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बागपत में मिले गुप्तकाल के प्राचीन सभ्यता के अवशेष

बागपतः बागपत में बड़ौत क्षेत्र में प्राचीन सभ्यता के अवशेष मिले हैं। कयास लगाए जा

रहे है कि ये गुप्तकाल की है। शहजाद राय शोध संस्थान बड़ौत के निदेशक डॉ अमित राय

जैन ने शनिवार को यहाँ यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि बड़ौत के बड़का गांव में

प्राचीन सभ्यता के अवशेष मिले हैं। बाबा शाहमल की शहादत स्थल के निकटवर्ती खेतों

का सर्वेक्षण करने के दौरान किसान विक्की त्यागी के खेत की ऊपरी सतह से ही

गुप्तकालीन मृण मूर्ति का चेहरा प्राप्त हुआ है। कयास लगाए जा रहे है कि ये मृण मूर्ति

गुप्तकाल की है। उन्होंने बताया कि करीब 15 वर्षों से शहजाद राय शोध संस्थान द्वारा

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के विभिन्न स्थलों का पुरातात्विक अन्वेषण सर्वेक्षण कार्य किया जा

रहा है। जिसके चलते बड़का गांव के जंगल में 1857 की क्रांति के नायक बाबा शाहमल के

शहादत स्थल के निकटवर्ती खेतों का सर्वेक्षण करने के दौरान गुप्तकालीन अवशेष प्राप्त

हुए है।

श्री राय ने बताया कि गुप्तकालीन मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े के अलावा ठप्पा भी प्राप्त हुआ

है। जिससे प्राचीन समय के लोग बर्तनों को आकृति प्रदान करते थे। इस ठप्पे का

इस्तेमाल आज भी कुम्हार मिट्टी के बर्तन और औजार बनाने में करते हैं। शहजाद राय

शोध संस्थान के निदेशक इतिहासकार डॉ अमित राय जैन ने बताया कि तीन बार सर्वेक्षण

के दौरान महाभारत कालीन चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति, कुषाण गुप्त, राजपूत काल के

अवशेष प्राप्त हो चुके हैं। यह इस बात को सिद्ध करते हैं कि यह स्थान करीब 5000 वर्षों से

लगातार मानव सभ्यता का केंद्र रहा है। उन्होंने दावा किया कि विक्की त्यागी के खेत की

ऊपरी सतह से प्राप्त हुए गुप्तकालीन अवशेष करीब 1500 वर्ष पुराने है।

बागपत में मिले अवशेषों में कई कलाकृतियां भी

प्राचीन मिट्टी का ठप्पा व मृणमूर्ति का करीब 2 इंच लंबा चेहरा प्राप्त हुआ है। यह अत्यंत

कलात्मक है। डॉ अमित राय जैन ने बताया कि गुप्तकाल के दौरान सभ्यता के लोग अपने

खेलने या अपने घरों को सजाने के लिए मृण मूर्तियों का निर्माण करते थे। जिनकी कला

अत्यंत विकसित हो चुकी थी। उस समय के लोगों मृण मूर्तियों में पगड़ी के साथ-साथ

मांसल चेहरा, आंखों की कलात्मकता पर विशेष जोर दिया गया है। जिसका एक उदाहरण

बड़का से प्राप्त गुप्तकालीन मृणमूर्ति का चेहरा है। उनका कहना है कि शीघ्र ही यहां से

प्राप्त अवशेषों की विस्तृत सूची बनाकर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को भेजकर मांग की

जाएगी कि यहां का भी सिनौली, चंदायन, बरनावा आदि स्थलों की तरह पुरातात्विक

उत्खनन का कार्य शीघ्र प्रारंभ किया जाए। गौरतलब है कि इससे पहले सिनौली गांव में भी

महाभारत कालीन अवशेष प्राप्त हो चुके है।

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