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ओम प्रकाश चौटाला भी उतरे किसान आंदोलन के दंगल में

ओम प्रकाश चौटाला भी उतरे किसान आंदोलन के दंगल में
  • राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः ओम प्रकाश चौटाला के किसान आंदोलन में सक्रिय होने के हरियाणा में

राजनीति गरमाने लगी हैं। श्री चौटाला हाल ही में जेल से रिहा हुए हैं। किसान आंदोलनों में

उनके शामिल होने की वजह से हरियाणा सरकार भी सकते में हैं क्योंकि राज्य में उनके

राजनीतिक कद के प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता है। दूसरी तरफ उनके सक्रिय होने की

वजह से भारतीय किसान यूनियन (मान गुट) के प्रदेश अध्यक्ष गुणीप्रकाश उन्हें चुनौती

देने में जुट गये हैं। दूसरी तरफ किसान नेता राकेश टिकैत ओम प्रकाश चौटाला का

स्वागत कर रहे हैं। श्री चौटाला का धरनास्थलों पर जोरदार स्वागत हो रहा है। आंदोलन

का नेतृत्व कर रहे संयुक्त किसान मोर्चे के नेताओं ने राजनीतिक दलों के नेताओं से दूरी

बनाए रखने की बात कहते रहे हैं, लेकिन टिकैत उसकी उपेक्षा कर रहे हैं।

गुरनाम चढ़ूनी हरियाणा के किसान संगठनों की तरफ से संयुक्त मोर्चे में एकमात्र

प्रतिनिधि थे। यदि आप योगेद्र यादव को किसान और उनको किसानों का प्रतिनिधि

मानते हों तो बात अलग है। चढ़ूनी को संयुक्त मोर्चे ने चार दिन पहले एक सप्ताह के लिए

इस आधार पर निलंबित कर दिया कि उन्होंने पंजाब के किसान संगठनों को सुझाव दिया

था कि वे एकजुट होकर पंजाब विधानसभा के चुनाव लड़ें और वहां अपनी सरकार बनाएं।

वे अपनी सरकार को देश भर में आदर्श के रूप में प्रस्तुत करें।

ओम प्रकाश चौटाला की सक्रियता के उलट चढ़ूनी का बयान

ऐसा क्यों करना चाहिए, इसके लिए हरियाणा का उदाहरण देते हुए चढ़ूनी ने कारण भी

गिनाए थे। चढ़ूनी का कहना था कि किसानों के सहयोग से चौधरी भजनलाल की सरकार

आई, उस सरकार में भी किसान पीड़ित हुए। भजनलाल का विरोध कर चौधरी बंसीलाल

की सरकार बनाई। बंसीलाल की सरकार में भी किसानों का उत्पीड़न हुआ। बंसीलाल के

बाद चौधरी ओमप्रकाश चौटाला की सरकार बनवाई तो उस सरकार में भी किसानों पर

गोलियां चलीं। संयुक्त किसान मोर्चे के किसी नेता ने चढ़ूनी के तर्कों पर तो कोई जवाब

नहीं दिया, उन्हें निलंबित जरूर कर दिया। इससे हरियाणा के किसान संगठन क्षुब्ध हो

गए हैं। उनका कहना है कि संयुक्त किसान मोर्चे के लोग हरियाणा के किसान नेताओं के

सुझाव सिरे से खारिज कर देते हैं। यह नहीं चलेगा। इसके बीच ही हरियाणा से ओम प्रकाश

चौटाला के किसानों के धरनास्थलों पर पहुंचने से राजनीतिक माहौल बदलता नजर आने

लगा है।

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