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दुनिया में हर साल एक करोड़ लोगों को मारेगा विषाणु बचाव की तकनीक

  • हर विषाणु अपनी ताकत लगातार बढ़ा रहा है

  • पुरानी दवाएं अब ईलाज में कारगर नहीं रही

  • ऐसी लेप बने जिसपर वायरस चिपक नहीं पाये

  • धातु की कोटिंग वायरस और बैक्टीरिया को मार सकती है

प्रतिनिधि

नयी दिल्ली: दुनिया में हर साल एक करोड़ लोगों की जान जाएगी. जी हां, एक करोड़।

जिस तेजी से कीटाणु और अन्य रोगजनक जीव, एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिरोधक

क्षमता विकसित कर रहे हैं, उससे एंटीबायोटिक दवाएं, कई बीमारियों से लड़ने में बेअसर

साबित हो जाएंगी और इससे आगे चल कर हर साल एक करोड़ लोगों की जान जाने का

अंदेशा है।अभी तक हर साल दुनिया भर में सात लाख लोग ऐसे रोगों से मर जाते हैं, जिन

पर दवाओं का असर नहीं होता। पिछले एक दशक में हानिकारक बैक्टीरिया के खिलाफ

जिन एंटीबायोटिक्स का उपयोग किया जा सकता था, उनका असर अब कम होता जा रहा

है। इसी दौरान, अन्य रोग पैदा करने वाले वायरस, फफूंद और अन्य परजीवी भी इन

दवाओं से लड़ने की शक्ति विकसित कर रहे हैं। मतलब ये कि इनकी वजह से जो

बीमारियां होती हैं, उनका इलाज करना और भी मुश्किल हो रहा है। जानकारों का कहना है

कि जल्द ही कुछ नहीं किया गया तो दुनिया भर में हर साल एक करोड़ लोगों की मौत ऐसे

रोगाणुओं से होगी, जिन पर मौजूदा दवाओं का असर नहीं होता। हम सभी दिन भर में न

जाने कितनी चीजें छूते हैं। उन सभी पर कई प्रकार के कीटाणु, जीवाणु और वायरस चिपके

रहते हैं। वो किसी ना किसी सूरत में हमारे शरीर में दाखिल हो जाते हैं और हमें बीमार

करते हैं। कोविड-19 महामारी का कोरोना गत्ते पर 24 घंटे तक जिंदा रह सकता है, जबकि

प्लास्टिक और स्टील वगैरह पर तीन दिन तक। कुछ बैक्टीरिया, गैर जानदार चीजों पर

कई महीने तक रह तक जिंदा सकते हैं। इसीलिए, लगातार हर सतह को साफ रखने की

सलाह दी जाती है।

लेप या पर्त पर नहीं बच पायेंगे वायरस

जानकार कहते हैं, अब जबकि हम जान चुके हैं कि किस प्रकार की सतह पर कौन-सा

कीटाणु या बैक्टीरिया कितनी देर तक जिंदा रह सकता है तो क्यों ना हम एंटी बैक्टीरियल

परत के लेप का इस्तेमाल शुरू कर दें। तांबे की मिश्रित धातुओं को इसके लिए सबसे

अच्छा विकल्प माना गया है।ये धातु महज दो घंटे में 99.9 फीसदी बैक्टेरिया मारने की

क्षमता रखती है। प्राचीन काल में भारत और यूनान के लोग तो खाना तांबे के बर्तनों में ही

बनाते थे। भारत में तो आज भी तांबे के बर्तनों को सेहत के लिए अच्छा माना जाता है।

यूनान में वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए भी तांबे के बर्तनों का इस्तेमाल होता था, लेकिन आज

ये धातु महंगी होने की वजह से कम इस्तेमाल होने लगी हैं। इसकी जगह स्टील और

प्लास्टिक ने ले ली है।

तांबे के बर्तनों की साफ-सफाई भी आसान काम नहीं है। इसीलिए कुछ लोग इसे नापसंद

करते हैं। महंगा होने की वजह से अगर हम तांबे के बर्तन इस्तेमाल नहीं कर सकते तो

इसकी कलई चढ़ाकर तो इस्तेमाल किया ही जा सकता है। मिसाल के लिए डोर बेल या

लिफ्ट के बटन, दरवाजों के हैंडल कॉपर कोटिंग वाले बनाए जा सकते हैं। इससे कीटाणुओं

और वायरस का असर बहुत हद तक कम हो सकता है। जानकार तो यहां तक कहते हैं कि

मेडिकल ट्रांसप्लांट में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।वैज्ञानिक एंटीबैक्टीरियल

सरफेस तैयार करने के लिए प्रकृति से भी प्रेरणा ले रहे हैं। मिसाल के लिए सिकाडा कीड़ा

अपने पंखों से अपनी सफाई के लिए मशहूर है।

दुनिया में हर साल प्रकृति से ही सीख रहे हैं वैज्ञानिक

उनके पंख सुपरहाइड्रोफोबिक हैं। मतलब ये कि वो अपने पंखों पर पानी टिकने नहीं देते।

जैसे ही पानी की बूंदे उस पर गिरती हैं, वो फिसल जाती हैं और अपने साथ पंखों पर चिपके

कीटाणु भी बहा ले जाती हैं। अब इसी तर्ज पर नई तरह की सतहें तैयार करने पर काम

किया जा रहा है।

रिसर्चर टाइटेनियम और टाइटेनियम मिश्रित धातुओं के बारे में ज्यादा उत्साहित हैं। इन्हें

हाई टेंपरेचर पर आसानी से पिघलाया जा सकता है और तेज किनारों के साथ एक महीन

चादर बनाई जा सकती है, जिनसे विभिन्न प्रकार के जीवाणुओं को मारा जा सकता है।

इसके अलावा, पराबैंगनी किरणों के संपर्क में आने पर टाइटेनियम डाइऑक्साइड ऐसे

पराक्साइड का उत्पादन करता है जो रोगाणुओं को निष्क्रिय करता है। कोरोना वायरस को

कमजोर करने के लिए भी इसी तरह की कोटिंग वाली सतहों का इस्तेमाल किया जा

सकता है।


 

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