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नंदादेवी ग्लेशियर के गिरने से पौराणिक कहानी फिर से जीवंत हुई

  • रुपकुंड का नजारा कई लोगों को सिहरा देता है

  • झील के चारों तरफ बिखरे पड़े हैं अस्थि और कंकाल

  • कुछ नमूने बताते हैं कि वे स्थानीय प्रजाति नहीं है

  • वैज्ञानिक वेबिनार में कई तथ्यों पर नई बहस हुई

राष्ट्रीय खबर

रांचीः नंदादेवी ग्लेशियर के अचानक टूटने अथवा फिसलकर नीचे गिरने से तबाही आयी

है। सूचना तकनीक की क्रांति की बदौलत इस भीषण हादसे को हम सभी ने अपने अपने

स्मार्ट फोन पर देखा है। इस हादसे के उबरने के बाद अचानक से वहां की जानकारी रखने

वाले लोग इससे जुड़े एक प्राचीन कथा को याद करने लगे हैं। यह कई सौ वर्षों से लोकश्रुति

के जरिए लोगों तक पीढ़ी तक पीढ़ी चलता आया है। वैसे इस कहानी का उल्लेख कर उसके

वैज्ञानिक विश्लेषण से पहले यह जान लेना जरूरी है कि इसी ट्रैकिंग के रास्ते पर ही

रुपकुंड आता है। इस रुपकुंड को दूसरों से बिल्कुल अलग माना जाता है।

वीडियो में समझ लीजिए क्या है इसकी दंतकथा

आकार में अन्य झीलों से छोटा होने के बाद भी यह अधिक प्रसिद्ध है। यह इसलिए भी

प्रसिद्ध है क्योंकि इस झील के आस पास मानव हड्डियों का ढेर पाया गया है। सैकड़ो लोग

यहां मारे गये थे, उसके प्रमाण चारों तरफ बिखरे पड़े हैं। कुछ लोगों के प्रयास से हड्डियों के

ढेर को कई स्थानों पर एक जगह रख दिया गया है। स्थानीय लोगों की शिकायत है कि

वहां घूमने के लिए आये कई विदेशी पर्यटक भी अपने साथ हड्डी के नमूने ले गये हैं। इसी

वजह से यह रुपकुंड वहां आने वालों के मन में एक सिहरन पैदा करता है।

अब उस कहानी को दोहरा लें, जिसकी चर्चा फिर से होने लगी है। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी

तक आने वाली यह कहानी दरअसल कितनी पुरानी है, इसका कोई प्रमाण मौजूद नहीं है।

कहा जाता है कि नंदी देवी जाने के रास्ते में यह धार्मिक पर्यटन का एक केंद्र हुआ करता

था। यह भी बताते दें कि नंदादेवी को पार्वती का एक स्वरुप माना जाता है। कभी दूर के

किसी एक राजा के राज्य में सूखा पड़ने के बाद राजा को सपना आया था कि नंदा देवी

उनपर अप्रसन्न हैं, इसी वजह से राज्य में सूखा पड़ा है। इस सपना के बाद देवी को प्रसन्न

करने के लिए राजा खुद चलकर वहां पहुंचे। धार्मिक यात्रा पर राजा का पूरा दल बल उनके

साथ नंदा देवी की तरफ पूजा के लिए चल पड़ा। राजा के इसी मार्ग पर रुपकुंड भी पड़ता

था। वहां पड़ाव डालने के बाद राजा ने नतर्कियों से नृत्य कराकर यात्रा की थकान दूर करने

का काम किया। कहानी है कि इससे देवी और नाराज हो गयी। जिसके परिणाम स्वरुप

बर्फ का पूरा पहाड़ ही इस रुपकुंड पर आ गिरा। इससे राजा के साथ चल रहे सारे लोग बर्फ

में दबकर मारे गये।

नंदादेवी को देवी पार्वती के तौर पर पूजा जाता है यहां

इस कहानी को अब नंदादेवी ग्लेशियर के हाल के हादसों से जोड़कर देखें तो प्राचीन काल

में भी बर्फ का पहाड़ टूटकर गिरा था। इस बार भी कुछ वैसा ही हुआ है। हिमालय के इलाके

में बना यह झील देखने में कई बार अत्यधिक सुंदर होता है। कड़ाके की ठंड में यह पूरी

तरह जम जाता है। वहां वहां पायी गयी हड्डियों का वैज्ञानिक विश्लेषण कई नये राज

खोलता है। अब तक वहां जितनी अस्थियां पायी गयी हैं, उनके आधार पर यह अनुमान

लगाया जाता है कि वहां तीन सौ से आठ सौ लोगों के अवशेष मौजूद है। इन अस्थियों को

पहली बार 1942 में ही देखा गया था। लेकिन वर्ष 2019 में इन अस्थियों का जेनेटिक

विश्लेषण किया जा सका था। इस डीएनए विश्लेषण से रहस्य और गहरा गया है।

वैज्ञानिक साक्ष्य यह बताते हैं जो अवशेष वहां मिले हैं, उससे यह पता चलता है कि इन

हड्डियों में 14 ऐसे इंसानों के नमूने हैं, जो स्थानीय नहीं हैं। उनके बारे में प्रारंभिक

आकलन है कि वे मेडिटेरियन प्रजाति के इंसान हैं, जो यहां नहीं रहते थे। अब वे उतनी दूर

से हिमालय के ऊपरी हिस्से में कैसे और क्यों आये, इस बारे में विज्ञान फिलहाल कोई

जानकारी नहीं दे पा रहा है।

दो विश्वविद्यालयों के संयुक्त वेबिनार में फिर से चर्चा हुई है

प्रेसटन और प्रिंसेटन विश्वविद्यालय के एक वेबिनार में गत दो फरवरी को भी इस विषय

पर चर्चा हुई थी। यह बताया गया है कि सारी हड्डियां कई हजार वर्ष पुरानी है। लेकिन उस

काल में जब परिवहन भी इतना विकसित नहीं था, दूसरी प्रजाति के लोग यहां क्यों आये,

इसका कोई साक्ष्य मौजूद नहीं है। रुपकुंड में जो खोपड़ियां पायी गयी हैं, उनपर लगे चोट

के निशान उस कहानी की तरफ ही इशारा करते हैं कि सर पर लगे भीषण किस्म के चोट

की वजह से इनकी मौत हुई है। ऐसी चोट उस ऊंचाई पर सिर्फ बड़े बड़े ओलों के गिरने से ही

लग सकती है क्योंकि वहां मौजूद लोगो के पास ऐसे बड़े ओलों अथवा बर्फ के बड़े टुकड़ों के

आसमान से गिरने पर बचने का कोई उपाय मौजूद नहीं था। नंदादेवी तक आने वाले यह

विदेशी भी उस काल में हिंदू थे यह नया सवाल भी खड़ा हो गया है। कुल मिलाकर नंदादेवी

ग्लेशियर के हाल के हादसों ने कई सवालों को फिर से जीवंत कर दिया है।

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