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ग्रीनलैंड के बर्फ के नीचे प्रवाहित हो रही है एक बहुत लंबी नदी

  • रडार और एरियल सर्वे से प्राप्त आंकड़ों से निष्कर्ष

  • एक हजार किलोमीटर लंबी होने का अनुमान

  • एरियल सर्वे के आंकड़ों के आधार का नतीजा

  • उत्तर पूर्वी दिशा में है डार्क रीवर का प्रवाह

राष्ट्रीय खबर

रांचीः ग्रीनलैंड के अधिकांश इलाके बर्फ से ढके हुए हैं। हाल के दिनों में इन इलाकों के कुछ

में से ग्लेशियरों के पिघलने से नीचे का हिस्सा बाहर निकला है। इसके बीच ही यह पाया

गया है कि शायद इन ग्लेशियरों के नीचे से भी एक एक हजार किलोमीटर लंबी नदी

प्रवाहित हो रही है। वैसे इस प्रारंभिक निष्कर्ष के साथ ही खोज करने वालों ने साफ कर

दिया है कि अभी इसमें और आंकड़ों और तथ्यों का विश्लेषण अभी शेष है। वैसे विशाल

बर्फ खंडों के नीचे दबे होने की वजह से अभी आंकड़ों का भौतिक परीक्षण भी संभव नहीं है।

वैसे इस नदी की खोज करने के बाद उसका नाम डार्क रीवर रखा गया है। उपलब्ध आंकड़ों

के आधार पर इसका एक मानचित्र भी बनाया गया है। जिसके मुताबिक यह डार्क रीवर का

प्रवाह उत्तर पूर्व की तरफ पीटरमैन जोर्ड तक होता नजर आ रहा है। ग्रीनलैंड के बर्फ के

लगातार पिघलने की वजह से ही इस नदी की सृष्टि हुई है, इस बारे में अभी वैज्ञानिक कुछ

कह पाने की स्थिति में नहीं है। नदी के अंदर मौजूद तथ्यों की परख किये बिना यह नहीं

कहा जा सकता है कि यह कब पैदा हुई है। हो सकता है कि यह अति प्राचीन काल से ही हो

लेकिन उसका पता अब जाकर चल पाया है।

ग्रीनलैंड पर यह शोध होकाइडो विश्वविद्यालय ने किया

जापान के होकाइडो विश्वविद्यालय के शोध दल क्रिस्टोफर चैंबर्स ने इस बारे में साफ

किया है कि अभी बहुत कुछ का पता चलना शेष है। लेकिन रडार के आंकड़े और इलाके का

एरियल सर्वे इसके होने का संकेत दे रहे हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक ग्रीनलैंड के बहुत बड़े

हिस्से में यह वैली जैसा है और उसके बीच से ही इस नदी का प्रवाह हो रहा है। इसके

अधिकांश हिस्से अभी बर्फ के नीचे दबे हुए हैं। इसलिए उनका भौतिक परीक्षण किया

जाना संभव नहीं है। डार्क रीवर का पानी कैसा है, इस बार में भी अभी कुछ भी आकलन

नहीं किया जा सका है। सिर्फ इतना संकेत मिलता है कि ग्लेशियर के विशाल खंडों के नीचे

से यह नदी गहराई में प्रवाहित हो रही है। सामान्य अनुमान है कि बर्फखंडों के पिघलने की

वजह से ही इस नदी को जल उपलब्ध होता रहता है लेकिन ग्लेशियर के नीचे से पिघलते

बर्फ से तैयार पानी की रासायनिक संरचना के बारे में अभी कुछ कह पाना संभव नहीं है।

हवा में उड़ान भरते अत्याधुनिक यंत्रों ने इसके विद्यमान होने के आंकड़ों का संकलन

किया है। इन तमाम इलाकों की मैपिंग के काम के दौरान ही इसका पता चला है। जिसमें

कई हिस्सों से अन्य जलस्रोत मिलते हुए नजर आ रहे हैं। लेकिन पीटरमैन जोर्ड तक नजर

आने वाली नदी कैसे समाप्त होती है, इस बारे में भी अभी पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा

गया है। अनुमान है कि यह वैली से बाहर निकलती है अथवा फिर से ठंडे तापमान की

वजह से जमकर बर्फ में तब्दील हो जाती है, उसका पता लगाना अभी शेष है।

इन विशाल बर्फखंडों के नीचे कोई विशाल वैली भी हो सकती है

वैसे इस नदी के बारे में प्रकाशित शोध प्रबंध में यह साफ साफ बताया गया है कि हो सकता

है कि तमाम आंकड़ों को मिलाने में कोई गलती हुई हो। वैसी स्थिति में ग्रीनलैंड के

ग्लेशियरों के नीचे कोई वैली नहीं भी हो सकती है। लेकिन अभी और शोध से उसकी भी

पुष्टि होने वाली है। वर्तमान में यह पाया जा रहा है कि ग्रीनलैंड के मध्य से उत्तर पूर्व तक

नदी का प्रवाह बहना हुआ है। जो समुद्र तक पहुंचती नजर आ रही है। लेकिन नीचे की

गहराई में झांककर इन तथ्यों की पुष्टि करना अभी संभव नहीं हुआ है। इसके आधार पर

यह भी नतीजा निकाला जा रहा है कि इस विशाल बर्फ से ढके इलाके में ढलान किस तरफ

है क्योंकि नदी उत्तर पूर्व की दिशा में बहती नजर आ रही है। ग्रीनलैंड के बर्फखंडों के

लगातार पिघलने से उत्पन्न होने वाले खतरों के बारे में पहले ही आगाह किया जा चुका है।

अब इस नदी के प्रवाह की जानकारी मिलने से यह समझा जा सकता है कि बर्फ के

पिघलने की रफ्तार तेज होने की वजह से ही उससे जल का प्रवाह उत्तर पूर्व की तरफ हो

रहा है। वैसे इस शोध दल का यह भी निष्कर्ष है कि शीघ्र ही इसके बारे में और आंकड़े जुटा

लेने के बाद इलाके का वास्तविक परीक्षण कर नदी के प्रवाह और उसके अन्य तथ्यों के

बारे में पुष्टि की जा सकती है।


 

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