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ऐ दिल है मुश्किल जीना यहां अमेरिका से अहमदाबाद एक जैसा हाल है

ऐ दिल है मुश्किल जीना यहां, यह बात अगर अमेरिका में बसे भारतीयों की जुबान से बाहर

आये तो समझ सकते हैं कि दुनिया पूरी उलट पुलट हो चुकी है। अकेले अमेरिका की बात

क्यों करें, दुनिया भर में जहां कभी भी अपने भारतीय थे, उन्हें अचानक ही अपने

देश,वतन, गांव और शहर की याद आने लगी है। पहले यही देश और शहर उन्हें गंदा

लगता था। नई बच्चे के अप्रवासी बच्चे यहां आकर कहते थे इट्स वेरी नैस्टी। वाह बेटा।

अब जान पर बन आयी तो वतन की याद आ रही है। खैर आ जाओ। जितना मेरा घर है

उतना तुम्हारा भी घर हैं। मना नहीं करूंगा बल्कि स्वागत ही करूंगा। लेकिन याद रखना

यह सबक तुम्हें जिंदगी ने दिया है। जिंदगी के दिये सबक को जो याद नहीं रख पाता वह

अंततः मूरख ही होता है।

लेकिन बात अकेले अमेरिका या विदेश की नहीं है। झारखंड के जो मजदूर रोजगार के लिए

कमाने गये थे, वे किसी हाल में जान बचाकर भाग निकले हैं। अब ताजी जानकारी है कि

गुजरात से लौटे मजदूरों ने गढ़वा में कोरोना का आतंक फैला दिया है। एक दिन में बीस

लोग कोरोना पॉजिटिव पाये गये हैं। कोई बात नहीं।

यह इंडिया है मेरे भाई अपने हो तो अपना लेंगे

जब पता चल गया है तो अपुन हिन्दुस्तानी जुगाड़ साफ्टवेयर वाले लोग हैं। मरने के लिए

थोड़े ना छोड़ देंगे। कुछ न कुछ होगा। अच्छी बात यह है कि किसे इंफेक्शन हैं, इसका पता

तो चला है। भला हो उस सज्जन का, जो निजी टैक्सी कर मुंबई से रांची आये तो उन्हें

जानकारी मिली मुंबई की जांच रिपोर्ट में उन्हें कोरोना पॉजिटिव पाया गया है। उन्होंने खुद

ही फोन पर इसकी सूचना रांची प्रशासन को दी और सारा इंतजाम कराया ताकि बाकी लोग

उनके चक्कर में संक्रमण की चपेट में न आ जाए। लेकिन इस लंबे लॉक डाउन से एक

सवाल लगातार जेहन में उभरकर आ रहा है कि आखिर कहें तो क्या करें और जाएं तो कहां

जाएं। इसी बात पर एक पुरानी फिल्म का गीत याद आ रहा है। यह फिल्म सीआईडी का

गीत है। इसे लिखा था मजरूह सुलतानपुरी ने और संगीत में ढाला था ओपी नैय्यर ने।

इस गीत को स्वर दिया था मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर ने।

गीत के बोल कुछ इस तरह हैं

ऐ दिल है मुश्किल जीना यहाँ
ज़रा हट के, ज़रा बच के
ये है बॉम्बे मेरी जाँ

कहीं बिल्डिंग, कहीं ट्रामे, कहीं मोटर, कहीं मिल
मिलता है यहाँ सब कुछ, इक मिलता नहीं दिल
इन्साँ का नहीं कहीं नाम-ओ-निशाँ
ज़रा हट के…

कहीं सट्टा, कहीं पत्ता, कहीं चोरी, कहीं रेस
कहीं डाका, कहीं फाँका, कहीं ठोकर, कहीं ठेस
बेकारों के हैं कई काम यहाँ
ज़रा हट के…

बेघर को आवारा यहाँ कहते हँस-हँस
खुद काटे गले सबके, कहे इसको बिज़नस
इक चीज़ के है कई नाम यहाँ
ज़रा हट के…

बुरा दुनिया को है कहता, ऐसा भोला तो ना बन
जो है करता, वो है भरता, है यहाँ का ये चलन
दादागिरी नहीं चलने की यहाँ
ये है बॉम्बे…

ऐ दिल है मुश्किल…

ऐ दिल है आसाँ जीना यहाँ
सुनो मिस्टर, सुनो बन्धु
ये है बॉम्बे मेरी जाँ

लेकिन अब मुंबई की कौन कहे किसी भी बड़े शहर में जाने से इंसान डरने लगा है। जो

मजदूर अपने गांव में दूसरे शहर के नियमित रोजगार और अच्छी कमाई की वजह से

बेहतर आर्थिक हैसियत वाले समझे जाते थे, वे भी जान बचाकर भाग आये हैं। मरता क्या

न करता। वहां तो एहसास हो गया कि बाहर से रोजगार करने गया व्यक्ति वहां के लिए

अपना तो कतई नहीं था। नतीजा है कि लौटकर आने वालों में से अधिकांश अब दोबारा

वापस नहीं जाना चाहते। वे मान चुके हैं कि कम भी मिले तो चलेगा लेकिन दूसरे शहर में

मौत के बीच इस तरीके से जीने का कोई मकसद भी नहीं है। ऊपर से जब तक नहीं लौटे थे

तो गांव में अपने लोगों की जान भी सांसद में अटकी हुई थी। वह तो हरेक के पास मोबाइल

का संपर्क है तो हाल चाल मिल रहा था। अब भी जो फंसे हैं, उनकी भी वापसी हो रही है।

ऐसे में फिर से सवाल कौँधता है कि आखिर जाएं तो जाएं कहां। फिर अंदर से ही आवाज

आती है, बेटा खुद भुगतो, आखिर यह सारा कुछ तुमलोगों का ही किया धरा है। मैंने तो

साफ सुथरी जिंदगी दी थी। तुम्हारे दिमाग में सोचने की ताकत ज्यादा डालना ही तुम्हारे

लिए खतरा बन गया। अब जो कुछ झेल रहे हो वह तुमलोगों का ही बोया हुआ है। अब जब

बोए हो तो फसल खुद ही काटे। इसमें दूसरा कोई क्या कर सकता है। तुमलोगों ने अपने

फायदे के लिए गौरेय्या तक को भगा दिया था। अब घर में खुद कैद हो तो आस पास झांकों

गौरेय्या भी नजर आयेगी।


 

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