आर्कटिक का सबसे प्राचीन बर्फ खंड भी अब पिघलने लगा 

  • ग्लोबल वार्मिग के तेजी से बढ़ते खतरे

  • सिर्फ इस साल दो बार बर्फ टूटा

  • नये बर्फ पर टिकी है वैज्ञानिकों की उम्मीद

प्रतिनिधि
नईदिल्लीः आर्कटिक का सबसे प्राचीन बर्फ खंड भी अब पिघलने लगा है।

इससे वहां से समुद्री जलस्तर में बढ़ोत्तरी हो रही है।

इस स्थिति पर नजर रखने वाले वैज्ञानिकों के मुताबिक अकेले इसी वर्ष दो बार

बर्फ टूटकर पूरी तरह पिघलने की घटना दर्ज की गयी है।

वैज्ञानिक इसे ग्लोबल वार्मिंग के लिए एक खतरनाक संकेत मानते हैं।

उन्हें इस बात से थोड़ी उम्मीद है कि पुराने बर्फ के पिघल जाने के बाद भी कुछ नये हिस्सों में

बर्फ जमता दिख रहा है।

आर्कटिक के बर्फ के पिघरने की घटना ने वैज्ञानिकों को वाकई चिंतित कर दिया है।

पूर्व में भरी गर्मी में भी यह बर्फ पूरी तरह चट्टान की तरह जमा रहता था।

उस प्राचीन बर्फ खंड का पिघलना निरंतर बढ़ते तापमान के अलावा अन्य बदलावों का भी संकेत दे रही है।

जैसे जैसे यह प्रक्रिया तेज होगी, बर्फ पिघलने की गति भी उसी अनुपात में तेज होती जाएगी।

इससे जमा हुआ बर्फ जब समुद्र में पहुंचेगा तो समुद्री जलस्तर में जो बढ़ोत्तरी होगी,

उससे दुनिया के कई श्रेष्ठ शहर पानी में डूब जाएंगे।

इस साल दो बार बर्फ पिघलने की घटना से खतरा उम्मीद से कहीं नजदीक होने की आशंका व्यक्त की गयी है।

उत्तरी ग्रीनलैंड के वे बर्फ खंड भी पिघल रहे हैं, जो पूर्व में हमेशा ही जमी हुई अवस्था में हुआ करते थे।

वैज्ञानिकों का मानना है कि जैसे जैसे बर्फ पिघलने की गति तेज होती ग्लोबल वार्मिंग का असर

और तेजी से बढ़ता चला जाएगा।

आर्कटिक के हिमखंड समुद्र में खिसक रहे हैं

समुद्र के अंदर पानी का तापमान गर्म होने तथा तेज रफ्तार से हवा चलन की वजह से आर्कटिक के छोर पर

पिघले बर्फ खंड भी खिसकर समुद्र में चले गये हैं,

वहां इनके क्रमवार तरीके से पिघलने से पानी बढ़ रहा है।

यह अपने आप में कई खतरों का संकेत दे रही है।

नये बर्फ खंडों के जमने पर ध्यान लगाये वैज्ञानिक यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि

मौसम के ठंडा होने पर पिघली बर्फ के कितने हिस्से के भरपाई हो पाती है।

ग्रीनलैंड के इस उत्तरी छोर पर हमेशा चट्टानी बर्फ ही लोगों के आवागमन का हिस्सा था।

इस पूरे हिस्से में जगह जगह पर अब पानी नजर आ रहा है।

जैसे जैसे गर्मी बढ़ रही है, पानी की मात्रा भी बढ़ती जा रही है।

इस इलाके की बर्फ के पिघल जाने के बाद अब वैज्ञानिक पश्चिमी इलाके में जमी हुई बर्फ की स्थिति का भी आकलन कर रहे हैं।

शोध करने वाले वैज्ञानिक वाल्ट मेइयर का कहना है कि ठंड अधिक होने की स्थित में बर्फ के कहीं खिसकने की संभावना नहीं होती।

इस वजह से उसके ढेर की ऊंचाई बढ़ती जाती है।

औसत में यह ऊंचाई चार मीटर होती है पर किनारों पर यह बीस मीटर तक ऊंची हो जाती है।

यह चट्टान जैसी इतनी मजबूत होती है कि आसानी से नहीं खिसक सकती।

अब उसके भी खिसकने से स्थिति को गंभीरता का आकलन कोई सामान्य व्यक्ति भी कर सकता है।

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