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के वैक्सिन परीक्षण के पहले

क्लीनिकल ट्रायल के दौर में 543 लोगों को असली वैक्सिन दिये गये थे जबकि शेष 534

मरीजों को एक मैनिंनजाइटिस का वैक्सिन दिया गया था। इनमें से सिर्फ 10 लोगों को 28

दिनों के बाद बुस्टर डोज भी दिया गया था। जिनलोगों को परीक्षण के लिए तैयार वैक्सिन

का डोज दिया गया, उनकी नियमित जांच की जाती रही। 14 दिनों के बाद यह देखा गया

कि ऐसे स्वयंसेवकों को शरीर में टी सेल विकसित हुए हैं। रोग प्रतिरोधक क्षमता का

विकास 28 दिनों में हो पाया।

प्रतिरोधक विकसित होने के बाद 56 दिनों तक सक्रिय रहा

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि प्रतिरोधक विकसित होने के बाद यह अगले 56 दिनों

तक पूर्ण शक्ति से कार्यरत रहा। जब दस लोगों को बुस्टर डोज दिये गये तो उनकी

प्रतिरोधक क्षमता तुरंत ही शीर्ष पर पहुंच गयी। इस शोध से जुड़े वैज्ञानिकों ने बताया है कि

परीक्षण में शामिल किये गये लोगों में पचास प्रतिशत लोग पुरुष थे और उनकी औसत

उम्र चालीस वर्ष की थी। इस परीक्षण के बारे में स्पष्ट कर दिया गया है कि जिनलोगों को

वैक्सिन दिये गये थे, उनमें से किसी को यह जानकारी नहीं थी कि उन्हें दरअसल कौन सी

वैक्सिन दी गयी है। सिर्फ वैज्ञानिकों को इस बात की जानकारी थी कि किस मरीज को

कौन सी वैक्सिन दी गयी है।

इस परीक्षण के दौरान वैक्सिन दिये जाने के बाद सामान्य किस्म के साइड एफेक्ट्स भी

नजर आये। दवा दिये जाने के बाद 70 प्रतिशत लोगों ने मांसपेशियों में खिंचाव और दर्द,

बोझिलपन, सरदर्द, ठंड लगने और बुखार जैसा महसूस करने की बात कही थी। इन साइड

एफेक्ट्स को लेकर वैज्ञानिक चिंतित नहीं है क्योंकि सामान्य किस्म के पैरासिटामोल से

ही सारी परेशानियां दूर हो गयी। वैसे कुछ लोगों को वैक्सिन का डोज दिये जाने के पहले

भी पैरासिटामोल दिये गये थे, उनमें यह साइड एफेक्ट बहुत कम नजर आये।


 

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