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हर बात पर दूसरे को जिम्मेदार ठहराना अब बंद हो

हर बात पर पुरानी सरकार अथवा पूर्व मंत्रियों और नौकरशाहों को जिम्मेदार ठहराने की बीमारी से अब भी केंद्र सरकार

के कुछ मंत्री उबर नहीं पाये हैं। इस कड़ी में सबसे ज्वलंत उदाहरण केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण हैं।

वह अमेरिका में जाकर भी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह और रिजर्व बैंक के पूर्व

गवर्नर रघुराम राजन को कोस रही हैं।

यह अब समझ लेना चाहिए कि हर बात पर पूर्व की कांग्रेस सरकार को जिम्मेदार ठहराने का समय अब बीत चुका हैं।

यह पूर्व की कांग्रेस सरकार के बदले नरेंद्र मोदी की सरकार नहीं है।

नरेंद्र मोदी की सरकार का यह दूसरा कार्यकाल है।

इसलिए जब भी कोई पूर्व की सरकारों पर जिम्मेदारी डालने की बात कहता है तो स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि फिर

पिछले पांच साल में सरकार ने किया क्या है।

अगर कोई बड़ी गड़बड़ी थी तो उसे सुधारने की दिशा में अब तक कौन से प्रयास किये गये हैं, अब यह बताने का वक्त है।

हर बात पर सरकार ने पिछले पांच साल में क्या किया, यह बताने का वक्त है

हर बात पर पुरानी सरकारों को कोसने का अर्थ तो यही निकलता है कि पिछले पांच साल में इस सरकार ने भी,

जिसमें निर्मला सीतारमण रक्षा मंत्री भी थीं, ने कोई काम ही नहीं किया है।

देश की अर्थव्यवस्था के बारे में हाल ही में नोबल पुरस्कार विजेता कोलकाता के अभिजीत बनर्जी ने अपने पहले ही

संबोधन में यह स्पष्ट तौर पर कहा है कि भारत की वर्तमान सरकार को अब आंकड़ों की बाजीगरी से बचना चाहिए।

उन्होंने साफ साफ कहा है कि देश बहुत कठिन परिस्थितियों की तरफ तेजी से आगे बढ़ता जा रहा है।

जाहिर है कि अभिजीत बनर्जी को यूं ही नोबल पुरस्कार नहीं मिला है। और उन्हें यह पुरस्कार

अपनी वैश्विक शोध की वजह से मिला है।

यानी उन्होंने अर्थशास्त्र के क्षेत्र में पूरी दुनिया की परिस्थितियों का गहन अध्ययन कर ही पूरी दुनिया से

गरीबी मिटाने की परिकल्पना पर यह शोध तैयार किया है।

इस शोध मे पूरी दुनिया से गरीबी मिटाने के प्रयोगों के बारे में कहा गया है। जाहिर है कि

वैश्विक स्तर पर जिस शोध को नोबल पुरस्कार के लायक समझा गया,

उसके लेखक की बातों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।

कोलकाता में पले बढ़े अभिजीत को अब भारतीय राजनीति से भी कुछ लेना देना नहीं है।

लिहाजा उन्होंने भी अगर आंकड़ों की बाजीगरी की बात कही है तो यह वाकई एक गंभीर मुद्दा है।

वैसे भी यह आरोप पहले से ही लगते आये हैं, जिसमें बताया गया है कि वर्तमान सरकार अपनी खामियों को

छिपाने के लिए आंकड़ों की हेराफेरी करती है।

अब सवाल देश की आर्थिक हालत बिगड़ने का है।

नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री की बातों को समझना चाहिए

जिसमें केंद्रीय मंत्री सिनेमा के कारोबार अथवा बाजार में मोबाइल की बिक्री का जब हवाला देते हैं

तो वह निश्चित तौर पर स्थिति को गंभीरता को नहीं समझते और अपनी वैचारिक शून्यता से

पूरी दुनिया में भारत को भी शर्मिंदा करते हैं।

ऐसे नेताओं को अब हर बात पर बयानबाजी करने से बेहतर खुद को वैचारिक तौर पर अधिक मजबूत बनाने का प्रयास

करना चाहिए वरना वह अपने साथ साथ नरेंद्र मोदी की सरकार के लिए भी अंततः जगहंसाई का माहौल बना रहे हैं।

देश की स्थिति गड़बड़ है, इसे स्वीकार लेने से निर्मला सीतारमण अथवा किसी अन्य भाजपा नेता को

कोई राष्ट्रविरोधी नहीं करार देगा, यह तय है क्योंकि देश ने इससे पहले भी इस स्थिति को झेला है।

डॉ मनमोहन सिंह के कार्यकाल में भी यह अर्थव्यवस्था डगमगायी थी।

उस दौरान अमेरिका में किन्हीं कारणों से मकान के लिए कर्ज लेने वालों ने जब समय पर कर्ज की अदायगी नहीं की

तो वैश्विक स्तर पर आर्थिक गड़बड़ी की सूनामी पैदा हो गयी थी।

अनेक अमेरिकी और अन्य बैंक इसी सूनामी की चपेट में आकर डूब गये।

लेकिन भारत अपनी प्राचीन आर्थिक परंपरा की वजह से इसे झेल पाने में सफल रहा

क्योंकि लोगो के पास संकट के लिए बचत किये हुए पैसे थे।

अब नोटबंदी के पास यह स्थिति भी नहीं है।

इसलिए सरकार को सोच समझकर कदम उठाना चाहिए।

निर्मला सीतारमण को भी अब सोच समझकर बोलना चाहिए

पंजाब एंड महाराष्ट्र को-आपरेटिव बैंक का चार हजार करोड़ से अधिक का घपला सरकारी लापरवाही को ही दर्शाता है।

इस मुद्दे पर भी निर्मला सीतारमण गैर जिम्मेदारी वाला बयान दे चुकी है कि

यह देखना सरकार का नहीं भारतीय रिजर्व बैंक का काम है।

केंद्रीय वित्त मंत्री पूरे देश की आर्थिक गतिविधियों के लिए जिम्मेदार होता है,

इस बात को खुद निर्मला सीतारमण को समझना चाहिए।

हर बात पर बयान देने की उनकी आदत पहले भी राफेल के मुद्दे पर सरकार के लिए परेशानी का सबब बनी थी।

इसलिए अगर किसी बात की पूरी जानकारी नहीं है तो तुरंत बयान देने से तो बेहतर है कि

वह मामले का अध्ययन कर लेने के बाद कुछ कहें।

इससे और कुछ नहीं तो कमसे कम जगहंसाई तो नहीं होगी।

 

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