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प्याज से लेकर अन्य सामान्य मुद्दे हावी हो रहे देश पर




प्याज से लेकर नाली-सड़क का मुद्दा शहरी इलाकों में महत्व पाने लगा है। झारखंड के

विधानसभा चुनाव में लोगों के बीच फिर से आम आदमी के मुद्दे चर्चा के केंद्र में आ गये

है। जाहिर है कि यह भाजपा के लिए अधिक परेशानी की बात होने के बाद भी दूसरे

राजनीतिक दलों के लिए कोई आसान चुनौती नहीं है। ग्रामीण इलाकों में जल, जंगल

और जमीन के मुद्दे आदिवासी समाज को लंबे समय से आंदोलित करते आये हैं।

याद रहे कि अलग झारखंड राज्य का दो सौ वर्ष पुराना आंदोलन भी इन्हीं मुद्दों से प्रारंभ

होकर संथाल विद्रोह और बाद के घटनाक्रमों तक जा पहुंचा था। लिहाजा राष्ट्रीय मुद्दों

पर जो कुछ भी प्रचार हो रहा है उसके अलावा स्थानीय और जनता के मुद्दों पर अपनी

सोच और योजना पेश किये बगैर किसी भी राजनीतिक दल की चुनावी गाड़ी अंतिम

मुकाम तक शायद नहीं पहुंच पायेगी।

जो कुछ परिदृश्य सामने आ रहा है, उसके मुताबिक अन्य तमाम मुद्दों के अलावा

अब मतदाता अपने स्थानीय विधायक के पिछले पांच वर्ष के कार्यकाल का भी

अच्छी तरह मूल्याकंन कर रहे हैं। शायद इसी वजह से प्रत्याशियों के लिए यह चुनौती

और अधिक कठिन होती चली गयी है। इन चुनौतियों पर अपनी राय व्यक्त किये बिना

प्रत्याशियों को बहुमत का जनसमर्थन मिलने की कम उम्मीद है।

वैसे दूसरे चरण का चुनाव भी काफी हद तक यह स्पष्ट कर देगा कि चुनाव की गाड़ी में

राष्ट्रीय मुद्दा और स्थानीय मुद्दों का असर कैसा है। सभी दलों ने इस दूसरे चरण के

लिए भी पूरी ताकत लगायी है। इससे भी अंदाजा हो जाता है कि सभी दलों को इस

चरण के चुनाव का अगले चरण में पड़ने वाले प्रभाव का अच्छी तरह पता है।

प्याज से लेकर उबलते आक्रोश के बीच चल रहा चुनाव प्रचार

वे इसी वजह से चुनाव प्रचार की समय सीमा खत्म होने के बाद भी लोगों के घर घर

जाकर संपर्क करने तथा मतदाता परची पहुंचाने के नाम पर अपना वोट सुरक्षित करने

की कोशिशों को कमजोर नहीं होने दे रहे हैं। लेकिन इस काम में निश्चित तौर पर भाजपा

अपने तमाम प्रतिद्वंद्वियों से आगे निकलती जान पड़ती है। लेकिन सिर्फ इसी प्रचार की

वजह से भाजपा की गाड़ी आगे निकल जाएगी ऐसा मान लेगी गलती होगी क्योंकि

मतदान केंद्रों तक मतदाता के पहुंचने तक यह काम एक निरंतर प्रक्रिया के तहत चलता

रहता है।

इसलिए यह माना जा सकता है कि राष्ट्रीय और स्थानीय मुद्दों के बीच यह जंग मतदान

होने तक जारी रहेगी और उसके परिणाम का खुलासा मतगणना के दौरान ही हो पायेगा।

राजनीतिक दलों की यह जद्दोजहद पांचों चरण तक जारी रहने की उम्मीद है।

अगर इस बीच कोई और मुद्दा महत्वपूर्ण बना तो हो सकता है कि वह भी अगले चरणों

के चुनाव में असर डाल दे। इसलिए राजनीति के खिलाड़ी भी इन दिनों काफी सतर्कता

के साथ हर दांव पर नजर रखे हुए हैं। यह कई कारणों से जरूरी भी है। अब तक सारे

समीकरण इन्हीं मुद्दों पर आधारित होने की वजह से चुनावी लाभ और हानि का हिसाब

रखने वाले हर बदलाव को भांपने और उसके हिसाब से आवश्यक सुधार करने पर ज्यादा

ध्यान दे रहे हैं।

राष्ट्रीय मुद्दों पर स्थानीय मुद्दों के भारी पड़ने का सिलसिला महाराष्ट्र से ज्यादा प्रभावी

होता नजर आ रहा है। इन दो अलग अलग किस्म के मुद्दों का टकराव आगे भी जारी

रहेगा, इसकी पूरी संभावना है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि झारखंड में विधानसभा

चुनाव समाप्त होने के बाद पश्चिम बंगाल और दिल्ली में भी विधानसभा चुनाव

होने जा रहे हैं।

कौन मुद्दा महत्वपूर्ण है यह चुनाव परिणाम तय करेगा

इन दोनों राज्यों का चुनाव भी राजनीतिक तौर पर ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों

के परिणाम भी राष्ट्रीय राजनीति पर अधिक असर डालने वाले सिद्ध होंगे। वैसे भी

झारखंड में अगर राष्ट्रीय मुद्दों की जीत यानी भाजपा को स्पष्ट बहुमत हासिल होता

है तो यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा। दूसरी तरफ अगर प्याज जैसे स्थानीय मुद्दे

प्रभावी होते हैं तो आने वाले अन्य चुनावों में भी भाजपा को अपनी चुनावी रणनीति

में तेजी से तब्दीली करनी पड़ेगी। वैसे इन दोनों परस्पर विरोधी मुद्दों के बीच जो

समानता है वह किसान और गांव हैं, यह अच्छी बात है।

वरना देश की वर्तमान आर्थिक स्थिति के बीच,जहां अधिकांश सब्जी तक चालीस

रुपये किलो से अधिक के भाव में बिक रही है। याद रखना होगा कि कभी देश में चुनाव

का सबसे बड़ा मुद्दा प्याज भी बना था, जो अभी आम आदमी की पहुंच से बाहर है।

इसके बाद भी इस मुद्दे पर चर्चा करने से अनेक दलों को परहेज है क्योंकि वे जानते

हैं कि यह दरअसल शुद्ध तौर पर आम जनता का मुद्दा है। ऐसे में अन्य मुद्दों में से कौन

से मुद्दे जनता को अधिक आकर्षित कर पाते हैं, यह चुनाव परिणाम ही साबित

करने वाले होंगे।



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