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अंटार्कटिका में विशाल ग्लेशियर का टुकड़ा टूट गया

  • वैश्विक पर्यावरण बिगड़ने का खतरा सामने आया

  • आकार में 115 वर्गमील तक फैला है यह बर्फ

  • पानी के जहाजों के लिए चेतावनी संकेत जारी

  • डूम्स डे ग्लेशियर भी अंदर से हो गया खोखला

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः अंटार्कटिका में विशाल ग्लेशियर टूट गया है। इस विशाल

बर्फ खंड के टूटकर समुद्र में जाने के बाद वहां के लिए खास तौर पर

चेतावनी संकेत भी जारी कर दिये गये हैं। आकार में यह इतना बड़ा है

कि वहां से गुजरने वाले किसी भी पानी के जहाज के लिए यह बड़ा

खतरा बन सकता है। जिस ग्लेशियर के अंटार्कटिका में टूटकर समुद्र

में आने की चर्चा हो रही है, वह आकार में करीब 115 वर्ग मील के

इलाके के बराबर है। इस विशाल बर्फखंड से समुद्र में किसी जहाज के

टकराने का क्या परिणाम हो सकता है, यह समझना आसान है।

जाहिर है कि इतने बड़े बर्फ से टकराने वाला कोई भी पानी का जहाज

टूटकर बिखऱ जाएगा। इसी वजह से यह चेतावनी संकेत जारी किया

गया है। अंटार्कटिका में इस घटना के साथ ही वैज्ञानिक वहां के एक

अन्य ग्लेशियर के बारे में भी चिंता जाहिर कर चुके हैं। डूम्स डे

ग्लेशियर के नाम से विख्यात एक और विशाल बर्फखंड अब अंदर से

गलकर पूरी तरह खोखला हो चुका है। इसलिए यह कभी भी पूरी तरह

टूटकर समुद्र में आ सकता है। इस विशाल ग्लेशियर के अचानक

टूटकर समुद्र में गिरने से सूनामी के खतरे के साथ साथ जलस्तर बढ़ने

की भी चुनौती सामने आ सकती है।

अंटार्कटिका में घटनाओं के सैटेलाइट चित्र भी हैं

सैटेलाइट से प्राप्त चित्रों के आधार पर पाइन द्वीप के इलाके में इस ग्लेशियर के टूटने का प्राथमिक संकेत मिला था। उसके बाद से ही लगातार उस पर नजर भी रखी जा रही थी।

इसके टूट जाने के बाद इसके आकार के बारे में यह बताया गया है कि

यह आकार में वाशिंगटन डीसी से दोगुना बड़ा है। मूल भूखंड से टूटने

के वक्त इसका आकार 115 वर्गी मील का था। समुद्र में जाने के बाद

यह अन्य छोटे छोटे टुकड़ों मे बंटता ही चला जा रहा है। इससे इलाके में

जलस्तर भी बढ़ रहा है क्योंकि यह सारा बर्फ पिघलकर पानी बन रहा

है। जहां से यह ग्लेशियर टूटकर अलग हुआ है, वहां भी इस घटना के

बाद से बर्फ पिघलने की गति अत्यंत तेज हो गयी है।

समझा जाता है कि यदि यह पूरा इलाका पिघल गया तो समुद्र का

जलस्तर चार फीट तक ऊंचा उठ सकता है। जिससे पूरी दुनिया में

तबाही आ सकती है। इस पूरे अंटार्कटिका में पिछली तीन दशक से

ग्लेशियरों के पिघलने पर नजर रखी जा रही है। अब देखा जा रहा है कि

जैसे जैसे दिन बीत रहे हैं, बर्फ के पिघलने की गति उतनी ही तेज होती

चली जा रही है। वैज्ञानिक आंकड़ों के मुताबिक पहले हर चार वर्ष के

अंतराल में ग्लेशियर के बड़े बड़े टुकड़े टूटा करते थे लेकिन अब यह हर

साल होने लगा है।

बर्फ की चादर बड़ी तेजी से पतली हो रही है

इससे अंटार्कटिका में बर्फ की चादर पतली भी होती चली जा रही है।

जहां से यह टुकड़ा टूटा है, वहां से मूल भूखंड पर बर्फ की ऊंचाई करीब

पांच सौ मीटर है। इसमें हाल के दिनों में तेजी से बदलाव नजर आ रहा

है, जो बढ़ते खतरे का संकेत हैं। इस इलाके में बर्फ जमा होने का

इतिहास काफी पुराना है और वैज्ञानिक अनुमान के मुताबिक यहां

करीब 58 खरब टन बर्फ हर साल पिघल रहा है।

यह आंकड़ा नेशनल एकाडेमी ऑफ साइंस ने जारी किया है। सैटेलाइट

से इन इलाकों में ग्लेशियर पिघलने से बनने वाले विशाल गड्डों को भी

साफ साफ देखा जा रहा है।

इसी बीच वहां के सैटेलाइट चित्रों से डूम्स डे ग्लेशियर के नाम से

चर्चित बर्फखंड के बारे में चिंता बढ़ाने वाली सूचना आयी है। ऊपर से

देखा गया है कि उसके ऊपरी पर्त से बर्फ तेजी से घटना जा रही है।

दूसरी तरफ समुद्र के अंदर से जब इस स्थान का सर्वेक्षण किया गया

तो यह पाया गया है कि यह सारा इलाका अंदर से लगभग खोखला हो

चुका है। इसलिए यह कभी भी पूरी तरह टूटकर समुद्र में जा सकता है।

सबसे तेजी से पिघलने की वजह से ही इस इलाके के इस विशाल

ग्लेशियर को डूम्स डे ग्लेशियर का नाम दिया गया है। आकार में यह

एक लाख 70 हजार वर्ग किलोमीटर से भी बड़ा इलाका है। इतने बड़े

इलाका का भारी और मोटा बर्फखंड अगर अचानक ही पूरी तरह समुद्र

में आ गिरा तो उसके घातक परिणाम पूरी दुनिया में फैलेंगे, यह तय

है। दरअसल अंदर से खोखला होने के कारणों की जांच में वैज्ञानिकों

को यह भी पता चला है कि यहां का पानी भी पहले के मुकाबले ज्यादा

गर्म हो गया है। इससे अंदर से बर्फ पिघलने की गति तेज हो गयी है।

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