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कोई रहस्यमयी प्रजाति वह भी इंसानों जैसी प्राचीन पृथ्वी में थी

  • जीवन में समानता नहीं पर जेनेटिक तौर पर करीबी थे

  • समुद्री तल पर विचरण किया करता था

  • किसी बड़े पत्ते के जैसा था यह प्राणी

  • सर और हड्डी के अंश नहीं थे उसमें

राष्ट्रीय खबर

रांचीः कोई रहस्यमयी प्रजाति भी प्राचीन पृथ्वी पर थी जो जेनेटिक तौर पर इंसानों के

बहुत करीब थी। इस जेनेटिक समानता के बाद भी वे इंसानों जैसे तो बिल्कुल भी नहीं थे।

समुद्र में रहने वाला यह जीवन बिना सर और रीढ़ का था। फिर भी उनमें इंसान की

वर्तमान प्रजाति के कई जेनेटिक गुण मौजूद थे। इस नई खोज ने वैज्ञानिकों को चकरा कर

रख दिया है। अनुसंधान में यह अनुमान लगाया जा रहा है कि कोई रहस्यमयी प्रजाति

समुद्र में करीब आधा बिलियन वर्ष पहले रहा करती थी। देखने और चाल चलन में उनके

साथ इंसानों का कोई मेल नहीं दिखता लेकिन जेनेटिक तौर पर समानता होने की वजह से

वैज्ञानिक सतर्क हुए हैं। यह सतर्कता इसलिए भी है क्योंकि प्राचीन पृथ्वी के उस कालखंड

में ऐसे जीवन की परिकल्पना भी नहीं की गयी थी। बहुकोषिय जीवन का उस समय में

मौजूद होने भी अपने आप में नई जानकारी है। लेकिन बहुकोषिय प्राणी होने के बाद भी

उनके पास सर, रीढ़ अथवा वर्तमान इंसानों का कोई ढांचा जैसा कुछ भी नहीं था। दूसरे

शब्दों में वे बहुकोषिय होने के बाद भी बिल्कुल सपाट थे। किसी बड़े पत्ते की तरह वह

समुद्र में रहते थे लेकिन वे पौधे तो कतई नहीं थे। उस प्रजाति के जो फॉसिल पाये गये हैं,

उससे अनुमान लगाया जा रहा है कि वे समुद्र के कम पानी वाले इलाकों में पानी के नीचे

सतह पर रेंगते रहते थे। बहुकोषिय प्राणी होने के कारण उनमें गतिशीलता थी लेकिन वह

बहुत धीमी गति से एक स्थान से दूसरे स्थान तक आते जाते थे। उस प्राचीन काल के

अवशेषों में यह पहला नमूना है, जिसे बहुकोषिय प्राणी के तौर पर पाया गया है। उसके

जेनेटिक अध्ययन से भी उसके जीन में इंसानों जैसी कई समानताएं भी पायी गयी हैं।

कोई रहस्यमयी प्रजाति इसलिए क्योंकि बहुत कुछ अज्ञात है

वैज्ञानिकों ने उस प्राचीन पृथ्वी के कई अन्य जीवन के अवशेष भी खोजे हैं। उनमें से

अधिकांश पेड़ पौधों की प्रजाति के हैं और उन्हें एक समूह में एडियाकारान बॉयोटा का नाम

दिया गया है। उस काल के प्राणी में कोई सर अथवा हड्डियों का ढांचा नहीं होता था। इस

शोध से जुड़ी यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया की मेरी ड्रोसर कहती हैं कि वे संभवतः त्रि

आयामी जीव थे। यानी उनमें लंबाई और चौड़ाई के साथ साथ गहराई यानी मोटाई भी

होती थी। वे समुद्री तल पर विचरण किया करते थे। करीब एक वर्ष पूर्व एक चावल के दाने

के बराबर के जीव के फॉसिल का अध्ययन करते हुए उन्होंने बहुकोषिय जीव के उस काल

में मौजूद होने की बात कही थी। वैसे यह भी स्पष्ट हो गया है कि उस काल के जीवन का

वर्तमान जीवन के बहुत अधिक नजदीक का संपर्क नहीं था। उस काल की चालीस ऐसी

प्रजातियों की खोज होने के बाद ओविड डिकिनसोनिया नामक इस बहुकोषिय जीव का

नामकरण अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के नाम पर किया गया था। अति

प्राचीन काल के इन अवशेषों से डीएनए के नमूनों को हासिल करना संभव नहीं था।

इसलिए दूसरे माध्यम से उनका विश्लेषण किया गया है।

इस शोध में ड्रोसर के साथ स्मिथसोनियन नेशनल म्युजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री के

वैज्ञानिक स्कॉट डेविस भी जुड़े थे। दोनों ने मिलकर उस काल की चार प्रजातियों के

फॉसिल्स का अध्ययन किया है। इनमें डिकिनसोनिया के अलावा इकारिया, किंबररेला,

और ट्राईबाचिडियम हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि सर और हड्डी नहीं होने के बाद भी

उस दौर के ऐसे प्राणी अपनी नसों की श्रृंखला की बदौलत खुद को एक स्थान से दूसरे

स्थान तक ले जाया करते थे। यही प्रक्रिया वर्तमान प्रजाति के इंसान भी किया करते हैं।

इंसान के जैसा ही नसों की बदौलत जगह बदलते थे

कई अन्य प्राणी भी इसी माध्यम से खुद को गतिमान रखते हैं। अब वैज्ञानिक उस दौर के

प्राचीन प्राणियों में बाकी प्रक्रियाओँ को समझने की कोशिश कर रहे हैं। इन बहुकोषिय

जीवों के कोषों की मौत किस पद्धति से निर्धारित होती थी, उसे भी समझने का प्रयास अभी

जारी है। इस वजह से यह माना जा रहा है कि पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति और अलग

अलग काल खंड में उनके विलुप्त होने के बीच भी जीवन के क्रमिक विकास को समझने में

अभी और वक्त लगना तय है क्योंकि हर दिन इसमें नये नये वैज्ञानिक तथ्य जुड़ते चले

जा रहे हैं। दरअसल पृथ्वी पर जीवन का नाश भी कई बार हुआ है। मसलन विशाल प्राणी

डायनासोर भी इस काल में सामूहिक विनाश के शिकार बने हैं क्योंकि किसी बड़े उल्कापिंड

के पृथ्वी पर आ गिरने की वजह से तबाही आयी थी। अब अनेकों बार ऐसा होने के बीच

नये सिरे से जीवन के विकास में बहुत कुछ परिवर्तन हुए हैं, जिन्हें समझने की कोशिश

जारी है।

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