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सूरज से भी बड़ा एक विशाल तारा अंतरिक्ष में विस्फोट कर गया

  • आकार में सूर्य से सौ गुणा बडा तारा

  • चारों तरफ फैल रही है भीषण सौर आंधी

  • वर्ष 2016 में पहली बार देखा गया था तारा को

  • अब तक का सबसे बड़ा सौर विस्फोट नजर आया

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः सूरज से बड़ा तारा अगर अचानक फट जाए तो कैसा होगा। इसे हम तो महसूस

नहीं कर पाये लेकिन खगोल वैज्ञानिकों ने इसे घटते हुए देखा है। इस विशाल तारा का नाम

एसएन2016एपीएस था। यह पृथ्वी से करीब 3.6 बिलियन प्रकाश वर्ष की दूरी पर विस्फोट

कर खत्म हो गया। जाहिर है कि इतनी दूरी पर हुआ यह विस्फोट पहले ही घटित हो चुका

होगा, जिसकी झलक अब जाकर पृथ्वी के उपकरणों में कैद हुई है। वैज्ञानिक भी मानते हैं

कि अगर पृथ्वी के करीब ऐसा विस्फोट हुआ होता तो पूरी पृथ्वी ही तबाह हो जाती और

सूर्य के ईर्दगिर्द के अन्य ग्रह मंडल भी इसकी चपेट में आ जाते। फिर भी वैज्ञानिक मानते

हैं कि इस विस्फोट के उत्पन्न ऊर्जा का प्रभाव कहां तक आयेगा, यह देखना अभी शेष है।

फिलहाल तो इस इलाके में हुए विस्फोट के बाद सौर कण चारों तरफ फैलते चले जा रहे हैं।

सौर आंधी जैसी स्थिति भी बनी है और इस आंधी के प्रभाव को फैलते हुए देखा जा रहा है।

जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है कि इस तारे की खोज वर्ष 2016 में हुई थी। हवाई द्वीप

लगे एक खगोल दूरबीन से पहली बार इसे देखा गया था। इसके लिए वैज्ञानिक दल ने

जानकारी मिलने के बाद नासा के हब्बल टेलीस्कोप से भी इस पर नजर रखने का काम

प्रारंभ किया था। इसके विस्फोट होने का अंदाजा पहले से ही हो रहा था क्योंकि वहां की

रोशनी लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसा तभी होता है जब कोई सूरज से बड़ा तारा अपनी

संरचना बदलते हुए अपने अंदर समेटे हुए ऊर्जा को बाहर छोड़ने लगता है। उसका सारा

हिस्सा गैस में तब्दील होकर अंतरिक्ष में चारों चरफ फैल जाता है। लगातार दो वर्षों तक

इसपर नजर रखी जा रही है।

सूरज से बड़ा तारा फटा तो बहुत ऊर्जा निकली

वहां से जो रोशनी निकली है, उसके बारे में वैज्ञानिक मानते हैं कि तारा और उसके आस

पास के गैस के टकराने की वजह से यह रोशनी पैदा हुई है। इस विस्फोट के बाद वहां की

रोशऩी तेजी से चारों तरफ सौर आंधी की तरह फैलती चली जा रही है। इस पूरे शोध से जुड़े

वैज्ञानिक मैट निकोल कहते हैं कि यह अब तक का सबसे बड़ा विस्फोट है। उनके मुताबिक

हो सकता है कि अंतरिक्ष में इससे बड़े विस्फोट भी हुए हों लेकिन वैज्ञानिक उपकरणों में

कैद होने के लिहाज से यही सबसे बड़ा है। निकोल खुद बर्मिंघम विश्वविद्यालय के स्कूल

ऑफ फिजिक्स के प्राध्यापक हैं। वह इस शोध से प्रारंभ से ही जुड़े हुए थे। उन्होंने कहा कि

आम तौर पर अंतरिक्ष में इस किस्म के विस्फोट में एक प्रतिशत विकिरण कम होता है

लेकिन यह पहला मौका है जबकि विकिरण को पांच गुणा अधिक समझा जा रहा है। इससे

भी अनुमान लगाया जा सकता है कि यह विस्फोट कितना विशाल है।

आकार में इतना बड़ा तो असर भी बड़ा ही होगा

इस तारा के बारे में भी खगोलशास्त्रियों ने बताया है कि आकार में यह शायद अपने सूरज

से भी एक सौ गुणा बड़ा है। इसी वजह से इसके फट जाने से इतनी अधिक ऊर्जा निकल

रही है। इस विस्फोट में मुख्य तौर पर हाइड्रोजन की ही रासायनिक प्रतिक्रिया होती है।

लेकिन विस्फोट की वजह से अन्य गैस भी भीषण गर्मी की वजह से अंतरिक्ष में दूर दूर

तक फैलते चले जाते हैं। 13 अप्रैल को इस विस्फोट के बारे में एक शोध प्रबंध प्रकाशित

किया गया है। जिसमें विस्तार से पूरी प्रक्रिया और संभावनाओं की जानकारी दी गयी है।

इस शोध प्रबंध के सह लेखक एडो बर्जर है। वह हार्वड विश्वविद्यालय के एस्ट्रोनॉमी

विभाग के प्राध्यापक हैं। इसके बारे में पता लग जाने के बाद भी वहां की परिस्थितियों और

अंतरिक्ष में पड़ने वाले प्रभावों को देखा जा रहा है। इसके लिए नासा के वेब रूम टेलीस्कोप

का इस्तेमाल किया जा रहा है। नासा का जेम्स वेब टेलीस्कोप अभी जोड़ा रहा है। जिसके

शीघ्र ही अंतरिक्ष में भेजने की योजना है। वर्तमान में कोरोना संक्रमण की वजह से नासा के

अधिकांश अंतरिक्ष कार्यक्रम बंद कर दिये गये हैं। लेकिन अभी इस विस्फोट के स्थान और

आयतन की जानकारी दर्ज होने के बाद यह तय है कि जेम्स वेब टेलीस्कोप को अंतरिक्ष में

स्थापित किये जाने के बाद उसके जरिए भी इस बारे में और अधिक जानकारी मिलेगी।


 

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