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एक चेहरे पे कई चेहरे लगा लेते हैं लोग .. … ….

एक चेहरे पे मास्क पहले तो आदत नहीं थी फिर दो चार बार पुलिस की लाठी खाते दूसरों

को देखा तो धीरे धीरे आदत पड़ गयी। पहले बहुतों को अपने एक चेहरे पर मास्क लगाते

ही दम घुटने जैसा महसूस होता था लेकिन अब आदत हो गयी है। लेकिन इसके बाद भी

कुछ नमूने अब भी मास्क को नाक के नीचे रखकर चलते हैं मानो सिर्फ मास्क को चेहरे पर

टांग लेने पर से कोरोना से वह बच जाएगा। लेकिन हमलोग भी बहुत जल्दी खुद को किसी

विषम परिस्थिति में ढाल लेने के लिए ही शायद बने हैं।

बेचारी सरकार समझाते समझाते थक गयी कि भाई दूरी बनाकर चलो, मास्क पहनकर

चलो। लेकिन कौन सुनता है। सबकी अपनी अपनी सोच है। कुछ लोग मानकर चल रहे हैं

कि उन्हें कोरोना से बचाव का अदृश्य प्रतिरोधक मिला हुआ है। इतना कुछ होने के बाद भी

कंफ्यूजन भी बहुत है। जो लोग मास्क पहनकर चले उन्हें भी पता नहीं कहां से कोरोना ने

धर दबोचा। कई बार तो डाउट होता है कि यह जो कोरोना जांच है, वह भी किसी बड़ी

साजिश का हिस्सा तो नहीं है। प्राइवेट अस्पताल में जांच कराओ तो पॉजिटिव और

सरकारी अस्पताल में वहीं जांच नेगेटिव रिपोर्ट कैसे दे सकती है। दोनों में से कोई एक तो

गलत है। और तो और रांची के पास के अड़की में तो बिना जांच के भी तीन लोगों की रिपोर्ट

पॉजिटिव आयी थी। भले इस पर ज्यादा शोरगुल नहीं हुआ लेकिन यह अपने आप में जांच

करने वालों का कमाल ही है कि जांच हुए बिना ही कोरोना पॉजिटिव खोज लिया। इसी बात

पर एक पुरानी फिल्म का गीत याद आने लगा है।

वर्ष 1973 में बनी थी यह फिल्म दाग

वर्ष 1973 में बनी थी फिल्म दाग। जिस गीत की याद आ रही है, उसे लिखा था अपने

जमाने के प्रसिद्ध शायर साहिर लुधियानवी ने और संगीत में ढाला था लक्ष्मीकांत

प्यारेलाल की जोड़ी ने। गीत को भारत रत्न लता मंगेशकर ने अपना स्वर दिया था। इस

गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

जब भी जी चाहे, नई दुनिया बसा लेते हैं लोग
एक चेहरे पे कई चेहरे, लगा लेते हैं लोग
जब भी जी चाहे…

याद रहता है किसे गुजरे जमाने का चलन
सर्द पड़ जाती है चाहत, हार जाती है लगन
अब मुहब्बत भी है क्या, इक तिजारत के सिवा
हम ही नादाँ थे जो ओढ़ा बीती यादों का कफन

वर्ना जीने के लिए सब कुछ भुला लेते हैं लोग
एक चेहरे पे कई…

जाने वो क्या लोग थे, जिनको वफा का पास था
दूसरे के दिल पे क्या गुजरेगी ये एहसास था
अब हैं पत्थर के सनम, जिनको एहसास ना गम
वो जमाना अब कहाँ, जो अहल-ए-दिल को रास था
अब तो मतलब के लिए नाम-ए-वफा लेते हैं लोग

जब भी जी चाहे…

लेकिन कुछ कहिए एक चेहरे पर मास्क लगाने का कई दूसरे फायदे भी हुए हैं। अब

हमलोग चेहरा का कम हिस्सा देखकर भी एक दूसरे को पहचानने लगे हैं। शुरू शुरू में तो

मास्क पहने व्यक्ति को पहचान पाना भी कठिन था। बहुत जल्दी हमलोगों ने इसके लिए

खुद को प्रशिक्षित कर लिया। वैसे चौक चौराहों पर कुछ कमाल होने लगे हैं। इलाके के

लड़के लड़के मास्क पहनकर क्या कुछ गुल खिला रहे हैं, वह समझने से परे है। उन्हें भी

पता है कि एक चेहरे पर मास्क ऊपर से लड़कियों के दुपट्टे का घेरा यानी सिर्फ आंख ही

नजर आता है।

एक चेहरे पर दूसरा चेहरा मास्क बनाता है

ऐसी हालत में उन्हें पहचानता कौन है। जो मरजी कर लो। मुहल्ले के लड़के जो छिप

छिपकर सिगरेट पीते थे, वे भी मास्क पहनकर आराम से सिगरेट फूंकते हुए आगे निकल

रहे हैं। उन्हें पता है कि इस मास्क वाले चेहरे से कोई उन्हें पहचानने वाला नहीं है। बाप के

पैसे चुराकर मां ने बेटे को जो मोटरसाइकिल में तेल भराने के पैसे दिये हैं, उससे गाड़ी में

तेज भरवाकर फुर्ऱ से उड़ रहा है। पता है कि एक चेहरे पर दूसरा मास्क और ऊपर हेलमेट

लगा है तो जल्दी पहचान में नहीं आयेगा। अब कौन उसे बताये कि बेटा मास्क चेहरे पर

लगा है, नंबर प्लेट पर नहीं।

अलबत्ता गौर किया है कि एक चेहरे पर मास्क लगाने की परेशानी सबसे अधिक किन्हें

हैं। सड़कों और बाजार में गौर से उन महिलाओं को देखिये तो मास्क को नाक के नीचे कर

दुकानदार से मोल भाव कर रही हैं। बेचारी के चेहरे पर मास्क की वजह से रंगों का जो

अंतर आ गया है, उससे पता चल जाता है कि कितनी पर्ते चढ़ाने के बाद बाहर आना तय

किया था। एक चेहरे पर कई किस्म के रंग नजर आने लगते हैं। यह तो गलत है भाई।


 

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