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जाने जाना जाओ कल फिर आना रोज इसी मोड़ पर




जाने जाना जाओ कल फिर आना, यह वाक्य अब किसान आंदोलन के मामले में सही

साबित हो रहा है। किसान आंदोलनकारी और सरकार के बीच वार्ता तो हो रही है लेकिन

दरअसल में वार्ता में समाधान की गाड़ी आगे नहीं बढ़ पा रही है। कई बार तो अइसा लगता

है कि दोनों एक दूसरे के धीरज की परीक्षा ले रहे हैं। कुल मिलाकर हर बार बात तो हो रही है

लेकिन काम की बात नहीं हो रही है। शायद यह सही है कि दोनों पक्ष एक दूसरे को इतना

आजमा रहे हैं कि कहीं आजमाने के चक्कर में मुद्दे की गाड़ी ही नहीं छूट जाए। वैसे भी यह

सरकारी तरकीब होती है कि जब कभी इस किस्म का आंदोलन सरकार को बेचैन करता है

तो सरकार सिर्फ यह तलाशती है कि किसी तरह आंदोलन के क्रम में कोई हिंसा हो जाए।

फिर तो आंदोलन को समाप्त करने का हथियार पुलिस के पास हो जाता है। बाबा रामदेव

के आंदोलन के दौरान भी सत्ता का यही चेहरा हम देख चुके हैं। लेकिन सत्ता शायद यह

नहीं देख पायी थी कि उस एक आंदोलन में पुलिस की हरकत की वजह से कांग्रेस को क्या

कुछ कीमत चुकानी पड़ी है। उस वक्त तो कांग्रेसी यह कहकर हंस रहे थे कि बाबा रामदेव

महिलाओं की सलवार पहनकर भाग निकले। इधर चुनाव हुआ तो कांग्रेस का भी नाड़ा खुल

गया। तब से अब तक पार्टी लगातार कुर्सी की बाट जोह रही है लेकिन कुर्सी रानी ऐसी रूठ

गयी है कि हाथ नहीं आ रही है। कांग्रेस की दुर्गति में दूसरी कील अन्ना हजारे के आंदोलन

के ठोंक दी थी। जहां से विवादों के बाद भी आम आदमी पार्टी का उदय हुआ, जिसने दिल्ली

में कांग्रेस के साथ साथ भाजपा की भी बाट लगा रखी है।

आम आदमी पार्टी इन्हीं राजनीतिक गलतियों की उपज है

पढ़े लिखे लोगों की जमात होने की वजह से वह किसी भी राजनीतिक हमले का उत्तर

आंकड़ों के साथ देने में समय नहीं गंवाते। लेकिन यह पहला मौका है जबकि किसान भी

आंकड़ों और जानकारी के मामले में सरकार से पीछे नहीं दिख रहे हैं। हर दलील की काट

उनके पास मौजूद है। अब तो नोटबंदी से लेकर अब तक के घटनाक्रमों का सिलसिलेवार

उल्लेख भी किसान आंदोलन के नेता करने लगे हैं।

इसी बात पर फिल्म समाधि का एक सुपरहित गाना याद आने लगा है। इस गीत को लिखा

था मजरूह सुलतानपुरी ने और संगीत में ढाला था राहुल देव वर्मन ने। इस गीत को किशोर

कुमार ने अपने ही अंदाज में गाया था। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

जाने जाना जाओ कल फिर आना यूँ ही किसी मोड़ पे मिल जाना

जान-ए-जानाँ जाओ कल फिर आना यूँ ही किसी मोड़ पे मिल जाना

अब याद रखना राह ये दिलबर लूटा है इस पर तुमने बहार में

कब तक यहीं पर आँख बिछाए बैठा रहूँगा मैं इंतज़ार में

जाओ करो न बेक़ल दिल रहा है मचल बाक़ी बातें होंगी कल

अभी क्या कहूँ

जान-ए-जानाँ जाओ कल फिर आना यूँ ही किसी मोड़ पे मिल जाना

थोड़ी अभी तो नज़र झुकाओगी थोड़ा अभी शरमाओगी तुम

पहला ही दिन है अपने मिलन का दो-चार दिन में खुल जाओगी तुम

इसे कहते हैं प्यार सिखाऊँगा मैं यार हूँ तुम्हारा दावेदार

आगे क्या कहूँ

जान-ए-जानाँ जाओ कल फिर आना यूँ ही किसी मोड़ पे मिल जाना

पागल कहो तुम हँस कर मुझको या दिल ही दिल में दीवाना समझो

पर ये तुम्हारी ऐसी अदा है अपने किसी को बेगाना समझो

न समझ में हो कम न उमर में हो कम अब तुमसे सनम

मैं भी क्या कहूँ

जाने जाना जाओ कल फिर आना

यूँ ही किसी मोड़ पे मिल जाना।

इसलिए हर रोज आना जाना और मिलना होने के बाद भी अंततः समाधान की गाड़ी

आखिर कहां मिल पायेगी, यह फ्यूटर टेंस की बात है। सुप्रीम कोर्ट ने तनाव को कम करने

में अवश्य ही अपनी भूमिका निभायी है। लेकिन अब 26 जनवरी की ट्रैक्टर रैली से सरकार

और भाजपा को यह समझ में आयेगा कि दरअसल में इस किसान आंदोलन की ताकत

कितनी है। कई बार तो कंफ्यूजन होता है कि सिर्फ पंजाब और हरियाणा के किसान ही

इसके विरोध में हैं। लेकिन दूसरी तरफ से यह तर्क भी उठता है कि फिर बाकी राज्यों के

किसान मुखऱ क्यों नहीं हो रहे हैं।

किसान किसान खेलते खेलते अब कई राज्यों के विधानसभा चुनाव भी करीब आ रहे हैं।

जाहिर है कि राम मंदिर और पाकिस्तान के मुकाबले किसानों का यह मुद्दा ग्रामीण भारत

को ज्यादा आंदोलित करन वाला है। पंजाब और हरियाणा में तो अब भाजपा के नेता ही

कृषि बिल के पक्ष में प्रचार करना छोड़ चुके हैं। करनाल यानी हरियाणा के मुख्यमंत्री के

अपने क्षेत्र में जो कुछ हुआ वह सबकी नजरों के सामने है। ऐसे में देखना है कि वार्ता की

ऊंट आखिर किस करवट बैठने वाली है।



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