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प्रधानमंत्री पर गुरूर भाजपा नेता जिम्मेदारी से कोसों दूर

  • कोविड सुरक्षा: लॉकडाउन का एक साल

पंडित मुस्तफा आरिफ

प्रधानमंत्री पर गुरूर भाजपा पर भारी पड़ता जा रहा है। याद

दिला दें कि 21 जनवरी 2020 के समाचार पत्रों में भारत के

सात हवाई अड्डों पर चीन से आने वाले यात्रियों की कोरोना

वायरस या कोविड 19 के मद्देनजर स्क्रीनिंग के समाचार के साथ भारत में कोरोना वायरस

के दस्तक के संकेत मिलना शुरू हो गये थे। उसके बाद से अब तक के परिदृश्य का

अध्ययन किया जाएं तो ये बात स्पष्ट हो जाएगी कि राजनैतिक परिस्थितियों के अनुरूप

2019 में पधारे कोविड 19 का व्यव्हार आंका गया। फरवरी 2020 में जब अमेरिका के

तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सपरिवार भारत नमस्ते इंडिया करने आएं, तब विश्व

पटल पर कोविड 19 का आगमन हो चुका था। 21 मार्च 2020 को भारत सरकार सतर्क तब

हुई जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में विधिवत स्वीकार कर

देशवासियों को इस महामारी से बचने के लिए तीन सूत्रीय कार्यक्रम “मास्क पहनो, दो गज

दूरी रखो और हाथ धोते रहों” दिया। तब से अब तक महामारी से बचने के प्रति जनता की

गंभीरता नेताओं से तालमेल बिठाती रहीं, आज भी हालत यथावत है। संक्षेप मे नेताओं का

व्यव्हार पर उपदेश कुशल बहुतेरे का बना हुआ है, यदि कोविड 19 महामारी के दौरान

नेताओं के आचरण पर श्वेत पत्र जारी किया जाएं तो महामारी के प्रसार में नेताओं की

भूमिका जनता से कई गुणा ज्यादा पाई जाएंगी। बिलाशुबह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

नेताओं की अनुशासनहीन जमात में अपवाद के रूप मे सामने आएं हैं। संक्षेप में

प्रधानमंत्री पर ग़ुरूर है, लेकिन भाजपा नेता जिम्मेदारी से कोसों दूर है।

प्रधानमंत्री पर गुरूर कर ही तख्तापलट का खेल हुआ

20 मार्च को मध्यप्रदेश में तख्तापलट हुआ कमलनाथ गये शिवराज आ गये। कांग्रेस ने

बरसी मनाई और भाजपा ने खुशियां मनाई। देश को जनवरी 2020 से मार्च 2020 तक

कोरोना से निपटने की तैयारी करना चाहिए था, सरकार को जब गंभीर होना चाहिए था।

तब सरकार प्रधानमंत्री पर गुरूर में डूबी हुई डोनाल्ड ट्रंप के नमस्ते इंडिया और कमलनाथ

के अलविदा कमलनाथ कार्यक्रम में व्यस्त रहीं। आज भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित

राज्यों के मुख्यमंत्री हमें कोविड के निर्देशो का पालन करते हुए दिखाई देंगे, परंतु उनके

अधीनस्थ मंत्रियों में ये सावधानी स्पष्ट रूप से नदारद मिलेंगी। 21 मार्च 2020 से 21 मार्च

2021 तक की अवधि कोरोना महामारी से ग्रसित देश ने पूर्ण और अंशकालिक लॉकडाउन

मे गुजारी। सीएए आंदोलन की छत्रछाया में शुरू हुआ महामारी का प्रकोप तबलीगी जमात

को दोषारोपण के साथ अपने प्रसार का धार्मिक एंगल खोजता रहा। भयभीत जनता ने

अनुशासित होने का पूरा प्रयास किया, परंतु नेता बिहार विधानसभा चुनाव के मद्देनजर

कोविड निर्देशों को तिलांजली देते हुए नज़र आएं। अब भी पश्चिम बंगाल, केरल,

तमिलनाडु और असम के चुनावों में कोविड महामारी का भय कम से कम नेताओं को तो

नहीं दिखाई दे रहा है। रैलियों और सभाओं में सभी दलों के बड़े नेता जिस प्रकार खुले आम

विचरण कर रहे हैं उसे देखते हुए लगता है कि उन्हें देश या जनता से अधिक सत्ता

हथियाने की चिंता है।

कोविड के प्रारंभ में सीएए आंदोलन, दिल्ली के जाफराबाद का दंगा, डोनाल्ड ट्रंप के नमस्ते

इंडिया की भीड़ और उनकी सुरक्षा में तैनात हजारों की संख्या में सुरक्षा कर्मी और फिर

केन्द्र सरकार की पूरी शक्ति मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार को उखाड़ने में लगने से

सरकार की प्राथमिकता क्या है, स्पष्ट दिखाई रहीं थीं।

ट्रंप के स्वागत और सत्ता हथियाने में जुटी थी सरकार

सरकार की गंभीरता का अंदाजा और सत्ता स्वार्थ की प्रवृत्ति किसान आंदोलन के लम्बे

चलने में स्पष्ट झलकती है। जब देश इतिहास के सबसे बड़े संकट काल से गुजर रहा हो,

ऐसे समय में जन आक्रोश भड़काने वाले निर्णय सरकार की समझदारी तो नहीं कहीं जा

सकती। जब संयम और विवेक की जरूरत थी, तब दूरदर्शिता से काम नहीं लिया गया। ये

मेरी नहीं देश के एक साधारण व्यक्ति और बुद्धिजीवी की सोच है। महानगरों से प्रवासी

मजदूरों के पलायन ने डरावना माहौल पैदा किया था। राजनीति और मीडिया जहां कोरोना

महामारी मे धार्मिक एंगल खोज कर तबलीगी जमात जैसे अनावश्यक विवाद को

महामारी से जोड़कर सरकार की असफलता उनके मत्थे डालने में व्यस्त थे। वहीं कोरोना

वारियर्स की समर्पित जमात अपने जीवन की परवाह न करते हुए अपने सुख आनंद को

तिलांजली देकर सही मायने में कोरोना पीड़ितो की सेवा में लगे थे। प्रधानमंत्री पर गुरूर में

उलझे नेताओं के बीच निश्चित रूप से अभिनेता सोनू सूद भारत के युवकों में एक आदर्श

सेवा भावी व्यक्तित्व के रूप मे सामने आएं, वो अपने समर्पण और सेवा के हमेशा याद

किये जाते रहेंगे। जनजागृति के लिए आवश्यक प्रजातंत्र के चौथे स्तम्भ की भूमिका में

इतिहासकार सराहना व अभिनन्दन के शब्द तो बिलकुल नहीं लिखेंगे।

लॉकडाउन की वर्षगाँठ के अवसर पर ये आलेख निश्चित रूप से इमानदार समीक्षा का

माध्यम है, जिसमें बात दिल से और निष्पक्ष रूप से रखने का मेरा प्रयास हैं और रहेंगा।

इस दौरान कोविड 19 और लॉकडाउन की विभिन्न परिस्थितियों में जब भी मेंने कलम

उठाई, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को विश्व के आदर्श पुरुष के रूप मे सामने रखा। इस बात से

तो आप भी सहमत होंगे कि परिस्थितियां कैसी भी रहीं हो, कितनी भी भीड़ रहीं हो, उनको

देश ने ही नहीं संपूर्ण विश्व ने अपने आचरण व्यवहार से सुरक्षा का संदेशवाहक पाया।

मोदी के चेलों का आचरण मोदी के खिलाफ ही रहा

आज भी चार राज्यों के चुनाव में अमित शाह सहित सभी भाजपा कोविड निर्देशों को

तिलांजली देते हुए नज़र आ रहा है, जनता की भारी भीड़ भी उनका अनुसरण कर डरावना

माहोल पैदा कर रही है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मास्क और दूरी को अपना कर

प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से जनता को सचेत रहने का संदेश दे रहैं है। जबकि उनके समकक्ष

विश्व के सभी देशों के नेता जिसमें अमेरिका, आस्ट्रेलिया, ब्राजील, ब्रिटेन और पाकिस्तान

सहित कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष शामिल हैं कोरोना की चपेट में आ चुके हैं। इसी प्रकार

कोरोना वैक्सीन के मामले में भारत को विश्व का सिरमौर बनाने में प्रधानमंत्री नरेन्द्र

मोदी की व्यक्तिगत रुचि और प्रबंधन उत्तरदायी है, ऐसा मानना बिलकुल एक इमानदार

अभिव्यक्ति हैं। विश्व को महामारी से निजात दिलाने वाले नेताओं की योग्यता सूची में

उनका नाम सर्वोपरि है, इसे इतिहास जरूर याद रखेगा।

21 मार्च 2021 के साथ भारत लॉकडाउन के दूसरे वर्ष में प्रवेश कर रहा है, लगभग डेढ़

करोड़ पीड़ितो की संख्या को पार कर और डेढ़ लाख से अधिक लोगों की मृत्यु संख्या को

पार कर भारत विश्व मे तीसरे स्थान पर हैं। पहला स्थान 12 करोड़ से अधिक ग्रसितो और

27 लाख मृतकों की संख्या के साथ अमेरिका के खाते में जाता हैं। खतरा अभी टला नहीं है,

केवल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सुरक्षित व सतर्क रहने से भारत खतरे से मुक्त नहीं हुआ

है, जबकि उनके अधीनस्थ सभी नेता और प्रधानमंत्री पर गुरूर के नशे में मस्त भाजपा

सहित देश के विभिन्न दलों के नेताओं सहित सभी जिम्मेदार अधिकारी और समाजसेवी

भी अपनी जिम्मेदारी का पालन नहीं करेंगे। देश के विभिन्न राज्यों महाराष्ट्र, पंजाब,

मध्यप्रदेश आदि से डरावने समाचार मिल रहैं हैं। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सजग व सक्रिय हैं।

कई राज्यों के मंत्रियों का आचरण गाइड लाइन के खिलाफ

परंतु उनके अधीनस्थ मंत्री और विधायक लापरवाह है। उनके आचरण से भी स्पष्ट है कि

प्रधानमंत्री का गुरूर उनके सर पर चढ़कर बोल रहा है। हाल ही में मध्यप्रदेश के गृहमंत्री

नरोत्तम मिश्रा और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा ने प्रदेश के रतलाम नगर का

दौरा किया, दोनों को खुले आम भीड़ में बिना मास्क और दूरी के देखा जा सकता था।

कार्यकर्ताओं और जनता में इसकी विपरीत प्रतिक्रिया हुई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

निश्चित रूप से कोरोना महामारी को लेकर गंभीर और सचेत हैं, लेकिन महामारी के

आसन्न संकट के मद्देनजर यदि हम सब सचेत व चौकन्ने नहीं हुए तो यूँ समझों की

चिंगारी को दावानल का रूप लेते देर नहीं लगेगी।

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