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सौर तूफान के दौर से गुजर रही है हमारी पृथ्वी कई गड़बड़ियां होंगी

तीन सौ किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ्तार है इसकी

पूरे सौर मंडल में फैल गये हैं इससे उपजे कण

गैसों की रफ्तार धीमी होती चली जा रही है

सैटेलाइट और बिजली पर ज्यादा प्रभाव 

राष्ट्रीय खबर

रांचीः सौर तूफान पृथ्वी के ऊपर से गुजर रहा है। वैज्ञानिक आकलन के मुताबिक इसकी

गति करीब तीन सौ किलोमीटर प्रति सेकंड है। यह समझा जा सकता है कि इस रफ्तार की

तूफान अगर धरती पर हो तो पूरी तबाही आ सकती है। लेकिन पृथ्वी का अपना वायुमंडल

इसे झेलने में सक्षम है। फिर भी वैज्ञानिक मानते हैं कि अगर इस तूफान की वजह से इस

वायुमंडल के कवच में थोड़ी आंच आयी तो दूरसंचार सहित कई व्यवस्थाओं में गड़बड़ी हो

सकती है। वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि इस सौर तूफान की वजह से पृथ्वी

में भूचुंबकीय गतिविधियों में भी उथल पुथल होने की आशंका है। इस सौर तूफान के बारे

में बताया गया है कि यह दरअसल सूर्य से पैदा हुआ है। सूरज में जारी लॉकडाउन की

स्थिति में सूर्य की रोशनी मद्धिम है। लेकिन बीच बीच में वहां से अचानक भीषण विस्फोट

होते हैं। इस बार का विस्फोट भी सूर्य के दक्षिणी छोर से हुआ है। वहां से प्लाज्मा किरणों

के उछलकर आसमान में कई लाख किलोमीटर तक जाने और फिर से वापस सूर्य पर

गिरने के दौरान भी तरंगों का पैदा होना स्वाभाविक प्रक्रिया है। वहां से जो भीषण गर्मी

वाले गैस निकले हैं, वे ही इस सौर तूफान की वजह हैं। सूर्य की सीमा से निकलने के बाद वे

अंतरिक्ष में चारों तरफ फैलते चले जा रहे हैं। इसी वजह से पृथ्वी पर भी इस सौर तूफान का

असर है। गनीमत है कि पृथ्वी का वायुमंडल का कवच कुछ ऐसा है जो इस किस्म की

हमलों को झेल लेता है। वरना इस कवच के नहीं होने की स्थिति में पृथ्वी पर तबाही आ

जाती। फिर भी इससे कुछ न कुछ गड़बड़ी होने की आशंका को पूरी तरह दरकिनार नहीं

किया जा सकता है।

सौर तूफान का खतरा पृथ्वी के बाहर के सैटेलाइटों पर

स्पेस वेदर के डॉ टोनी फिलिप्स कहते हैं कि पहले से ही पृथ्वी के भूचुंबकीय स्थिति में

मामूली बदलाव को दर्ज किया गया है। इसके गुजरने के दौरान उत्तरी ध्रुव के इलाके में

धरती के ऊपर फिर से रंग बिरंगी रोशनी का खेल भी देखने को मिल सकता है। यह रोशनी,

जिसे देखने पर्यटक भी आते हैं खास स्थित में ही नजर आता है। इस बार भी कुछ वैसी

परिस्थिति उत्पन्न हो सकती है। ऐसा नजर आने के अर्थ होगा कि उस सौर तूफान का

कुछ हिस्सा पृथ्वी के अंदर प्रवेश कर पाने में सफल रहा है। इस किस्म की रोशनी दोनों

ध्रुवों पर नजर आती है। उत्तरी ध्रुव के पास नजर आने वाली इस रोशनी को ऑरोरा

बोरेलियस और दक्षिणी छोर पर नजर आने वाली रोशनी को ऑरोरा ऑस्ट्रेलियास कहा

जाता है। सौर तूफान के कणों के प्रवेश करने की स्थित में इन इलाकों में तेज नीले रंग की

रोशनी भी नजर आने की उम्मीद है। लेकिन इस तेज गति के तूफान की वजह से पृथ्वी की

सैटेलाइट सेवा बाधित हो सकती है। इसके बाधित होने की स्थिति में दूरसंचार उपकरणों

पर भी इसका असर पड़ेगा और अस्थायी तौर पर यह दूरसंचार सेवा बाधित भी हो सकती

है। यह सारा कुछ सौर तूफान की स्थिति और पृथ्वी के बाहरी वायुमंडलीय आवरण की

शक्ति के संतुलन के बीच निर्भर है। वैसे इस वायुमंडल के बाहर अपनी कक्षा में घूम रहे

सैटेलाइटों पर इसका असर होना तय है। इसकी वजह से जीपीएस पद्धति की गड़बड़ी,

मोबाइल फोन के सिग्नल और सैटेलाइट टीवी के प्रसारण पर असर पड़ सकता है। ऐसा

इसलिए होगा कि यह सारे सैटेलाइट पृथ्वी के वायुमंडल कवच से बाहर स्थापित हैं।

बिजली स्टेशनों पर भी चुंबकीय असर का बुरा असर होता है

सौर तूफान का उनके बीच से गुजरना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। वैसे इसके गुजर जाने के

बाद से स्थिति क्या होती है, इस पर भी वैज्ञानिकों की नजर है। कुछ वैज्ञानिकों का मानना

है कि इस तूफान की वजह से पृथ्वी का वायुंडल भी बाहर की गर्मी की वजह से फैल

जाएगा। इसी फैलाव के दौरान तूफान के प्रभाव से कई इलाको में विद्युतापूर्ति भी ठप हो

सकती है क्योंकि बिजली सबस्टेशनों के ट्रांसफॉर्मर और अन्य बड़े केंद्रों पर इसका प्रभाव

पड़ेगा। यदि ऐसा होने लगे तो यह समझा जाना चाहिए कि सौर तूफान का कुछ हिस्सा

पृथ्वी के वायुमंडल के अंदर प्रवेश कर पाने में सफल हो गया है। पूर्व के आंकड़ों से पता

चलता है कि औसतन हर पच्चीस वर्षों में एक बार ऐसी स्थिति आती ही है। पिछली बार

ऐसा सौर तूफान वर्ष 1989मे पृथ्वी से टकराया था। उस दौरान इसी तूफान की वजह से

कनाडा के क्यूवेक में बिजली गुल हो गयी थी। वैज्ञानिकों के मुताबिक इतनी दूरी तय

करने के बाद इस सौर कणों की ताकत बहुत कम हो गयी है। फिर भी ये परेशानी पैदा

करने के लिए पर्याप्त हैं।

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