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एक रुपया का जुर्माना क्या चेहरा बचाने की कवायद

एक रुपया का जुर्माना हुआ और प्रशांत भूषण के अपने ही अधिवक्ता ने इस जुर्माना की

रकम अदा भी कर दी। खुद प्रशांत भूषण ने इसकी जानकारी दी। लेकिन इस एक रुपये के

जुर्माना के बाद भी वह सवाल यथावत खड़ा है कि क्या वाकई प्रशांत भूषण की सोशल

मीडिया पर की गयी टिप्पणियों से अदालत की मानहानी हुई थी। अनेक वरिष्ठ और

विद्वान अधिवक्ताओं की राय में कानून में मानहानि की जो परिभाषा है, उसके तहत यह

सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई के दायरे में ही नहीं आना चाहिए था। लेकिन शायद आनन

फानन में अदालत के कुछ जजों को यह अपनी तौहीन लगी होगी सो खुद ही वादी बनकर

खुद ही फैसला भी सुना दिया। अदालती कार्रवाई की नियत प्रक्रिया के तहत यह मामला

खत्म हो चुका है। अदालत ने मानहानि का मामला मानते हुए जो फैसला प्रशांत भूषण के

मामले में सुनाया है क्योंकि अन्य मामलों में भी अदालत ऐसा ही फैसला लेंगी, यह बड़ा

सवाल अब भविष्य के गर्भ में जन्म ले चुका है। खुद प्रशांत भूषण ने इस पूरे प्रकरण पर

कहा है कि ‘‘ मेरे अधिवक्ता और वरिष्ठ सहयोगी राजीव धवन ने मेरे खिलाफ मानहानि

मामले में आदेश के फौरन बाद एक रुपये का योगदान दिया जिसे मैंने ससम्मान स्वीकार

कर लिया।’’ इससे पहले न्यायाधीश अरुण मिश्रा की पीठ ने आज प्रशांत भूषण

अवमानना मामले पर यह आदेश दिया ,जिसमें उनपर एक रुपये का जुर्माना लगाया गया

था और दंड की राशि अदा नहीं करने पर उन पर तीन वर्ष वकालत पर रोक लगाने और

तीन माह की सजा शामिल थी। अधिवक्ता न्यायपालिका के खिलाफ ट्वीट करने के लिए

दोषी ठहराए गए थे।

एक रुपया फाईन भी तब जब माफी मांगने से इंकार किया

न्यायाधीश मिश्रा, बी आर. गवई और कृष्ण मुरारी की पीठ ने 25 अगस्त को प्रशांत भूषण

के अपने ट्वीट्स के लिए माफी मांगने से मना करने के बाद आदेश सुरक्षित रख लिया था।

पीठ ने प्रशांत भूषण के ट्वीट के लिए माफी मांगने से मना करने का उल्लेख करते हुए

कहा, ‘‘माफी मांगने में क्या गलत है? क्या यह शब्द इतना खराब है?’’ सुनवाई के दौरान

पीठ ने प्रशांत भूषण को ट्वीट पर खेद व्यक्त नहीं करने के लिए अपने रुख पर विचार

करने के लिए 30 मिनट का समय भी दिया था। लेकिन प्रशांत भूषण ने स्पष्ट किया है कि

फैसले के खिलाफ दोबारा याचिका दायर करने का अधिकार उनका कायम है। साथ ही

उन्होंने अदालत के फैसले के सम्मान में जुर्माना तो भर दिया है लेकिन माफी नहीं मांगी

है। इसका सीधा अर्थ है कि उन्होंने जो मुद्दे उठाये थे, वे उनपर अब भी कायम है। अब

राजनीति के गलियार में चल रही कुछ अन्य चर्चाओं से जोड़कर इस पूरे मामले को देख

लें। पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने अपने से पहले के पूर्व मुख्य न्यायाधीश दीपक

मिश्र पर कई आरोप लगाये थे। यह आरोप चार जजों ने संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में लगाये थे,

जिससे पूरी न्यायपालिका में उथल पुथल की स्थिति बनी थी। बाद में श्री गोगोई मुख्य

न्यायाधीश बनाये गये और लगातार सुनवाई कर अयोध्या विवाद पर फैसला भी सुना

दिया। अब चर्चा हो रही है कि अगले चुनाव में रंजन गोगोई को ही असम में भाजपा का

मुख्यमंत्री पद का उम्मीद्वार बनाया जा जा सकता है।

रंजन गोगोई असम में मुख्यमंत्री का चेहरा होंगे ?

यदि वाकई ऐसा हुआ तो प्रशांत भूषण ने जिस सजा के जुर्माने की रकम अदा की है, उस

एक रुपया में से पच्चीस पैसे का आरोप तो सही साबित हो जाएगा। भारतीय

न्यायपालिका के समक्ष हर काल में इस किस्म के गंभीर सवाल खड़े होते रहे हैं। इस

किस्म के विवादों की अच्छी परिणति यह होती है कि इसी वजह से भारतीय न्यायपालिका

में न्यायिक सक्रियतावाद को बढ़ावा मिला है। इसलिए भविष्य में इस एक रुपये के

जुर्माना का क्या कुछ राजनीतिक प्रभाव पड़ने जा रहा है, इस पर सभी की नजर रहेगी।

लेकिन इतना तय है कि प्रशांत भूषण ने अपनी कार्रवाई से न्यायपालिका में भी एक नई

लहर पैदा कर दी है। साथ ही सर्वोच्च न्यायालय के जजों को भी यह स्पष्ट संदेश देने का

काम किया है कि वे भारतीय कानून की परिधि से ऊपर तो कतई नहीं है। जिन मुद्दों को

लेकर सर्वोच्च न्यायालय को स्वतः संज्ञान लेकर श्री भूषण को सजा सुनाने की नौबत

आयी, उन मामलों पर आज नहीं तो कल किसी अन्य जज का व्यक्तिगत आचरण फिर से

विवादों में आ ही सकता है। इससे साबित हो जाता है कि सर्वोच्च न्यायालय के जजों की

कौन कहें उच्च न्यायालय में भी जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया अभी तक पूरी तरह न तो

पारदर्शी है और न ही यह पाक साफ है। पैरवी के बल पर ऊपर आने वाले अपने आचरण को

बेहतर बनाये रखेंगे, उसकी उम्मीद कमसे कम पिछले दरवाजे से प्रवेश पाने वालों से तो

नहीं की जा सकती है।


 

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