चीनी से भी ग्रीन एनर्जी यानी बिजली बनाने की कवायद शुरु

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  • डीएनए विश्लेषण से वैज्ञानिकों को मिला रास्ता

  • प्रदूषण से मुक्त होगी यह बिजली

  • गन्ना उद्योग को भी मिलेगी सुरक्षा

  • ऊर्जा उत्पादन खर्च कम करने की तैयारी

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः चीनी हमारी दैनंदिन जीवन का हिस्सा है।

पूरी दुनिया में चीनी का कमोबेशी एक ही इस्तेमाल है।

अब वैज्ञानिकों ने उसके डीएनए के विखंडन से उसका नये इस्तेमाल का रास्ता तलाश लिया है।

अब चीनी उत्पादन के साथ साथ पर्यावरण के लिए बेहतर ग्रीन एनर्जी के उत्पादन में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकेगा।

वैज्ञानिकों का मानना है कि चीनी के उत्पादन के बाद जो हिस्से बच जाते हैं

और किसी खास उपयोग में नहीं आते, उनकी मदद से यह ऊर्जा उत्पादित हो सकेगी।

इस विधि के विकास से करीब दो खरब वार्षिक कारोबार के नये उद्योग को भी सुरक्षा और संरक्षण मिलना तय हो जाएगा।

क्वींसलैंड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक इस काम में जुटे हुए हैं।

यूं तो यह विश्वविद्यालय हमेशा से ही कृषि एवं भोजन संबंधी आविष्कारों के लिए जाना जाता है।

इस बार वहां के वैज्ञानिक रॉबर्ट हेनरी ने दूसरों के साथ मिलकर इस काम को अंजाम दिया है।

शोध में दुनिया भर के कई अन्य वैज्ञानिक भी सक्रिय तौर पर जुड़े रहे हैं।

इस दल ने गन्ने के जिनोम की कड़ी को समझने में सफलता पायी है।

जिनोम की इस कड़ी को समझने में उनके साथ अमेरिका का जिनोम इंस्टिट्यूट भी उनके साथ था।

चीनी और बिजली के अलावा बनेगा नये किस्म का प्लास्टिक भी

वैज्ञानिक इसके आधार पर इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि गन्ने की खेती का इस्तेमाल अब ऊर्जा उत्पादन के साथ साथ नष्ट होने वाले प्लास्टिक बनाने में भी किया जा सकता है।

इससे दुनिया की पेट्रोल जैसी ईंधनों पर निर्भरता काफी हद तक कम होगी।

वैज्ञानिक यह भी मान रहे है कि पेंट्रोल के बदले इस ईंधन के इस्तेमाल से गाड़ियों में लगने वाले अनेक किस्म के उपकरणों की आवश्यकता भी समाप्त हो जाएगी।

इससे गाड़ियों की कीमतें कम होंगी। सबसे बड़ी बात यह होगी कि

इससे उत्पन्न होने वाली ऊर्जा का पर्यावरण पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

वर्तमान में पर्यावरण का मुद्दा ही पूरी दुनिया के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है।

.वैज्ञानिक इस खोज से इसलिए भी संतुष्ट हैं क्योंकि इससे पहले तक गन्ना को

सिर्फ एक फसल के तौर पर देखा जाता रहा है।

वर्तमान में गन्ने के पेड़ों को भारी दबाव में निचोड़कर उसका रस निकाला जाता है।

इसी रस से चीनी अथवा अन्य भोजनों में मिठास पैदा करने वाली सामग्रियों का निर्माण होता है।

दूसरी तरफ रस निचोड़ लेने के बाद वह वनस्पति किसी काम नहीं आता और उसे किसान अथवा चीनी मिल मालिक जला दिया करते हैं।

इसके जलने से भी प्रदूषण फैलता है।

कुछ कारखानों में इसे जलाकर बिजली पैदा की जाती है।

प्रोफसर हेनरी ने बताया है कि रस निचोड़ लेने के बाद बचे हिस्से को नये तरीके से प्रोसेस कर

ग्रीन एनर्जी उत्पादन के लायक बनाया जा सकता है।

गन्ने का डीएनए वैज्ञानिकों को उसी काम में मदद पहुंचाने वाला है।

उन्हें उम्मीद है कि बहुत कम समय में यह  काम व्यवहारिक तौर पर कर पाना भी संभव होगा।

गन्ने की खेती को मिलेगी नई सुरक्षा

वैज्ञानिकों के इस शोध की वजह से पूरी दुनिया के गन्ने की खेती को नई सुरक्षा मिल सकती है।

वर्तमान में चीन बनाने के अलावा यह किसी और काम में नहीं आता है।

अकेले ऑस्ट्रेलिया में हर साल करीब साढ़े तीन करोड़ टन गन्ने का उत्पादन होता है।

इस खेती से करीब दो खरब का निर्यात होता है जबकि मुख्य तौर पर क्वींसलैंड में ही इस कारोबार से चालीस हजार लोगों को रोजगार मिला हुआ है।

चीनी उद्योग की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है।

इसलिए समझा जा रहा है कि ऊर्जा उत्पादन में इसके प्रयोग से गन्ने की खेती से लेकर

उसके अंतिम इस्तेमाल तक स्थिति ठीक होगी और अधिक लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा होंगे।

अब वैज्ञानिक इसके व्यापारिक उत्पादन की तैयारियों का जायजा ले रहे हैं

ताकि इसके माध्यम से ऊर्जा पैदा करने का खर्च भी अपेक्षाकृत कम हो।

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